आतंक पर वार का चक्रव्यूह
भारत की आतंकवाद रोधी नीति 'प्रहार' दरअसल उन कदमों को औपचारिक रूप देती है जो काफी हद तक पहले से लागू है

- डॉ. आदिल रशीद
हाल में गृह मंत्रालय ने जो 'नेशनल काउंटर टेररिज्म पॉलिसी ऐंड स्ट्रैटेजी' जारी की है, उसका नाम है प्रहार (पीआरएएचएएआर). दिलचस्प यह है कि इस दस्तावेज में 'होगा' जैसे भविष्यकाल के शब्द कम दिखते हैं. उसकी जगह 'हो रहा है' जैसे शब्द बार-बार आते हैं. यानी यह पहली औपचारिक नीति संकेत देती है कि इसमें बताए गए ज्यादातर कदम पहले ही जमीन पर लागू किए जा चुके हैं.
इस नीति की खास बात इसका सात अक्षरों वाला संक्षिप्त नाम है. पीआरएएचएएआर का हर अक्षर आतंकवाद विरोधी रणनीति के एक खास पहलू की ओर इशारा करता है. 'पी' का मतलब है 'आतंकी हमलों की रोकथाम', 'आर' यानी 'तेज और संतुलित प्रतिक्रिया', 'ए' का मतलब है, ''आंतरिक क्षमताओं को जोड़ना और मजबूत करना'', 'एच' का मतलब है, ''मानवाधिकार और कानून का राज.''
इसके बाद आने वाला 'ए' है ''उन हालात को कमजोर करना जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं.'' दूसरा 'ए' है ''आतंकवाद से निबटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को साथ लाना और दिशा देना.'' आखिरी 'आर' का मतलब है, ''पूरे समाज की भागीदारी से रिकवरी और मजबूती.'' दस्तावेज में इसके बाद इन सभी विषयों पर अलग-अलग विस्तार से चर्चा की गई है.
खतरे के आकलन वाले हिस्से में दस्तावेज 'जिहादी आतंकी संगठनों और उनके फ्रंटल संगठनों' के खतरे का जिक्र करता है. इसमें सीमा पार से सक्रिय आतंकी समूहों और अल-कायदा तथा आइएसआइएस जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चुनौती की बात कही गई है. हालांकि खालिस्तान से जुड़े आतंकी संगठनों, वामपंथी उग्रवाद समूहों या पूर्वोत्तर के विद्रोही गुटों का साफ तौर पर उल्लेख नहीं है.
भारत के आतंकवाद विरोधी अभियानों की एक कम चर्चित सफलता यह रही है कि सुरक्षा एजेंसियों ने कट्टरता रोकने के प्रयासों को अलग-थलग, स्थानीय और गैर-राजनैतिक बनाए रखने की कोशिश की है. मकसद यही रहा कि किसी धार्मिक या जातीय समुदाय को यह न लगे कि उसे निशाना बनाया जा रहा है. इन अभियानों में समुदाय के बुजुर्गों, धार्मिक नेताओं और परिवार के लोगों को शामिल किया गया, ताकि भटकाव के शिकार युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाया जा सके.
दिलचस्प यह है कि नीति पत्र में डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रमों का जिक्र बस सरसरी तौर पर है, जबकि दुनिया भर में इस मुद्दे पर तीखी राजनैतिक बहस होती रही है. पश्चिमी देशों ने ऐसे कार्यक्रमों को काफी हद तक बंद कर दिया है क्योंकि दोबारा कट्टरता की ओर लौटने की दर ज्यादा रही. दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में इनके बेहतर नतीजे बताए गए हैं. इन मिले-जुले अनुभवों को देखते हुए भारत में केंद्र और राज्य सरकारें अब तक पश्चिमी मॉडल पर आधारित व्यक्ति-केंद्रित डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम लागू करने से काफी हद तक बचती रही हैं.
यह सुकून की बात है कि भारत की आतंकवाद विरोधी नीति सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप्स के दुरुपयोग को लेकर पूरी तरह सतर्क दिखती है. दस्तावेज साफ कहता है कि इनका इस्तेमाल 'संचार, फंडिंग और आतंकी हमलों को दिशा देने' के लिए हो रहा है. साथ ही एन्क्रिप्शन, डार्क वेब, क्रिप्टो और वॉलेट जैसे नए खतरों पर भी नजर होने की बात कही गई है.
दस्तावेज इस बात पर जोर देता है कि ''भारत कानून के राज का पालन करता है, जहां कानून न्यायसंगत हैं, सब पर बराबर लागू होते हैं और मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं.'' आतंकवाद विरोधी कानूनों की एक सूची देने के बाद इसमें कहा गया है कि ''किसी भी आरोपी के लिए न्याय पाने के कई स्तर उपलब्ध हैं. जिला स्तर से लेकर राज्य और फिर केंद्र स्तर की उच्च न्यायपालिका तक पूरी न्यायिक संरचना मौजूद है. कानूनी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक अधिकार देती है.''
जब ऊपर यह साफ हो चुका है कि भारत की आतंकवाद विरोधी नीति आधिकारिक घोषणा से पहले ही अमल में थी, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब इसे सार्वजनिक करने की जरूरत क्यों पड़ी. संभावना यही है कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत सरकार अब एक बड़े जनसंपर्क अभियान की तैयारी में है, ताकि आतंकवाद से लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता को लेकर किसी भी तरह की गलतफहमी दूर की जा सके.
जो भी वजह हो, भारत की पहली औपचारिक आतंकवाद विरोधी नीति का दस्तावेज सामने आना सही दिशा में उठाया गया कदम है. दस्तावेज के आखिरी हिस्से का शीर्षक भी इसी बात की ओर इशारा करता है. उसमें आगे की रणनीति को एक दूरदर्शी यानी आगे की राह के तौर पर रखा गया है.
(लेखक मनोहर पर्रीकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस के काउंटर टेररिज्म सेंटर में रिसर्च फेलो और कोऑर्डिनेटर हैं)