भारत के रत्न
उन व्यक्तियों और संस्थाओं की बेहतरीन मिसालें जो दूरदराज के गांवों, कसमसाते शहरों और नाजुक इको-सिस्टम में जीते लोगों की जिंदगी बदल रहे.

नगालैंड के मोन जिले के एक सरकारी अस्पताल में टीबी यानी तपेदिक का इलाज एक नियमित ढर्रे पर चलता था. मरीज तब जाकर अस्पताल पहुंचते जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती, इसका निदान ढूढ़ने में कई दिन लग जाते और अक्सर बीमारी की जड़ पता चलने के बाद ही कोई इलाज शुरू हो पाता था. अस्पताल में कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं था. जांच और इलाज बस इसी तरह टलते रहते थे.
यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई जब एक कॉम्पैक्ट बैटरी-चालित निदान प्रणाली स्थापित की गई. यह उपकरण 90 मिनट के भीतर जांच के नतीजे बता देता था. जांच के बाद एक दिन के भीतर मरीजों का इलाज भी शुरू हो जाता. वैसे इस बात का जश्न मनाने के लिए न तो कोई समारोह हुआ और न ही इसका ढिंढोरा पीटा गया. बस एक ऐसी प्रणाली आ गई जिससे बेहतर सुविधा मिलने लगी थी.
यही वह भारत है जिस पर इंडिया टुडे का इस बार का गणतंत्र दिवस विशेषांक केंद्रित है. इसी भारत को आकार देने में कई शख्सियतें और संस्थाएं चुपचाप उन समस्याओं का समाधान निकाल रही हैं जो गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं और मानवीय लिहाज से उन्हें दूर किया जाना बेहद जरूरी है. दरअसल, ये ही हैं भारत के असली रत्न.
ये किसी एक क्षेत्र या विचारधारा से नहीं आते. ये स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पर्यावरण, न्याय, शहरी प्रशासन, आजीविका सरीखे विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं. कई तो ऐसे हालात में काम करते हैं, जहां पहुंचकर सारी आदर्शवादिता ध्वस्त हो सकती है—दूरदराज के दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र, नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, बोझ तले दबी सार्वजनिक मशीनरी, वंचित समुदाय और फिर वित्तीय इंतजामों का अभाव. फिर भी वे अच्छे नतीजे देते हैं.
नगालैंड में उस नैदानिक उपकरण को लगाने में सहयोग देने वाला इंडिया हेल्थ फंड इस लिहाज से एक उत्कृष्ट मिसाल है. टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से 2017 में इसकी स्थापना की गई और इसके पीछे रतन टाटा की सोच यही थी कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को उपेक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान करना चाहिए. इस तरह की विभिन्न पहलकदमियों में सारा जोर दिखावे के बजाय व्यावहारिकता पर होता है, और यह बात आगे के पन्नों में स्पष्ट नजर भी आएगी.
अक्षय पात्र का स्कूल मील कार्यक्रम दुनिया में किसी गैर-लाभकारी संस्था की ओर से संचालित ऐसी सबसे बड़ी पहल है. औद्योगिक सटीकता, नई डिजाइन की मशीनों, समन्वित आपूर्ति शृंखला और सुदृढ़ व्यवस्था के साथ प्रतिदिन 20 लाख से ज्यादा बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है. कोविड के समय में यही बुनियादी ढांचा बिना किसी रुकावट के आपातकालीन खाद्य राहत में तब्दील हो गया.
आजी केयर की शुरुआत एक अलग ही तरह की समस्या के समाधान के तौर पर हुई. जब प्रसाद भिड़े की मां महीनों बिस्तर पर रहीं, तो उन्होंने पाया कि भारत में बुजुर्गों की देखभाल की व्यवस्था कितनी कमजोर है. इसे ध्यान में रखकर ही उन्होंने एक मजबूत ढांचा तैयार किया. वह था—पेशेवर देखभालकर्ताओं को प्रशिक्षण, डिमेंशिया और गंभीर बीमारियों के लिए असिस्टेड-लिविंग सेंटर खोलना.
कुछ अन्य परिवर्तन संस्थाओं के बाहर भी हो रहे हैं. गुजरात के अमरेली जिले में सावजीभाई ढोलकिया ने वर्षा जल संचयन के माध्यम से झीलों को पुनर्जीवित किया, जिससे कृषि और आजीविका को बढ़ावा मिला. तेलंगाना में नरसन्ना और पद्मा कोप्पुला ने यह दिखाया कि रीजेनरेटिव फार्मिंग अच्छी उपज देने वाली और टिकाऊ दोनों हो सकती है. गुरुग्राम में पारिस्थितिकीविद् विजय धस्माना ने देशी पारिस्थितिकीय तंत्रों को पुनर्जीवित करके खनन के कारण बंजर हुई भूमि को अरावली जैव विविधता पार्क में बदल दिया.
न्याय व्यवस्था में भी चुपचाप नए बदलाव दस्तक दे रहे हैं. फ्लेविया एग्नेस की तरफ से 1991 में स्थापित द मजलिस लीगल सेंटर फॉर वुमेन ऐंड चिल्ड्रेन ने यह महसूस किया कि हिंसा पीड़ितों को ऐसी कानूनी व्यवस्था की जरूरत है जो बिना किसी परेशानी के उनकी रक्षा कर सके. वहीं असम में उत्साह नाम की संस्था असम पुलिस शिशु मित्र कार्यक्रम के जरिए बाल-हितैषी पुलिसिंग को संस्थागत रूप देने में जुटी है.
सामूहिक रूप से इस तरह की पहलकदमियां एक सकारात्मक शक्ति का निर्माण करती हैं, जिससे पूरे भारत में चुपचाप कई परिवर्तनकारी कार्य हो रहे हैं.
इस गणतंत्र दिवस पर हम भारत के ऐसे ही अनमोल रत्नों का सम्मान केवल उनकी प्रेरणा के लिए नहीं बल्कि उनसे मिलने वाली सीख के लिए भी कर रहे हैं. एक ऐसा देश जो अक्सर बड़े-बड़े वादों और अल्पकालिक मुद्दों में उलझ जाता है, वहां ये पहलकदमियां एक व्यावहारिक आदर्श के तौर पर सामने आती हैं. बहरहाल, केवल तालियां बजाना नहीं, बल्कि उनसे प्रेरित होकर उनका अनुकरण करना ही हमारी प्रशंसा की सच्ची कसौटी साबित हो सकता है.
स्वास्थ्य सेवा से लेकर पर्यावरण तक, विभिन्न क्षेत्रों की ये शख्सियतें और संस्थाएं चुपचाप उन समस्याओं का समाधान निकाल रही हैं जो देश में गहराई से जड़ जमा चुकी हैं.