बुआई बदलाव के बीज की
दो दशकों से तैयार हो रहे प्रस्तावित बीज कानून का मकसद है नियमन को सख्त करना. लेकिन क्या इससे खेती का ढांचा ज्यादा औपचारिक होगा और किसानों की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी?

पिछले साल मार्च में 65 साल के कच्चलापु सत्यम की जिंदगी उस समय बिखर गई, जब उन्होंने मक्का के बीज उगाने का एक कॉन्ट्रैक्ट लिया. तेलंगाना के मुलुगु जिले के चिरुतापल्ली गांव में 10 एकड़ खेत में बोई गई उनकी फसल बर्बाद हो गई.
उनकी पत्नी राजम्मा को लकवा मार गया; बताया जाता है कि इसकी वजह मक्के के रेशमी गुच्छों से हुई फूड पॉइजनिंग थी. उनके 40 साल के बेटे चंद्र राव ने कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्या कर ली. वे अकेले नहीं थे.
तेलंगाना में 671 छोटे आदिवासी किसानों ने भी 1,500 एकड़ जमीन पर इस फसल बर्बाद होने और उसके बाद की दुश्वारियों के बारे में बताया. उन्होंने भी मक्का के इन बीजों की पौध लगाई थी जिसमें उनसे एक एकड़ में चार टन उपज का वादा किया गया था. लेकिन उपज बमुश्किल एक टन हुई.
अगर सब कुछ केंद्र सरकार की योजना के अनुसार हुआ, तो संसद के मॉनसून सत्र में एक नया कानून पेश किया जा सकता है जो बीजों की गुणवत्ता और जवाबदेही पर सख्त नजर रखेगा और ऐसी घटनाओं को होने से रोकेगा. जिस देश की 45 फीसदी से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर हो, वहां बीजों से जुड़े नियम सिर्फ खेती तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि उनका असर खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और यहां तक कि जन स्वास्थ्य पर भी पड़ता है.
इसी पृष्ठभूमि में मसौदा बीज विधेयक, 2025 लाया जा रहा है जो बीज अधिनियम, 1966 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 की जगह लेगा. जब ये कानून बनाए गए थे, तब हाइब्रिड बीज, जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) किस्में और बीजों पर रॉयल्टी जैसी चीजें नहीं होती थीं, और बीजों की आपूर्ति पर सरकारी क्षेत्र का दबदबा था. आज बीजों की कुल बिक्री में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी लगभग 75 फीसदी है, और पंजीकरण की व्यापक प्रक्रिया न होने के कारण कई नियम बन गए हैं.
बीज विधेयक का क्या है उद्देश्य और क्यों है इसे लेकर चिंता?
प्रावधान: इस कानून का उद्देश्य ''अच्छी क्वालिटी के बीजों के उत्पादन और सप्लाइ को सहज बनाना'' है.
आपत्ति: उत्पादन/सप्लाइ का काम तो पहले से जारी कार्यक्रमों के जरिए हो रहा है; इस कानून को इसके बजाय किसानों के अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए.
प्रावधान: इसमें उसे किसान बताया गया है जो सीधे या दूसरों के मार्फत फसल उगाता है.
आपत्ति: यह परिभाषा बहुत संकीर्ण है; इसमें किसान-ब्रीडर (बीज और पशु नस्ल तैयार करने वाला), सामुदायिक बीज बैंक आदि शामिल नहीं हैं.
प्रावधान: किसान रजिस्टर्ड किस्मों के बीज उगा सकते हैं, बो सकते हैं, दोबारा बो सकते हैं, बचाकर रख सकते हैं, इस्तेमाल कर सकते हैं, आपस में बदल सकते हैं, साझा कर सकते हैं, बेच सकते हैं.
आपत्ति: किसी भी तरह के कृषि बीजों पर किसानों के अधिकार पर रोक नहीं होनी चाहिए.
प्रावधान: केंद्र के पास राज्यों को बाध्यकारी निर्देश जारी करने और नीतियां तय करने का अधिकार है.
आपत्ति: इससे सारी सत्ता केंद्र के हाथों में चली जाएगी.
प्रावधान: केंद्र 'आपात स्थितियों' में बीज की कीमत तय कर सकता है.
आपत्ति: यह प्रावधान सिर्फ आपात स्थितियों तक ही सीमित है.
प्रावधान: फसल खराब होने पर मुआवजे का स्पष्ट प्रावधान नहीं है.
आपत्ति: जब रजिस्टर्ड बीज उम्मीद के मुताबिक फसल न दें, तो मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए.
गुणवत्ता पर जोर
नया बिल दो दशक से भी ज्यादा समय से बन रहा है. इसे पहली बार 2004 में पेश किया गया था, और फिर 2010 और 2019 में इसमें संशोधन किए गए. अब इसका मौजूदा रूप सामने है. इसका घोषित उद्देश्य बीजों की गुणवत्ता का नियमन करना, भरोसेमंद इनपुट तक किसानों की पहुंच पक्की करना और उन्हें नुक्सान से बचाना है.
साथ ही, इसका लक्ष्य नवाचार को बढ़ावा देने और वैश्विक किस्मों तक पहुंच बढ़ाने के लिए आयात को उदार बनाना भी है. 'मौजूदा जरूरतों के अनुरूप' बनाने के लिए इसमें पूरी वैल्यू चेन में व्यापक नियामकीय ढांचे का प्रस्ताव किया गया है. जनवरी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए कहा, ''हर किसान को गुणवत्ता वाले बीज मिलने चाहिए. अच्छी कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाएगा, और जो लोग गलत काम करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. इस कानून की यही मूल बात है.''
इसके मूल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि इसमें बीजों की सभी किस्मों का अनिवार्य रूप से परीक्षण-आधारित पंजीकरण जरूरी किया गया है—चाहे उन्हें किसी सार्वजनिक संस्था ने विकसित किया हो या किसी निजी फर्म ने—और सरकार या उससे मान्यता प्राप्त संस्थाओं से गुणवत्ता का सर्टिफिकेट लेना होगा. अभी कंपनियां खुद ही उन्हें प्रमाणित करती हैं.
बिल में पूरी आपूर्ति शृंखला में जवाबदेही बढ़ाई गई है—उत्पादकों, प्रोसेसरों, डीलरों, वितरकों और नर्सरियों—सभी को पंजीकरण कराना होगा. इसमें ट्रेसेबिलिटी (मूल स्रोत का पता लगाने) के नियम रखे गए हैं, जिनमें बीज के पैकेटों पर क्यूआर कोड लगाना शामिल है, ताकि ज्यादा पारदर्शिता लाई जा सके और किसान खरीद से पहले सर्टिफिकेशन का ब्योरा और गुणवत्ता मानकों को सत्यापित कर सकें.
जुर्माने के नियम भी काफी सख्त किए गए हैं. अभी जुर्माने की रकम मामूली है—पहली बार के अपराध पर 500 रुपए, और बार-बार अपराध करने पर 1,000 रुपए जुर्माना या छह महीने की सजा. मसौदे में अलग-अलग स्तर के आर्थिक दंड का प्रस्ताव है; इसके तहत नकली या बिना रजिस्ट्रेशन वाले बीज बेचने जैसे 'बड़े' और बार-बार किए जाने वाले अपराधों के लिए जुर्माना बढ़कर 30 लाख रुपए तक हो सकता है, साथ ही तीन साल तक की जेल का प्रावधान है.
फिर भी, जहां इस मसौदे में नियमों को आधुनिक बनाने की कोशिश की गई है, वहीं जब नवंबर 2025 में यह जारी हुआ तो इस पर बहस छिड़ गई. यह किसान हितों की कीमत पर उद्योग जगत का पक्ष लेने से लेकर बीजों के रजिस्ट्रेशन और कीमतें तय करने में राज्य सरकारों की भूमिका कम करने तक जुड़ी है.
शक के बीज
विश्लेषण फर्म क्रिसिल इंटेलिजेंस के अनुसार, भारत के बीज बाजार का संगठित हिस्सा 2026-27 के फसल वर्ष में 35,500 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है. इसके बाद अगले पांच साल में यह 4-5 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ेगा. फिर भी बाजार का लगभग 55 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है, जो मोटे तौर पर किसानों के बीज बचाकर रखने और सहेजने से जुड़ा है, जिससे इसे औपचारिक बनाने की गुंजाइश जाहिर होती है.
इस बदलाव पर कुछ हितधारक चिंता जताते हैं. हैदराबाद में सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक जी.वी. रामअंजनेयुलु कहते हैं कि यह मसौदा एक व्यापार कानून जैसा ज्यादा लगता है, जिसका उद्देश्य ''उद्योग के लिए अवसर पैदा करना और कारोबारी सुगमता को बढ़ावा देना'' है. इसके बजाए, वे सुझाव देते हैं, ''बीज कानून अधिकारों पर आधारित ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो किसानों के अधिकारों की रक्षा करे और जैव विविधता को बचाए.''
विवाद का सबसे बड़ा पहलू संभवत: यह है कि विधेयक किसानों के अधिकारों के साथ कैसा व्यवहार करता है. हालांकि, यह किसानों के बीज उगाने, बोने, बचाने, इस्तेमाल करने, आदान-प्रदान करने, साझा करने और बेचने के अधिकार को मान्यता देता है, लेकिन यह अधिकार केवल उन किस्मों तक ही सीमित है जो इस अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड हैं.
एलायंस फॉर सस्टेनेबल ऐंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा-किसान स्वराज) की सह-संयोजक कविता कुरुगंती के अनुसार, यह प्रावधान उस परंपरा के दायरे को सीमित कर देता है जो ऐतिहासिक रूप से काफी व्यापक और समुदाय-आधारित रही है. वे कहती हैं, ''मसौदे में इस अधिकार को किसी भी प्रकार के बीज पर लागू होने वाले अधिकार के रूप में ही रहने दिया जा सकता था.''
कुरुगंती कहती हैं, ''सामुदायिक बीज प्रणालियों ने दशकों से स्थानीय कृषि को बचाए-बनाए रखा है; जलवायु के अनुसार ढलने में मदद की है. मददगार व्यवस्था के अभाव में पारंपरिक तौर-तरीकों को दंडित किए जाने का खतरा बढ़ गया है.'' यह सब तब हो रहा है, जब नवंबर 2024 में शुरू किया गया 'प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन' ऐसी प्रणालियों को प्रोत्साहन देता है जो पारंपरिक बीजों पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं.
संघीय असंतुलन
आलोचक सत्ता के संभावित केंद्रीकरण की ओर भी इशारा करते हैं. सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ नरसिम्हा रेड्डी दोंती बताते हैं कि संविधान के अनुसार कृषि राज्य का विषय है. फिर भी इस मसौदे में केंद्र को राज्यों को बाध्यकारी निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है, और 'नीति' की उसकी व्याख्या को ही अंतिम माना जाएगा. चूंकि कृषि-जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों में बीजों का प्रदर्शन अलग-अलग होता है, इससे राज्यों के स्तर पर होने वाली निगरानी कमजोर होने की चिंता बढ़ गई है.
दोंती बीटी कॉटन का उदाहरण देते हैं—जो एक कीट-रोधी आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसल है जिसे 2002 में भारत में कमर्शियल खेती की मंजूरी दी गई थी. निजी क्षेत्र ने इसकी सैकड़ों किस्में उतारीं, पर विभिन्न क्षेत्रों में उनके प्रदर्शन के बारे में उपलब्ध आंकड़े सीमित हैं. दोंती कहते हैं कि इसके बावजूद इन बीजों को बड़े पैमाने पर बेचा जाता है, और अक्सर स्थानीय परिस्थितियों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता.
एक और मसला कीमतें तय करने के बारे में है. मसौदे में कीमतों को काफी हद तक बाजार की ताकतों पर छोड़ा गया है; इसमें केंद्र सरकार का हस्तक्षेप केवल 'आपातकालीन स्थितियों'—जैसे इनकी किल्लत या मुनाफाखोरी—तक ही सीमित है. भारत में 85 फीसदी से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान हैं, ऐसे में कृषि आदान की लागत—जिनमें बीज भी शामिल हैं—सीधे तौर पर उनकी आर्थिक संभावना को प्रभावित करती है. 2006 में आंध्र प्रदेश ने एकाधिकार आयोग के समक्ष मॉन्सेन्टो बायोटेक (इंडिया) को चुनौती दी थी. राज्य सरकार का आरोप था कि बीटी कॉटन के बीजों पर 'अत्यधिक' रॉयल्टी वसूली जा रही है. राज्य सरकार यह मुकदमा जीत गई. यह कीमत नियमन में राज्य सरकार के हस्तक्षेप का एक अहम उदाहरण था पर इस भूमिका को यह विधेयक प्रभावी रूप से समाप्त कर देगा.
उद्योग के प्रतिनिधि किसी भी रूप में ऐसे किसी नियंत्रण का विरोध करते हैं. बाजार में 500 से ज्यादा कंपनियां हैं. ऐसे में उनका तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से कीमतें काबू में रहती हैं. फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआइआइ) के महानिदेशक परेश वर्मा कहते हैं, ''बीज उद्योग रिसर्च पर आधारित है, ठीक वैसे ही जैसे दवा उद्योग है. एक रिसर्च-आधारित बीज कंपनी अपने राजस्व का औसतन लगभग 10 फीसदी आरऐंडडी पर खर्च करती है. अगर मार्जिन कम होता है, तो सबसे पहला असर इनोवेशन पर पड़ता है.''
मुआवजे में कमी
लेकिन नकली या घटिया बीज इस्तेमाल करने से फसल खराब होने पर किसानों की सबसे बड़ी चिंता मुआवजा होती है—यह ऐसा क्षेत्र है जिस पर मसौदा खामोश है. पौध किस्म संरक्षण और कृषक अधिकार अधिनियम, 2001 में किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान तो है, मगर सिर्फ उन्हीं किस्मों के लिए जिन्हें सरकार ने अधिसूचित किया हो. सत्यम के मामले में चार बीज कंपनियों ने तेलंगाना के 671 पीड़ित किसानों को कुल मिलाकर चार करोड़ रुपए का मुआवजा दिया. विशेषज्ञों का कहना है कि मुआवजे के ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं.
अभी शिकायत निवारण का काम काफी हद तक उपभोक्ता अदालतों पर निर्भर है. गैर सरकारी संगठन जीन कैंपेन की संस्थापक सुमन सहाय के अनुसार, फसल खराब होने से हुआ पूरा आर्थिक नुक्सान मुआवजे में दिखना चाहिए. इसमें सिर्फ बीजों की कीमत ही शामिल न हो, बल्कि मजदूरी, दोबारा बुआई और खाद जैसे दूसरे इनपुट का खर्च भी जुड़ना चाहिए. वे कहती हैं कि जिन मामलों में बीजों की क्वालिटी घटिया हो, तो जुर्माना इतना अधिक होना चाहिए, संभवत: 50 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए के बीच.
भारत में बीजों से जुड़ी दो दुनिया है: एक औपचारिक और इनोवेशन पर आधारित उद्योग और दूसरी अनौपचारिक और समुदाय पर आधारित प्रणाली. किसी भी नियामकीय व्यवस्था को इन दोनों के साथ जुड़ना होगा, ताकि क्वालिटी के साथ उन तरीकों को भी नुक्सान न पहुंचे जो विविधता और लचीलापन बनाए रखते हैं. बिल की सफलता इस पर निर्भर होगी कि वह औपचारिकता और किसानों की स्वायत्तता के बीच कैसा संतुलन बनाता है.
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक, ''हर किसान को अच्छी गुणवत्ता वाले बीज मिलने चाहिए. अब उन्हें हर बीज की पूरी जानकारी मिल सकेगी. घटिया बीज सिस्टम में नहीं आ पाएंगे. अच्छी कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाएगा और जो लोग गलत काम करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.''