अपना परिवेश बचाने की पहल
सिक्किम में एक स्वयंसेवी संगठन गांव वालों को सस्टेनेबल टूरिज्म और पानी के बेहतर इंतजाम के जरिए मजबूत बना रहा. यह कोशिश है पर्यावरण को हुए नुक्सान की भरपाई करने की.

इस स्वयंसेवी संगठन या एनजीओ के काम की सिक्किम में दो मजबूत धुरी हैं: पानी और पर्यटन. अगर इन दोनों को समझदारी से साध लिया जाए तो इसका नतीजा एक सकारात्मक चक्र के रूप में निकलता है. बेहतर खेती, स्थायी आमदनी और स्थानीय लोगों के लिए काम के नए मौके. इस एनजीओ का नाम है इकोटूरिज्म ऐंड कंजर्वेशन सोसाइटी ऑफ सिक्किम (ईसीओएसएस या ईकॉस).
यह एक जमीन से जुड़ा संगठन है, जो पिछले दो दशकों से देश में पर्यावरण के लिहाज से सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक में काम कर रहा है. मकसद है कि पर्यावरण से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की आवाज मजबूत हो. जनवरी 2001 में शुरू हुआ यह संगठन गंगटोक में स्थित है. इसकी सोच सीधी है: सिक्किम की प्राकृतिक संपदा तब तक नहीं बचाई जा सकती, जब तक स्थानीय समुदाय बातचीत की अगुआई न करें.
ईकॉस की रणनीति में इको-फ्रेंड्ली होमस्टे अहम हिस्सा रहे हैं. ग्रामीण सिक्किम में अलग-अलग मॉडल का अध्ययन, उनके आर्थिक और सामाजिक असर को दर्ज करना और इन नतीजों को सरकार तक पहुंचाना इस प्रक्रिया का हिस्सा रहा है. इससे यह तय करने में मदद मिली कि नियम जमीन की हकीकत से जुड़े रहें. एक स्थानीय होमस्टे मालिक पॉल कर्ण राय कहते हैं, ''इसकी सफलता देखकर युवा आगे आए हैं.
कई लोग अपने होमस्टे शुरू करना चाहते हैं. जो ट्रैकिंग रूट कभी सूने थे, वहां अब फिर से रौनक है. सैलानियों को ऑर्गेनिक खाना, साफ पहाड़ी हवा और जीवंत पहाड़ी जीवन का अनुभव मिल रहा है.’’ ईकॉस के संस्थापक और चेयरमैन प्रेम दास राय कहते हैं, ''जैसे ही कुछ परिवारों ने देखा कि होमस्टे से कमाई भी हो सकती है और स्थानीय संस्कृति तथा सम्मान भी बना रहता है, यह मॉडल अपने आप चल पड़ा.’’ इस संगठन ने राज्य के वन विभाग के लिए जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी परियोजना के तहत पांच साल की इकोटूरिज्म मार्केटिंग योजना भी तैयार की है.
पानी दूसरी बड़ी चिंता है, जो पूरे हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी है. राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के साथ मिलकर ईकॉस ने रायगांव में जल संरक्षण परियोजना लागू की. इसका मकसद पहाड़ी जल स्रोतों को फिर से जिंदा करना है. इन प्रयासों में झरनों का पुनरुद्धार और भूजल को रिचार्ज करना शामिल है, जो पीने के पानी और खेती दोनों के लिए जरूरी है.
आज ईकॉस ऐसी मिसाल बन चुका है, जो सिक्किम के साथ खुद भी विकसित हुआ है. यह स्थानीय हकीकत से जुड़ा, समुदायों का भरोसा प्राप्त और सरकारों तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के बीच सम्मान की नजर से देखा जाता है. इसकी कहानी किसी अजूबे की नहीं, बल्कि लगातार और सोच-समझकर किए गए काम की है. ऐसा काम, जो पूर्वी हिमालय के संवेदनशील इलाके में विकास को देखने और समझने का नजरिया बदल रहा है.
विशेषज्ञ की राय
ईकॉस की सबसे बड़ी ताकत है स्थानीय लोगों से उनकी भाषा में बात कर उनके रीति-रिवाजों को समझते हुए उनसे जुड़ना. स्थानीय लोग नई पहल को अपनाते हैं.
—ओमी गुरुंग, पर्यावरणविद्, ग्रीन मैन ऑफ सिक्किम के नाम से मशहूर
आखिर क्यों है यह एक रत्न
●इस एनजीओ ने सिक्किम के आसपास 100 नए होमस्टे तैयार करने में मदद की जो कि फायदेमंद होने के साथ पर्यावरण के प्रति जवाबदेह भी हैं.
●इसने कुदरती जल स्रोतोंं को फिर से जिंदा किया जो पेयजल और खेती के लिहाज से जरूरी हैं.