नारी शक्ति का बोलबाला

सेवेन सिस्टर्स डेवलपमेंट असिस्टेंस (सेस्टा) पूर्वोत्तर में विकास को गति देने के साथ बाकी लक्ष्यों के और करीब पहुंच रही: गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तीकरण, बेहतर स्वास्थ्य तथा जलवायु परिवर्तन से निबटने में सक्षम गांवों का निर्माण.

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असम के मोरीगांव जिले की गोवा पंचायत की सेस्टा लाभार्थी अपनी बकरियों के साथ

- अतीकुल हबीब

नागरिकों के आर्थिक जीवन से जुड़े सभी पहलुओं का विकास उनका अभिन्न अधिकार है. इसलिए इसकी शुरुआत इस सवाल के साथ हुई: सामुदायिक गतिविधियों के अपने सघन नेटवर्क के बावजूद पूर्वोत्तर भारत ऐसी विकास संस्थाओं से वंचित क्यों है जो लंबे समय तक टिकी रहें और स्थानीय वास्तविकताओं को समझें? निर्माण के सिद्धांत पर स्थापित सेवन सिस्टर्स डेवलपमेंट असिस्टेंस (सेस्टा) इस उम्मीद के साथ आगे बढ़ती रही कि स्थायी परिवर्तन अल्पकालिक परियोजनाओं से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर आजीविका के साधन, संस्थाओं और भरोसे को बढ़ाने के साथ ही आ सकता है.

सेस्टा के विकास कार्य गहराई तक नजर आते हैं. महिलाओं ने बाजार मूल्य पर मोलभाव करना सीख लिया है, कई परिवारों का पहला बैंक खाता खुला, परती भूमि का फिर से इस्तेमाल हो रहा है. यह संस्था ग्रामीण समुदायों, खासकर महिलाओं और वंचित समूहों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में जुटी है.

साथ ही उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के लिए भी प्रेरित करती है. सेस्टा का कार्य आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक समावेश को आपस में जोड़ता है. मुर्गी पालन और सुअर पालन, हथकरघा तथा कृषि क्षेत्र में प्रशिक्षण, कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच, वित्तीय/डिजिटल साक्षरता और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन प्रथाओं आदि के साथ जोड़ा जाता है.

निराली राभा 2021 से सुअर पालन फार्म चला रही हैं, जिसे शुरुआत में सेस्टा ने वित्त पोषित किया था. वे बताती हैं, ''कई योजनाएं तो मौजूद हैं पर हमें उनका लाभ उठाने का तरीका नहीं पता. सेस्टा हमें उन योजनाओं तक पहुंचने में मदद करती है जो हमारे कल्याण के लिए ही बनी हैं.’’ 2017 से सेस्टा से जुड़ी त्रिबिनी बाला राय बकरियां पालती हैं, मधुमक्खियां पालती हैं, काला चावल उगाती हैं और वर्मी कंपोस्ट का प्रबंधन भी करती हैं. उन्होंने केवल 2024 में ही 90,000 रुपए की वर्मी कंपोस्ट बेची है. वे कहती हैं, ''कम ब्याज वाले ऋण और प्रशिक्षण ने यह संभव बनाया.’’

सेस्टा के काम में चुनौतियां भी हैं. कार्यकारी निदेशक प्रद्युत भट्टाचार्य कर्मचारियों और वित्त पोषण की कमी को नियमित बाधा करार देते हैं. भौगोलिक स्थितियों के कारण यहां फील्डवर्क आसान नहीं है और इसके लिए समर्पित पेशेवरों—विशेषकर महिलाओं—को साथ जोड़ना भी खासा मुश्किल काम है. सेस्टा स्थिर रोजगार, वैधानिक लाभ और दीर्घकालिक करियर के अवसर प्रदान करके इस समस्या का समाधान करने का प्रयास करती है.

वित्त पोषण सीमित है. भट्टाचार्य कहते हैं, ''हमने उन निधियों को अस्वीकार कर दिया है जो हमारी पारिस्थितिकी या सामाजिक मूल्यों को कमजोर करने वाली होती हैं.’’ साथ ही जोड़ते हैं, ''भरोसा बढ़ाना हमारी सबसे बड़ी चुनौती है. हम नए विचारों के साथ समुदायों में प्रवेश करते हैं, लोगों से पुरानी परंपराओं की जगह नए तरीके इस्तेमाल करने का आग्रह करते हैं. लेकिन यह सब एकदम से मुमकिन नहीं होता. इसके लिए उनका भरोसा जीतना पड़ता है.’’

सेस्टा ने शुरू में ही समझ लिया था कि जो तरीका असम के बाढ़ग्रस्त मैदानी इलाकों में कारगर है, उसे मेघालय की पहाड़ियों अरुणाचल प्रदेश की दूरस्थ घाटियों में हू-ब-हू लागू नहीं किया जा सकता. हर प्रयास भूभाग, संस्कृति और स्थानीय बाजारों से प्रभावित होता है.

गुवाहाटी स्थित मुख्यालय के साथ सेस्टा 60 विकास खंडों में क्षेत्रीय कार्यालय संचालित करता है. इसके कुल 184 कर्मचारियों में करीब आधी महिलाएं हैं. सरकारी प्रणालियां बदलने के बजाए सेस्टा उनके साथ मिलकर काम करती है. यह हरेक खंड में महीनों नहीं, बल्कि वर्षों की प्रतिबद्धता के साथ मैदान में उतरती है ताकि पर्याप्त समय मिलने से कौशल हस्तांतरण हो सके.ठ्ठ

विशेषज्ञ की राय
सेस्टा को पता है कि ग्रामीण आजीविका जीवन का एक अभिन्न अंग है. यह समझ इसे स्थानीय माहौल के अनुकूल पायलट परियोजनाओं में शुरुआती निवेश करके ऐसे लोगों को तैयार करने के मामले में हमें आगे रखती है जो कौशल को ग्रामीण विकास के प्रति प्रतिबद्धता के साथ जोड़ते हैं.
—ध्रुव ज्योति गोगोई, राज्य परियोजना प्रबंधक, असम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन

आखिर क्यों है यह एक रत्न
●सेस्टा का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में क्षमता निर्माण करके पूर्वोत्तर को आर्थिक विकास की राह पर आगे बढ़ाना है.
●यह महिलाओं और वंचित तबके के लोगों को संगठित करके स्वयं सहायता समूह बनाने और छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करती है.
●सेस्टा ने असम, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश के 30 जिलों के 4,500 गांवों में 250,000 महिला किसानों और परिवारों के साथ काम किया है.

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