प्रधान संपादक की कलम से

सबसे टिकाऊ निष्कर्ष यही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक उथल-पुथल के दौर में राजनैतिक और आर्थिक स्थिरता देकर मतदाताओं की नजर में अपना खोया हुआ मोमेंटम फिर हासिल कर लिया है

11 फरवरी 2026 अंक
11 फरवरी 2026 अंक

- अरुण पुरी

पहले दशक में जिस टीमो ('देयर इज मोदी ओनली') फैक्टर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगभग बुलेटप्रूफ बना दिया था, वह याद है आपको? एक ऐसा घेरा, जिसके भीतर पहुंचना किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए नामुमकिन लगता था. सत्ता में दस साल पूरे होने के बाद, करीब दो साल पहले, वह आभा थोड़ी फीकी पड़ती दिखी थी. लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह हैरान करने वाला है.

अपने ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल में मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आए चारों इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे में लगातार अपनी लोकप्रियता बढ़ाई है. जब पूछा गया कि अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त कौन है, तो मोदी न सिर्फ साफ तौर पर नंबर वन बने हुए हैं, बल्कि उनका स्कोर फिर से पुराने 50 फीसद से ज्यादा वाले स्तर पर लौट आया है.

2024 में यह 49.1 फीसद था, जो अब उछलकर 54.7 फीसद तक पहुंच गया है. अगर इसे सर्वे के दूसरे अहम आंकड़ों के साथ जोड़कर देखा जाए, तो कोई भ्रम नहीं बचता. खास बात यह है कि अगर आज आम चुनाव हो जाएं तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने दम पर 287 सीटें जीत सकती है. यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 240 सीटें मिली थीं, यानी बहुमत से 32 सीटें कम.

भाजपा की इस वापसी का असर पूरे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंध (एनडीए) पर पड़ा है. एनडीए का कुल आंकड़ा 352 सीटों तक पहुंच सकता है, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में मिले उसके सबसे बड़े आंकड़े से बस एक सीट कम है. दूसरी तरफ इंडिया ब्लॉक का ग्राफ नीचे आया है. लोकसभा चुनाव में 234 सीटों के शिखर से गिरकर आज यह 182 पर सिमट जाता है. इस सर्वे का एक और निष्कर्ष असली मिज़ाज को पकड़ता है. एनडीए की 'सबसे बड़ी उपलब्धि' के तौर पर लोगों ने राजनैतिक स्थिरता को चुना है. यह राम मंदिर और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे बड़े फैसलों से भी ऊपर है. मतलब साफ है. वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत ने एक ऐसे नेता पर भरोसा जताया है जो विश्वास और मजबूती की अनुभूति कराता है.

मोदी ने विपक्ष के मुकाबले अपनी बढ़त और बड़ी बना ली है, यह इस पूरी स्थिति का स्वाभाविक नतीजा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आंकड़े भी पिछले चार छमाही के इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे में धीरे-धीरे बढ़े हैं: 2024 में 22.4 फीसद से अब 26.6 फीसदी तक. लेकिन मोदी के मुकाबले फर्क न सिर्फ आंकड़ों में, बल्कि लोगों की सोच में भी कायम है. यह एक जाना-पहचाना विरोधाभास है. सत्ता में 12वें साल में भी मोदी शोर-शराबे से ऊपर एक अकेली शख्सियत की तरह बने हुए हैं.

उनके खिलाफ कोई बड़ी ऐंटी-इनकंबेंसी नहीं दिखती. प्रधानमंत्री के तौर पर उनके काम को 57 फीसद लोग 'शानदार' या 'अच्छा' मानते हैं. एनडीए सरकार से संतुष्टि का स्तर 52.1 फीसद के साथ इससे बहुत पीछे नहीं. अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एनडीए को 48.8 फीसद लोग 'अच्छा' या 'शानदार' रेटिंग देते हैं. लेकिन आगे को लेकर भरोसा कमजोर है. अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था सुधरेगी, ऐसा मानने वाले अब भी 30-40 फीसद के बीच हैं. वहीं 30.9 फीसद को डर है कि हालात और बिगड़ सकते हैं. इसी के साथ करीब छह में से चार लोग अब भी कहते हैं कि मौजूदा खर्च ''संभालना मुश्किल'' हो रहा है.

कुछ धारणाएं भी लगभग जस की तस हैं. विकास का फायदा 'सिर्फ अमीरों को' मिलने की सोच 2.9 अंक घटकर 39.6 फीसद पर आ गई है. लेकिन यह अब भी उन लोगों से कहीं ज्यादा है जो मानते हैं कि फायदे 'सब तक पहुंच रहे हैं', जिनका आंकड़ा 28 फीसद है. कई साल से आधे से ज्यादा लोग नीतियों का सबसे बड़ा लाभार्थी बड़े कारोबार को मानते रहे हैं. इस बार भी यह आंकड़ा 53 फीसद है. इसके बावजूद, जब सवाल आता है कि बेहतर आर्थिक प्रबंधन कौन कर सकता है, तो लोग साफ तौर पर मोदी को चुनते हैं.

मनमोहन सिंह पर उनकी बढ़त, जो पिछले अगस्त में सबसे कम 1.5 फीसद रह गई थी, अब फिर करीब 18 फीसद पर जा पहुंची है. विदेश नीति, जो कभी मोदी की बड़ी ताकत मानी जाती थी, अब उतनी उत्साहजनक तस्वीर नहीं दिखाती. इसकी एक वजह साफ है. 53.6 फीसद लोग मानते हैं कि भारत-अमेरिका रिश्ते डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में बिगड़े हैं. ऐसे माहौल में आंकड़ों का लुढ़कना अस्वाभाविक नहीं.

इस पूरी तस्वीर के बरक्स विपक्ष दिशाहीन दिखता है. राहुल गांधी का विपक्ष का सर्वसम्मत चेहरा होने का दावा अब बढ़ने के बजाए ठहर-सा गया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनके प्रदर्शन को लेकर जनमत ज्यादा दुविधाग्रस्त है. 'अच्छा' और 'शानदार' को मिलाकर अब यह आंकड़ा सिर्फ 44 फीसद रह गया है, जबकि अगस्त में यह 50.3 फीसद था. कांग्रेस की संस्थागत स्थिति भी कमजोर पड़ी है. इंडिया टुडे देश का मिज़ाज ट्रैकर दिखाता है कि कांग्रेस को 'अच्छा' या 'शानदार' मानने वालों का हिस्सा पिछले अगस्त के 47.2 फीसद से गिरकर अब 41 फीसद पर आ गया है.

वहीं 'खराब' या 'बहुत खराब' कहने वालों का आंकड़ा धीरे-धीरे 30-35 फीसद के बीच पहुंच गया है. जब पूछा गया कि क्या कांग्रेस ही 'असली विपक्षी पार्टी' है, तो हां कहने वालों का आंकड़ा पिछले साल के 60-70 फीसद के बीच से गिरकर अब 55 फीसद रह गया है. शायद इससे भी ज्यादा नुक्सानदेह संकेत यह है कि 'पता नहीं' या 'कह नहीं सकते' कहने वालों का हिस्सा 16 फीसद तक पहुंच गया है. करीब 62 फीसद लोग अब कांग्रेस को इंडिया ब्लॉक की 'कमजोर कड़ी' मानते हैं. बिहार की छाया यहां साफ दिखती है.

कुछ आंकड़े मौजूदा दौर की बेचैनी को सीधे दर्शाते हैं. वायु प्रदूषण 78.8 फीसद के साथ पहली बार सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हुआ है. 29 फीसद लोगों को डर है कि एआइ उनकी नौकरी छीन सकता है. नब्बे के दशक की हीरोइनों में अग्रणी रहीं माधुरी दीक्षित अब ओटीटी पर सबसे आगे हैं. अमिताभ बच्चन और विराट कोहली अपने-अपने मैदान में बादशाह बने हुए हैं. लेकिन सबसे टिकाऊ निष्कर्ष यही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक उथल-पुथल के दौर में राजनैतिक और आर्थिक स्थिरता देकर मतदाताओं की नजर में अपना खोया हुआ मोमेंटम फिर हासिल कर लिया है. देश का मिज़ाज सर्वे का यह जोरदार समर्थन उन्हें बड़े सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए और ज्यादा ताकत देगा, ताकि आर्थिक विकास को विकसित भारत की दिशा में तेज किया जा सके.

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