शिक्षकों के शिक्षक

पढ़ाई तक पहुंच से ज्यादा सीखने के नतीजों पर ध्यान केंद्रित करके और शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए मानक सर्वेक्षणों को अंजाम देकर प्रथम ने देशभर में स्कूलों के लिए नीति निर्माण और शिक्षण पद्धतियों पर गहरा असर डाला

प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी बेंगलूरू के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में

प्रथम ने सीधे-सादे विचार से शुरुआत की. वह यह कि देश में शिक्षा सुधार तभी सफल होंगे जब उनसे सरकार, बिजनेस और सिविल सोसाइटी जुड़े हों. इसी बुनियादी सोच ने प्रथम के मूल मिशन को आकार दिया—''हर बच्चा स्कूल में और अच्छा सीखे''—और आज भी इसका असर उसके काम पर दिखता है.

प्रथम के शुरुआती काम में शामिल थी मुंबई के गरीब क्षेत्रों में 150 बालवाड़ियों की स्थापना. ये समुदाय-संचालित प्रीस्कूल स्थानीय महिलाओं और न्यूनतम इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर थे. दो वर्ष में ही इनकी संख्या करीब 3,500 हो गई. अलबत्ता 1990 के दशक के आखिर में प्रथम ने प्रीस्कूल से आगे की पढ़ाई पर ध्यान दिया.

मुंबई के म्यूनिसिपल स्कूलों के साथ काम करते हुए उसने स्कूल से बाहर छूट गए बच्चों को मुख्यधारा में लाने के लिए शहरी 'ब्रिज कोर्स' की नई शुरुआत की. बालसखी कार्यक्रम भी चलाया जिसमें स्कूलों में नाम लिखवाने के बाद भी पिछड़ गए छात्र-छात्राओं को सुधार के लिए मदद दी जाती थी.

धीरे-धीरे संगठन ने कई सबक सीखे. सीईओ रुक्मिणी बनर्जी का कहना है कि नामांकन का मतलब सीखना नहीं होता. बच्चों को जब उम्र के बजाए सीखने के स्तर के हिसाब से समूह में रखा जाता है, तब वे ज्यादा तेज तरक्की करते हैं. पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले बच्चों को दूसरे मौके का हक है. इन गहरी बातों को प्रथम के दो सबसे असरदार नवाचारों में अभिव्यक्ति मिली है.

पहला है एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) जो हर ग्रामीण जिले में किया जाने वाला राष्ट्रव्यापी घरेलू सर्वे है. स्कूल में पढ़ाई के वर्षों के बजाए पढ़ने और अंकगणित के ज्ञान को मापकर एएसईआर ने भारत में शिक्षा की बहस को पहुंच से नतीजों की तरफ मोड़ दिया. 2016 से एएसईआर हर दूसरे साल किया जाता है, और बीच के संस्करण शुरुआती बचपन (4-8 साल की उम्र) और किशोरावस्था (14-18) समेत खास आयु समूहों पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

दूसरा है टीचिंग ऐट द राइट लेवल (टीएआरएल). प्रथम का यह नवाचार इस कड़वी सचाई का जवाब देता है कि कई बच्चे स्कूल में वर्षों बिताने के बावजूद पढ़ या जोड़-घटाव नहीं कर पाते. टीएआरएल योग्यता के हिसाब से बच्चों को समूहों में रखता है, आसान आकलनों का प्रयोग करता है, कक्षा स्तर के पाठ्यक्रम को कुछ वक्त तक एक ओर रख देता है और लक्ष्यबद्ध शिक्षा देता है. इसका सख्ती से मूल्यांकन किया गया और इसे पूरे भारत के अलावा 20 से ज्यादा देशों में अपनाया गया. विश्व बैंक के ग्लोबल एजुकेशन एविडेंस एडवाइजरी पैनल ने इसे वैश्विक शिक्षा में सबसे किफायती 'उत्कृष्ट निवेशों' में से एक माना है.

प्रथम ने तब से अपना दायरा बढ़ा लिया. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप तैयार इसका अर्ली ईयर्स प्रोग्राम हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में साझेदारी के जरिए खेल-आधारित सीख, किफायती सामग्री और माता-पिता की भागीदारी पर जोर देता है. 'हमारा गांव' पहल प्रथम को बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान पुख्ता करने के लिए 3-5 साल के लिए समुदायों से जोड़ती है. यह पहल 18 राज्यों के 5,000 से ज्यादा समुदायों तक फैली है. इसका 'सेकंड चांस' प्रोग्राम पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले बच्चों को कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी करवाता है; इस साल ऐसे करीब 12,000 बच्चे बोर्ड परीक्षा में बैठेंगे. वाकई प्रथम ने दिखा दिया कि प्रतिबद्धता, समुदाय और देखभाल असंभव को भी कैसे संभव कर सकते हैं.'' 

सीईओ की राय
प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी ने कहा, ''बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा की नींव मजबूत बनाना, पीछे छूट गए बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करना और शिक्षा व्यवस्था तथा समाज में समान रूप से लगातार इस पहल को अंजाम देना, अब भी यही हमारी सबसे बड़े चुनौती है.''

आखिर क्यों है यह एक रत्न

> कुल 26 राज्यों में मौजूदगी के साथ प्रथम साल में देशभर के अमूमन 70 लाख बच्चों तक पहुंच बनाता है.

> इसकी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) और टीचिंग ऐट द राइट लेवल (टीएआरएल) जैसी पहलकदमियां भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मानक बन चुकी हैं.

> 'हमारा गांव' कार्यक्रम के तहत प्रथम 3 से 5 साल तक समुदायों के साथ जुड़कर काम करता है, ताकि बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल पक्के किए जा सकें. यह कार्यक्रम 18 राज्यों के 5,000 से ज्यादा समुदायों के बीच संचालित है.

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