आत्मनिर्भरता का अरण्य
दशकों के जमीनी काम के जरिए कोप्पुला परिवार ने पारिस्थितिकी के सिद्धांतों को हजारों सीमांत और आदिवासी किसानों की आजीविका सुरक्षा में बदला.

अगर आप बिडकन्ने गांव में समम्मा, तुलजम्मा, पुष्पलता या किसी और से कोप्पुला परिवार के बारे में पूछें तो उनके चेहरे खिल जाते है. पहले मुस्कान आती है, फिर कहानियां—और अक्सर आंसू भी. गांव वालों का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में 66 साल के नरसन्ना और 56 साल की पद्मा कोप्पुला ने खामोशी के साथ उनके परिवारों के लिए जमीन, गरिमा और जिंदगी के मायने बदल दिए हैं जो कभी ग्रामीण जीवन के हाशिए पर बसर करते थे.
हमेशा ही सादे सूती कपड़े पहनने वाले पर्यावरणविद् दंपती 1987 से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में काम करते आ रहे हैं, जिससे उन किसानों को जमीन पाने और आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिली है जो 1990 के दशक तक भूमिहीन थे.
कोप्पुला दंपती ने 1999 में तेलंगाना के संगारेड्डी जिले में अपने घर को एक लर्निंग और कम्युनिटी की जगह में बदल दिया, जिसका नाम अरण्य (संस्कृत में वन) रखा गया. 11.5 एकड़ में फैली यह जगह कभी पथरीली बंजर जमीन थी. आज यह कृषि पारिस्थितिकी और वन कृषि के सिद्धांतों पर बना एक हरा-भरा प्राकृतिक खेत है. इसका आइडिया सीधा-सा है:
धरती को नुक्सान पहुंचाए बिना अन्न उगाना. नरसन्ना कहते हैं, ''अरण्य को ऐसे खेत के तौर पर विकसित किया गया जिसे छोटे और सीमांत किसानों को दिखाया जा सके कि कैसे एक से तीन एकड़ जमीन भी उनकी सभी जरूरतें पूरी कर सकती है. वे हेल्दी डाइट के लिए आवश्यक सब कुछ उगा सकते हैं, चाहे वह अनाज, दालें, सब्जियां, फल या मेवे हों या फिर नकदी फसलें और आर्थिक आत्म निर्भरता के लिए जानवर भी पाल सकते हैं.’’
कोप्पुला परिवार ने 2014 से अरण्य को दुनिया के लिए खोल दिया है जहां हर महीने 13 दिन का रेजिडेंशियल पर्माकल्चर (आवासीय कृषि पारिस्थितिकी) कोर्स चलाया जाता है. दिन की शुरुआत सुबह 6 बजे होती है और अक्सर देर रात तक गतिविधियां चलती रहती हैं. इस दौरान चर्चा और खेती का काम होता है. उनकी बेटी, दामाद और समुदाय के लोग इस प्रोग्राम को चलाने में मदद करते हैं और पक्का करते हैं कि यह ज्ञान अगली पीढ़ियों तक पहुंचे.
पद्मा कहती हैं, ''जमीन सबसे अच्छा नैतिक निवेश है और इसे कोई भी कर सकता है. यह अगली पीढ़ी को ताजा हवा, पौष्टिक खाना और अच्छी सेहत देती है.’’ वे कहती हैं कि महीने दर महीने कोर्स चलाना काफी मेहनत का काम है लेकिन इसका मकसद यह पक्का करना है कि हर उस व्यक्ति को सीखने का मौका मिले जो 13 दिन निकाल सकता है. बिना किसी विज्ञापन के, सिर्फ लोगों के सुझाने-बताने से, हर कोर्स में भारत और विदेश से 18 से 60 साल की उम्र के 20 से 50 लोग हिस्सा लेते हैं. पिछले दस साल में अरण्य में 72 देशों के 5,252 शिक्षार्थियों को ट्रेनिंग दी गई है.
आंध्र प्रदेश टाउनशिप ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के चेयरमैन अजय कुमार वेमुलापति ने इस दंपती की तुलना कुंग फू पांडा के ग्रैंडमास्टर ऊगवे (एक प्राचीन कछुआ मेंटर) से की है जिनके पास विश्वास और स्पष्टता के साथ नेतृत्व, गहरी समझ और जिंदगी से सीखा जीवन भर का अनुभव है. वे कहते हैं, ''1980 के दशक से उनकी जिंदगी एक सहज सिद्धांत पर आधारित रही है: प्रकृति से आप जो लेते हैं, उसे वापस दें, और जरूरत से ज्यादा कभी न लें.’’
जब वे पढ़ा नहीं रहे होते, तो दोनों पति-पत्नी तेलंगाना और उसके बाहर खूब यात्रा करते हैं और किसानों को टिकाऊ खेती और जलोद्धार के बारे में सलाह देते हैं. उन्होंने निर्मल और आदिलाबाद जिलों में 1,300 से ज्यादा आदिवासी परिवारों और संगारेड्डी में 2,600 किसानों के साथ काम किया है, उन्हें जमीन दिलाने, पैदावार बढ़ाने और प्राकृतिक खेती के जरिए आत्मनिर्भर बनने में मदद की है. सरकारें भी उनसे सलाह लेती हैं.
आज अरण्य एग्रीकल्चरल अल्टरनेटिव्स राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन के तहत तेलंगाना के तीन जिलों में एक लीड नेचुरल फार्मिंग इंस्टीट्यूट (एलएनएफआइ) के तौर पर काम करता है. कोप्पुला परिवार ने आंध्र प्रदेश के 36 गांवों में 15,000 किसानों को जोड़ते हुए बड़े पैमाने पर सूखे से निबटने में मदद की है, साथ ही उन्होंने आजीविका में सुधार और सामुदायिक तालाब प्रबंधन परियोजनाओं में सहायता की है.
अरण्य में कुछ ऐसे मेहमान भी आते हैं जिनकी उम्मीद नहीं होती—जैसे फिल्ममेकर एस. एस. राजमौलि—जो फूड फॉरेस्ट बनाने के लिए मार्गदर्शन लेने आते हैं. पदनाम गेट पर ही छोड़ दिए जाते हैं. जो बचता है वह है कोप्पुला परिवार की नीति: देसी पेड़ लगाओ, जमीन और जानवरों का सम्मान करो, ऑर्गेनिक चीजों का आदर करो और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार पक्का करो.
लाभार्थी की राय
बिडकन्ने गांव, जिला संगारेड्डी, तेलंगाना निवासी सामम्मा ने कहा कि कोप्पुला परिवार ने हमें जो सबसे बड़ा तोहफा दिया, वह था जमीन का मालिकाना हक. आज यहां के 150 परिवारों में से हरेक के पास दो एकड़ जमीन है. हम रीजेनरेटिव खेती करते हैं, अलग-अलग फसलें उगाते हैं, दुधारू जानवर पालते हैं. हर परिवार हर महीने लगभग 30,000 रुपए कमाता है और आत्मनिर्भर है.
आखिर क्यों है यह एक रत्न
●11.5 एकड़ की पथरीली बंजर जमीन एक हरे-भरे प्राकृतिक कृषि क्षेत्र में बदल गई, जो बताती है कि कैसे सतत कृषि और वन कृषि खाद्यान्न सुरक्षा, आय और पारिस्थितिकीय संतुलन दे सकते हैं.
●सूखाग्रस्त क्षेत्र में पानी के उचित इस्तेमाल के तरीकों के बारे में 2,50,000 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया; 20,000 अन्य किसानों और छात्रों को पर्माकल्चर डिजाइन के सिद्धांतों की ट्रेनिंग दी गई.