बड़े शहरी सुधार का बनाया रास्ता
जनाग्रह राष्ट्रीय नीति की वकालत से लेकर जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण कर रहा. उसने दिखाया कि कैसे धैर्य के साथ किए गए संस्थागत सुधार बड़े पैमाने पर बदल सकते हैं भारतीय शहरों का चेहरा

- अजय सुकुमारन
वर्ष 2001 में जब जनाग्रह की स्थापना हुई, तब उसका विचार कुछ रूमानी था कि नागरिकों की संगठित आवाज के जरिए भारत के चरमराते शहरों को ठीक किया जा सकता है. स्वाति और रमेश रामनाथन अमेरिका में सफल करियर छोड़कर लौटे थे. उनका मानना था कि भागीदारी वाले लोकतंत्र से शहरों की बिगड़ी हालत को दुरुस्त किया जा सकता है. हकीकत जल्द सामने आ गई.
स्वाति के शब्दों में, ''हम समस्या सुलझाने के नजरिए के साथ आए थे. हमारे शहरों में क्या गड़बड़ है? सरकार इसे क्यों नहीं ठीक कर पा रही? लिहाजा, हम क्या कर सकते हैं?'' इस सोच से एक अहम सचाई समझ में आई: ''अगर आपकी बड़े पैमाने पर बदलाव लाने की महत्वाकांक्षा है, तो आप सरकार के साथ काम करने से बच नहीं सकते. सरकार ही वह जरिया है जिसके जरिए बड़े पैमाने पर काम होता है.'' सरकार के साथ इस संपर्क का मतलब कभी भी गलबहियां करना नहीं था. अगले 25 साल में संगठन राष्ट्रीय नीति की वकालत और जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण के बीच सहज तरीके से काम करता रहा—सरकारों के इन सुधार में मदद करता रहा कि शहरों की प्लानिंग, निर्माण और वित्त की व्यवस्था कैसे की जाए.
उसने पहली बड़ी नीतिगत उपलब्धि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय पुररुद्धार मिशन (जेएनएनआरयूएम) के रूप में हासिल की जिसे 2005 में शुरू किया गया था. यह यूपीए सरकार का प्रमुख शहरी कार्यक्रम था जिसने केंद्र की फंडिंग को योजना, शासन और पारदर्शिता में सुधारों से जोड़ा. सीईओ श्रीकांत विश्वनाथन कहते हैं, ''कम लोगों को पता है कि जेएनएनयूआरएम को जनाग्रह ने बनाया था.'' इस कार्यक्रम ने लोगों को शहरी सुधारों के प्रति ज्यादा गंभीर होने और उनके लिए जोर देने को प्रोत्साहित किया.
नीति के साथ-साथ जनाग्रह ने शहरी डिजाइन में बड़ी उपलब्धि हासिल करने से पहले नागरिकों के लिए 'आइ पेड अ ब्राइब' और 'आइ चेंज माइ सिटी' जैसे टूल्स-प्लेटफॉर्म के साथ प्रयोग किया. 2011 में उसके सहयोगी संगठन जन अर्बन स्पेस फाउंडेशन ने टेंडरश्योर शुरू किया. यह एक स्टैंडर्ड रोड डिजाइन था जिसने सड़कों को सार्वजनिक स्थान के रूप में फिर से परिभाषित किया. समतल फुटपाथ, साइकिल ट्रैक, सुव्यवस्थित नालियां जैसी सुविधाएं अचानक संभव हो गईं जो अरसे से भारतीय सड़कों पर नहीं दिखती थीं. आज बेंगलूरू में 174 किमी टेंडरश्योर सड़कें चालू हैं, सैकड़ों सड़कें वहां और उत्तर प्रदेश के 17 शहरों में बन रही हैं.
सबसे अहम सुधार 2020 में हुआ. जनाग्रह ने 15वें वित्त आयोग से पैरवी की कि शहरी स्थानीय निकायों को अनुदान के लिए ऑडिटेड वित्तीय ब्यौरे छापना जरूरी किया जाए जिसे उसने मान लिया. इसका दूरगामी असर हुआ: भारत के 4,300 से ज्यादा शहरी निकायों में से 95 प्रतिशत अब ऑडिटेड वित्तीय ब्योरे छापते हैं. जनाग्रह ने सिटीफाइनेंस.इन बनाने में भी मदद की, जो इस बदलाव में मददगार बनी.
इसकी इतनी अहमियत क्यों है? क्योंकि बैलेंस शीट भरोसेमंद हो तो पूंजी मिलती है. विश्वनाथन कहते हैं, ''एक बार डेटा की विश्वसनीयता बेहतर हो जाए, तो आपको शहरों की वित्त उपलब्धता में बड़ा बदलाव नजर आएगा.'' 2050 तक आधे से ज्यादा भारत शहरों में होगा. जहां तक जनाग्रह की बात है तो बहुत कुछ किया जाना है और गंवाने को बिल्कुल समय नहीं.
लाभार्थी की राय
''जनाग्रह के प्रयासों से बना गठबंधन 'वार्ड समिति बलगा' वार्ड के सक्रिय नागरिकों को जोड़ती है और नगरी अधिकारियों के साथ सीधे जुड़ाव का रास्ता बनाती है—शिकायत ही नहीं बल्कि समाधान देने के लिए भी.''
विद्या गोगी, कोर टीम सदस्य, वार्ड समिति बलगा, बेंगलूरू
आखिर क्यों है यह एक रत्न
> शहरी पुनरुद्धार को राष्ट्रीय नीति में शामिल करने में मदद की, जिससे शहर का प्रशासन ज्यादा जवाबदेह और सुधारोन्मुखी बना.
> दिखाया कि सरकार के साथ काम करके और बिना उससे प्रभावित हुए भी वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है.
> शहरी निकायों के ऑडिट किए गए खातों या मानकीकृत सड़क डिजाइन के जरिए इसने उन साधनों को मजबूत किया जो शहरों के स्थायी विकास के लिए जरूरी.