अमरेली का भगीरथ

पानी की कमी झेलने वाले अमरेली में ढोलकिया फाउंडेशन के झीलों को पुनजीर्वित करने के प्रयासों ने वहां के बदहाल किसानों की जिंदगी बदलकर रख दी

मॉनसून का वर्षा जल संग्रहण

दरअसल गुजरात के अमरेली जिले का नाम लेते ही एक ऐसे क्षेत्र की तस्वीर जेहन में उभरती है जो हमेशा से सूखा और बंजर रहा है. कई क्षेत्रों में पानी जमीन से 600-700 फुट नीचे मिलता है और उसमें टीडीएस (कुल घुलनशील ठोस) का स्तर काफी ज्यादा होता है. मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर स्थानीय लोगों के बीच काम के लिए पलायन आम बात है. सो, 1970 के दशक में कुछ युवा उद्यमी सूरत पहुंचे और हीरे के व्यापार से जुड़ गए तथा पॉलिशिंग इकाइयां स्थापित कीं.

कुछ हीरा व्यापारी अरबपति उद्योगपति बन गए. सबसे बड़ी कंपनी हरि कृष्ण एक्सपोर्ट्स उन्हीं में एक है, जिसकी कमान सावजी ढोलकिया के हाथ में है. 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद ढोलकिया अपने गृह क्षेत्र को बेहतर बनाने के संकल्प के साथ अमरेली के लाठी तालुका में अपने गांव दुधाला लौट आए. वहां पानी की कमी सबसे अहम मुद्दा था. पानी का एकमात्र स्रोत मॉनसून की बारिश होता था जो बरसाती गागदियो नदी के रास्ते आता था. यह क्षेत्र से बहने वाली शेत्रुंजी की सहायक नदी है. इसका पानी अमूमन दीवाली (अक्तूबर) तक सूख जाता है.

ढोलकिया ने अपनी कंपनी के सीएसआर फंड से गागदियो नदी के तल में 22 एकड़ का तालाब बनवाने का फैसला किया. उन्होंने नदी की खुदाई और बांध बनाकर मॉनसून का जल जमा करने की व्यवस्था की. इस तरह बना अमृत सरोवर जल्द सफल हो गया. वे कहते हैं, ''फाउंडेशन के सीएसआर फंड से दुधाला को भी एक आदर्श गांव के रूप में विकसित किया गया.'' फाउंडेशन ने राज्य सरकार को वर्षा जल संग्रहण के लिए हर गांव में ऐसे तालाब बनाने का सुझाव दिया क्योंकि सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण सिंचाई (एसएयूएनआइ) योजना के तहत पाइपलाइनों से नर्मदा बांध का पानी सौराष्ट्र लाना बहुत महंगा पड़ रहा था. लेकिन सुझाव पर कोई कदम नहीं उठाया गया.

अगले आठ वर्षों तक क्षेत्र के एक दर्जन गांवों ने ढोलकिया से अपने गांवों के लिए इसी तरह के तालाब बनाने का अनुरोध किया. 2017 में सावजीभाई ने फिर से इसको गंभीरता से लिया. पहली परियोजना के तहत हरि कृष्ण सरोवर तीन गांवों के मुहाने पर बनाया गया जो 120 एकड़ में फैला था. खुदाई में निकली मिट्टी से पास में एक बगीचे का निर्माण किया गया जो ग्रामीणों के लिए एक लोकप्रिय पिकनिक स्थल बन गया है. लगभग 50,000 लोगों की आबादी वाले तीनों गांव अब इतने आत्मनिर्भर हो गए हैं कि उन्हें सरकारी जल आपूर्ति की जरूरत नहीं पड़ती.

इससे उत्साहित ढोलकिया ने अपनी निजी संपत्ति का 10 फीसद हिस्सा इस संस्था को दान करने का फैसला किया ताकि ऐसे ही 100 तालाब निर्मित किए जा सकें, उनमें 75 बनकर तैयार हैं. चामरदी गांव से करांकाच तक 52.9 किलोमीटर क्षेत्र में अब 149 बांध बन गए हैं. नदी के आसपास की भूमि पर सड़कों के दोनों तरफ फलदार पेड़ लगे हैं.

अमरेली के शुष्क भूभाग में यह क्षेत्र एक हरा-भरा नखलिस्तान बन गया है. पक्षियों की चहचहाहट फिर सुनाई देने लगी है और जलीय जीवन फल-फूल रहा है. बीते आठ वर्षों में कुछ क्षेत्रों में जलस्तर 15 फुट तक बढ़ गया है. किसान अब साल में तीन फसलें उगाने में सक्षम हो गए हैं. ढोलकिया कहते हैं, ''हमने पानी का कोई नया स्रोत नहीं जोड़ा; इसे केवल वर्षा जल को संचित करके बनाया गया है.'' वे बताते हैं कि मौजूदा समय में 75 गांवों को इस बदली पारिस्थितिकी का लाभ मिल रहा है.

अब राज्य सरकार ने भी इस पर ध्यान दिया और ढोलकिया फाउंडेशन से उत्तर गुजरात के सिद्धपुर तालुका में अर्ध-शुष्क नदी घाटियों में ऐसे तालाब बनाने का आग्रह किया है, जिसकी लागत सरकार साझा करेगी.

आखिर क्यों है यह एक रत्न

> ढोलकिया ने सबसे पहले 2008 में अपने गांव दुधाला में गागदियो नदी क्षेत्र में 22 एकड़ का तालाब बनवाया. यह 'अमृत सरोवर' सफल रहा.

> अगली परियोजना के तहत 2017 में तीन गांवों के बीच 120 एकड़ का हरि कृष्ण सरोवर बना. यह 50,000 लोगों की जरूरत पूरी करता है.

> ढोलकिया ने अपनी संपत्ति का 10 फीसद हिस्सा फाउंडेशन के लिए अलग रखा. फाउंडेशन ने 100 तालाबों की योजना बनाई है, जिनमें से 75 तैयार हो चुके हैं. इसके साथ ही साल 2030 तक 1 करोड़ पेड़ लगाने का भी लक्ष्य है.

> राज्य सरकार ने फाउंडेशन से अन्य सूखे क्षेत्रों में भी लागत साझा करके इसी तरह के तालाब बनाने का आग्रह किया है.

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