किताब से पहले आया बवाल
जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के जरिए भाजपा सरकार की छवि को धूमिल करने की कांग्रेस की कोशिश से लगी सियासी आग ने संसद को झुलसा दिया

भारत में किताबों को लेकर विवाद आम तौर पर उनके प्रकाशन के बाद उठते हैं. पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरण फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के मामले में तूफान खुद किताब से पहले आ धमका. विवाद 2 फरवरी को तब शुरू हुआ जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान इस किताब के कुछ हिस्से पढ़ने की कोशिश की.
इन हिस्सों में कथित रूप से यह बताया जाता है कि अगस्त 2020 में लद्दाख में चीन के साथ भारत के गतिरोध के दौरान जब नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से पूछा कि चीन के बढ़ते टैंकों के बारे में क्या करना है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह संदेश भिजवाया कि ''जो उचित समझें, वो करें.'' गांधी की दलील थी कि यह निर्देश राजनैतिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने के बराबर था.
जवाब में राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि किताब 'प्रकाशित नहीं हुई है' और स्पीकर ओम बिड़ला ने लोकसभा के नियम 349 का हवाला देकर इसका जिक्र नामंजूर कर दिया. यह नियम सांसदों को अप्रकाशित या अपुष्ट दस्तावेजों के हिस्से पढ़ने से रोकता है. दो दिन बाद गांधी संसद में लौटे और किताब की छपी हुई प्रति दिखाते हुए प्रधानमंत्री को उनका सामना करने के लिए ललकारा.
राहुल गांधी के जवाब में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने 6 फरवरी को गांधी परिवार की आलोचना करने वाली दूसरी किताबों के हिस्से पढ़ने की कोशिश की. उन्हें स्पीकर के आसन से अध्यक्षता कर रहे टीडीपी के सांसद कृष्ण प्रसाद टेनेटी ने ओम बिड़ला के फैसले का हवाला देते हुए रोक दिया. जब विपक्ष ने कार्यवाही रोकने के लिए मजबूर कर दिया, तो भाजपा ने दलील दी कि यह रोक प्रकाशित सामग्री पर लागू नहीं होती.
कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष ने 10 फरवरी को 118 सांसदों के दस्तखत के साथ 'खुल्लमखुल्ला पक्षपाती' आचरण का आरोप लगाते हुए बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया. नोटिस में तीन आपत्तियां उठाई गईं—3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों का निलंबन, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर निजी हमले, और बिड़ला का यह बयान कि उन्होंने विपक्षी सांसदों के हाथों संभावित शारीरिक 'हमले' की चेतावनी की खुफिया जानकारी मिलने के बाद 6 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी को संसद में आने से बचने के लिए कहा, जब वे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देने के लिए आने वाले थे. प्रस्ताव बजट सत्र के दूसरे हिस्से के पहले दिन 9 मार्च को लिए जाने की संभावना है.
किताब की वस्तुस्थिति
जनरल नरवणे के संस्मरणों की किताब अप्रैल 2024 में प्रकाशित होने वाली थी. लेकिन दिसंबर 2023 में एक न्यूज एजेंसी ने जब उसके कुछ अंश प्रकाशित कर दिए तो रक्षा मंत्रालय ने पांडुलिपि को समीक्षा के अधीन रख दिया. फिर भी उसके अंश मीडिया की रिपोर्टों में आए और बताया जाता है कि किताब डिजिटल रूप में लीक हो गई.
दिल्ली पुलिस ने 9 फरवरी को ''वेबसाइटों और ऑनलाइन मार्केटप्लेसेज पर पाई गई जाहिरा तौर पर पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के हाथों तैयार टाइपसेट किताब'' के लीक होने की जांच के लिए एफआइआर दर्ज कर ली. कॉपीराइट उल्लंघन और सरकारी गोपनीयता कानून के संभावित उल्लंघनों के लिए कुछ 'अज्ञात व्यक्ति' इस जांच के निशाने पर हैं. इसी को पकड़कर भाजपा ने बार-बार सवाल किया कि गांधी को किताब आखिर मिली कैसे, जो गैरकानूनी ढंग से किताब रखने की तरफ इशारा था.
नरवणे और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने 10 फरवरी को बहुत सावधानी से नपे-तुले बयान जारी किए. पेंगुइन ने कहा, ''किताब की कोई भी प्रति...प्रकाशित, वितरित, बेची या अन्य तरीकों से जनता को उपलब्ध नहीं करवाई गई है.'' नरवणे ने सोशल मीडिया पर इसे साझा करते हुए लिखा, ''किताब की वस्तुस्थिति यही है.'' नरवणे ने राजनैतिक विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की. पेंगुइन ने नहीं बताया कि पीडीएफ कैसे लीक हुई.
विवाद ने 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ भारत के टकराव की यादें ताजा कर दीं. अप्रैल और मई में पैंगोंग त्सो (या पैंगोंग झील) पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़पों के बाद तनाव बढ़ने का नतीजा 15 जून को गलवान घाटी के टकराव में सामने आया, जिसमें 20 भारतीय और अज्ञात संख्या में चीनी सैनिक मारे गए. 2020 के मध्य तक तय सीमा से आगे चीनी बलों को लामबंद कर दिया गया और वे पीपी-14, पीपी-15 और पैंगोंग त्सो सरीखे टकराव वाले ठिकानों पर अड़ियल ढंग से जमा हो गए. निर्णायक पल 29-30 जून की रात तब आया जब भारत ने झील के दक्षिणी किनारे पर चीनी हरकतों को रोकने के लिए ऑपरेशन स्नो लेपर्ड शुरू किया. टुकड़ियों ने कैलाश पर्वतमाला की चोटियों पर तेजी से कब्जा कर लिया और इस तरह रणनीतिक दबदबा हासिल करके बीजिंग को बातचीत के रुख में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर दिया, जिसकी बदौलत वे 2021 के शुरुआती महीनों में पीछे हटे. सरकारी सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन को दोटूक राजनैतिक मंजूरी दी गई थी. कवायद में शामिल एक अधिकारी कहते हैं, ''एलएसी पर आक्रामक कार्रवाई के लिए पूर्ण मंजूरी की जरूरत थी. जब यह दे दी गई तो सेना के पास परिचालनगत स्वायत्तता थी.''
अप्रकाशित किताब के आधार पर सरकारी नाकारेपन का आरोप लगाकर राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में पक्के इरादे और निर्णाय क्षमता के भाजपा के नैरेटिव की हवा निकालने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा का कहना है कि मोदी का निर्देश सैन्य नेतृत्व में विश्वास की अभिव्यक्ति था. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि परमाणु हथियारों से लैस दुश्मन के आमने-सामने होने पर कमांडरों को राजनैतिक स्पष्टता की जरूरत होती है कि टकराव किस हद तक बढ़ाया जा सकता है.
राजनैतिक फायदा नहीं?
इस बीच कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि चुनाव की तरफ बढ़ रहे असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी और केरल राज्यों में चीन के मुद्दे का सीमित असर ही हो सकता है. कांग्रेस के एक रणनीतिकार ने बेबाक ढंग से कहा, ''मतदाताओं को कीमतों, नौकरियों और स्थानीय मसलों की फिक्र है. इसके बजाए हम पूरा बजट सत्र उस किताब पर खर्च कर रहे हैं... यह राजनैतिक नासमझी है.'' गांधी के समर्थकों का कहना है कि वे मोदी की सबसे मजबूत पूंजी, उनकी बाहुबली छवि को निशाना बना रहे हैं.
जनरल नरवणे का संस्मरण 2020 के लद्दाख संकट के बारे में क्या कहता है? जब तक किताब सरकारी मंजूरी के साथ प्रकाशित नहीं हो जाती, जनता को अधपकी जानकारी ही मिलेगी. मगर इस पर चर्चा को रोकने की लगातार कोशिश कर सरकार ने सचाई के अपने संस्करण पर संदेहों को और गहरा कर दिया है.

