रिपेयरिंग मिशन पर रूबियो

अमेरिकी विदेश मंत्री ने गर्मजोशी दिखाई और आश्वस्ति भी. तनावपूर्ण संबंधों को ट्रंप शैली वाला ड्रामाई एहसास भी कराया. लेकिन चीन, पाकिस्तान, ट्रेड टैरिफ और प्रवासन जैसे मुद्दों पर तनाव अब भी बरकरार हैं

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर 24 मई को नई दिल्ली में

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत आए तो वॉशिंगटन का इरादा उसे रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने का खास मौका बनाना था. उसकी जरूरत भी थी क्योंकि पिछले साल भर में भारत-अमेरिका संबंध अजीब-से ऊहापोह में फंस गए थे.

हालांकि नए अमेरिकी राजदूत सार्जियो गोर ने कई अटके हुए अहम मुद्दों को बुलेट ट्रेन की रफ्तार से निबटाने और रिश्तों में नई जान फूंकने की पूरी कोशिश की थी. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ रिश्ते सुधारने में व्यस्त रहे और पश्चिम एशिया संकट के हल के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहे.

ऐसे में, बकौल एक पूर्व भारतीय राजनयिक, यह धारणा बनी कि अमेरिका ''हमारे दुश्मनों को सहला रहा है और भारत तथा अमेरिका के बीच भरोसा कमजोर हो गया.'' उधर, व्यापार वार्ता टैरिफ के कोहरे में फंसी हुई थी. भारत ने अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा तैयार करने में महीनों लगाए, तो पता चला कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की सभी टैरिफ नीतियों को पलट दिया.

भू-राजनैतिक तनाव और व्यापार के अलावा, दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाने वाले तीसरे स्तंभ यानी दोनों देशों की जनता के बीच के आपसी संबंधों—जिसे ''जीवंत पुल'' माना जाता है—पर भी भारी दबाव है. ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा, ग्रीन कार्ड और कानूनी आप्रवासन को लेकर नई और सख्त नीतियां लागू कीं, जिससे भारतीय आइटी पेशेवरों, शिक्षाविदों और छात्रों के लिए बड़ी बाधाएं खड़ी हो गईं.

इसलिए, अमेरिकी विदेश मंत्री की यात्रा की पूरी योजना में करीने से दोस्ताना दिखावे का ख्याल रखा गया था. इस भीषण गर्मी में तरबतर बहते पसीने के साथ रूबियो पत्नी जेनेट के साथ कोलकाता, दिल्ली, आगरा और जयपुर घूमे. उसे देखकर विदेश नीति के एक जानकार ने तंज किया, ''कहावत है कि गर्मी में पागल कुत्ते और अंग्रेज ही घूमते हैं. अब उसमें अमेरिकियों को भी जोड़ा जा सकता है.''

रूबियो की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी बात सही ढंग से रखी. उन्होंने भारत को जरूरी वैश्विक साझीदार बताया और दिल्ली को भरोसा दिलाया कि अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते सामरिक नहीं, बल्कि ''रणनीतिक'' हैं. उन्होंने सामरिक साझेदारी के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता पर जोर देकर इंडिया टुडे से कहा, ''हम कई देशों के साथ जुड़े रहते हैं लेकिन हमारी कुछ ही बहुत जरूरी सामरिक साझेदारियां हैं, और भारत उनमें से एक है. हमारे बीच इतने ज्यादा साझा हित हैं कि जो फिक्र भारत की है, हमारी फिक्र के मुद्दे भी वही हैं; और हम दोनों के पास योगदान देने की क्षमताएं हैं, इसलिए यह साझेदारी बिल्कुल सही है'' 

यही नहीं, एक रंगारंग मंचीय ड्रामा भी हुआ. राजधानी में अमेरिकी स्वतंत्रता के 250वीं सालगिरह के मौके पर अमेरिकी दूतावास के जश्न में ग्रैमी अवॉर्ड विजेता ए.आर. रहमान को हिट गानों के लिए बुलाया गया था. उसे गोर ने राजनैतिक कला का मंच बना दिया. राजदूत ने ट्रंप को सेलफोन पर लाइव कॉल किया, ताकि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की तारीफ के पुल बांध सकें. यह अजब प्रदर्शन था जो सुखद एहसास के लिए निपट व्यक्तिगत और दिखावटी था. ट्रंप के बोल ने माहौल में रंग घोला तो रूबियो के दौरे ने कूटनीतिक धुन बजाई.

विरोधाभासी संकेत
इस दौरे से रिश्तों में कुछ सुकून वापस तो आया लेकिन एक बड़ी सचाई भी खुली कि भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव की जड़ें व्यवस्था में ही निहित हैं. जैसा कि कांग्रेस नेता तथा विदेश नीति के जानकार शशि थरूर ने एक अखबार में लिखा, ''महज एक सफल दौरा पूरे एक साल के व्यवस्थागत झटकों को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकता. रूबियो ने इस टूटती हुई साझेदारी के गंभीर लक्षणों को संभाला लेकिन मूल बीमारी यानी वॉशिंगटन की लेन-देन वाली मागा विदेश नीति की भारी अनिश्चितता अब भी लाइलाज बनी हुई है.''

भू-राजनीति के मामले में भारत और अमेरिका को जोड़ने वाला बंधन अब ढीला पड़ता दिख रहा है. ये दोनों देश कभी भी औपचारिक अर्थों में सहयोगी नहीं रहे लेकिन दोनों ही बीजिंग के बढ़ते असर और उसके दो-टूक दावे को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के लिए चुनौती की तरह देखते रहे हैं. आज भारत इस बात को लेकर अनिश्चित है कि वॉशिंगटन का रुख असल में है क्या. ट्रंप प्रशासन ने चीन के मामले में विरोधाभासी संकेत दिए हैं—पड़ोसी मुल्क के साथ कभी उसका रुख टकराव वाला रहा है तो कभी लेन-देन वाला. इससे नई दिल्ली में यह चिंता पैदा होती है कि क्या भारत का रणनीतिक महत्व, अमेरिका और चीन के संबंधों की स्थिति के आधार पर बदलता रहेगा.

दिलचस्प यह भी है, जैसा कि अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर कहती हैं, ''भले ही व्हाइट हाउस का रवैया अक्सर अप्रत्याशित लगता हो लेकिन व्यापक अमेरिकी तंत्र—खासकर पेंटागन और विदेश विभाग—भारत के साथ गहरे जुड़ाव के पक्ष में है. वर्षों से रक्षा सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और तकनीकी साझेदारियों ने ऐसा संस्थागत माहौल पैदा किया है, जो राजनैतिक उथल-पुथल के बावजूद बना रहता है. यह निरंतरता शायद राष्ट्रपति के बयानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.''

व्यापार के मुद्दे पर रूबियो ने उम्मीद जताई कि ''कुछ ही हफ्तों में'' करार हो सकता है. लेकिन हकीकत ज्यादा पेचीदा है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के बराबर लगाए जाने वाले टैरिफ को रद्द कर दिया क्योंकि वे कार्यपालिका के अधिकार की सीमा से बाहर थे. फिलहाल, अस्थायी और एक समान 10 फीसद का टैरिफ लागू है. भारत के नीति-निर्माताओं के सामने सवाल है कि अमेरिका की अंतिम टैरिफ व्यवस्था ही तय नहीं हुई है, तो हम क्यों अपनी मर्जी से 18 फीसद वाले टैरिफ में बंध जाएं, जिस पर अंतरिम समझौते के तहत बातचीत हुई थी.

इमिग्रेशन (आप्रवासन) के संवेदनशील मुद्दे पर रूबियो ने फिर दोहराया कि ये नीतियां सभी देशों के लिए हैं, न कि सिर्फ भारत के लिए. लेकिन भारत पर इसका असर ज्यादा है क्योंकि अमेरिकी इमिग्रेशन व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा उठाने वालों में भारतीय ही हैं. विडंबना यह है कि तमाम राजनैतिक टकरावों के बावजूद असल आर्थिक जुड़ाव गहराता जा रहा है. 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 210 अरब डॉलर (20.3 लाख करोड़ रु.) के पार पहुंच गया. भारत के लिए सबक स्पष्ट था: उसे न सिर्फ अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाना चाहिए; बल्कि जिन चुनिंदा सेक्टर्स में अमेरिका को भारत की जरूरत है उनमें उसे बढ़त बनानी चाहिए.

रूबियो 24 मई को दिल्ली के एक कार्यक्रम में बोलते हुए

ज्यादा व्यावहारिक क्वाड
बेशक दोतरफा रिश्ते उलझे हैं लेकिन क्वाड समूह (भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका) ज्यादा स्थिर बनकर उभर सकता है. रूबियो उसके पक्के पैरोकारों में से हैं, जिन्होंने क्वाड की कई मंत्री-स्तरीय बैठकों की मेजबानी की है. क्वाड बड़ी सैद्धांतिक आकांक्षाओं के बजाए ज्यादा व्यावहारिक होता जा रहा है. रूबियो की यात्रा के सबसे सार्थक नतीजे महत्वपूर्ण खनिजों, समुद्री सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और उभरती तकनीकों के क्षेत्रों में सामने आए. नई महत्वपूर्ण खनिज पहल पर हस्ताक्षर अहम है. अहम खनिज आपूर्ति शृंखलाओं पर चीन के दबदबे से उसे ताकत मिली है. क्वाड देशों के जरिए वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं से चीन पर निर्भरता घटेगी.

ऐसे में नई दिल्ली का रुख व्यावहारिक है: बातचीत जारी रखो, टकराव से बचो, पर ज्यादा स्पष्ट होने तक करार लटकाए रखो. इसमें भारत की ट्रंप-युग की कूटनीति को संभालने का तरीका दिखता है, जो शंकर के मुताबिक, ''टकराव नहीं, लेकिन समर्पण भी नहीं है.'' वे कहती हैं, ''रिश्ते संभालने का भारत का तरीका परिपक्व है. वह अपने मूल हितों पर कायम रहा.'' भारत के लिए चुनौती रूबियो की यात्रा से रिश्तों की मरम्मत को आगे बढ़ाना और अमेरिकी घरेलू राजनीति के उतार-चढ़ाव से भी बचे रहना होगी. जैसा कि पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार पंकज सरन कहते हैं, ''भारत को आंखें खुली रखकर ठोस कदमों से आगे बढ़ना होगा.''

जानकारों का कहना है कि नुक्सान की भरपाई वाले रूबियो के इस दौरे की जमीन पर आगे बढ़ने के लिए अहम है: भारत आंखें पूरी तरह से खुली रखे और हालात को अपने नियंत्रण में.

इंटरव्यू: इंडिया टुडे से मार्को रूबियो ने कहा, "भारत और अमेरिका अपार संभावनाओं वाले दौर में प्रवेश कर रहे."

अमेरिकी विदेश मंत्री के रूप में अपनी पहली भारत यात्रा पर आए मार्को रूबियो ने इंडिया टुडे के रोहित शर्मा से बातचीत की. उसी के अंश:

> भारत के साथ संबंधों पर
हम कई देशों के साथ काम करते हैं लेकिन असलियत में हमारे कुछ ही देशों से महत्वपूर्ण रणनीतिक गठबंधन हैं और भारत उनमें से एक है. अमेरिका और भारत दोनों जिन बातों को महत्व देते हैं, उनमें कई समानताएं हैं. और हम दोनों के पास योगदान देने का सामर्थ्य है. इसलिए यह बात समझ में आती है. हम यहां असल में उसी रिश्ते को और आगे बढ़ाने के लिए आए हैं क्योंकि हर नए दौर में, दुनिया भर में नए मौके और नई चुनौतियां सामने आती हैं. और भारत उन देशों में से एक है जिसके साथ हम इन सभी मामलों पर सबसे करीब से काम करते हैं.

अमेरिकी-भारत व्यापार समझौते पर
हम सभी के पास आशावादी होने के ऐसे कई कारण हैं कि हम एक व्यापार समझौते के बहुत करीब हैं. यह एक बहुत बड़ी बात होगी क्योंकि यह दोनों देशों के लिए बहुत अच्छा होगा. इससे जहां भारत में अमेरिकी निवेश बढ़ेगा, वहीं अमेरिका में भारत का निवेश बढ़ेगा. इससे हमारी कंपनियों के बीच और ज्यादा सह-निवेश और सहयोग के लिए मंच तैयार होगा. जाहिर है, आप जानते ही हैं, टैरिफ जैसी चीजें हमारे व्यापक संबंधों में शीर्ष पर ही होती हैं और उनसे सभी चीजें प्रभावित होती हैं. इन मसलों को हम जितनी जल्दी एक अच्छे व्यापार समझौते के जरिए सुलझा लेंगे—जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा—तो हमारे लिए अवसर ही अवसर होंगे.

डोनाल्ड ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन पर
लुब्बोलुबाब समझिए: अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, और हमारे पास शक्तिशाली सेनाएं भी हैं. हम दोनों देशों के बीच संबंध होने जरूरी हैं, क्योंकि हम ऐसी किसी भी हालत से बचना चाहते हैं जिससे दुनिया के किसी भी हिस्से में अस्थिरता पैदा हो सकती हो. इसलिए यह दौरा इस लिहाज से अहम था कि दोनों देशों में इतनी क्षमता होनी चाहिए कि वे एक दूसरे से बातचीत कर सकें. लेकिन यह भी साफ है कि कुछ ऐसे खास मुद्दे हैं जिन पर हम सहमत नहीं होने वाले; कुछ ऐसे मसले हैं जिनसे हमें निबटना होगा, जो उन्हें पसंद न हों, जैसे कि महत्वपूर्ण खनिजों और सप्लाइ चेन के लिए उन पर निर्भरता.

पाकिस्तानी आतंकवाद से निबटने पर
हम आतंकवाद से निबटना चाहते हैं, चाहे वह कहीं से भी पैदा रहा हो. अगर ऐसे सशस्त्र समूह हैं जो लोगों को मारना चाहते हैं और आतंकवादी गतिविधियां करते हैं, और वे दुनिया में किसी भी देश के अंदर से काम कर रहे हैं, तो हमें इससे निबटना होगा. हमें अपने इलाके में भी इस समस्या से निबटना पड़ा है. मुझे उम्मीद है कि हम पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ मिलकर इन खतरनाक गुटों के खिलाफ कार्रवाई कर पाएंगे; ये गुट आखिरकार तो खुद उस देश के लिए ही खतरा हैं, पर फिलहाल ये उस इलाके के लोगों के साथ-साथ अमेरिकी हितों के लिए भी खतरा बने हुए हैं. इसलिए जहां कहीं भी आतंकवाद हमारे राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा बनता है, हम उससे निबटना चाहते हैं—सबसे अच्छा तो यही है कि हम उस देश के सहयोग से ही ऐसा करें, जहां ये गुट मौजूद हैं. 

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