पहाड़ों में मदद का हाथ

मेघालय में शारीरिक और मानसिक चुनौती झेल रहे बच्चों के बीच बेथनी सोसाइटी के काम ने उनमें से कइयों की जिंदगी बदल दी

ज्योति स्रोत स्कूल के कंप्यूटर लैब में नेत्रहीन छात्र

- अपरमिता दास

बयालीस वर्षीया पिन्होई टैंग को आज भी याद है कि हर सुबह जब दूसरे बच्चे स्कूल बैग लिए सामने से गुजरते थे तो सड़क किनारे खड़ी वे किस कदर रोती थीं. दृष्टिबाधित होने और स्कूल से बार-बार निकाल दिए जाने के बाद उनके मामले को मुश्किल करार दे दिया गया था. 1990 के दशक के मध्य में एक पड़ोसी उन्हें शिलांग में बेथनी सोसाइटी ले गए. बाद में उनकी मां तो अपने गांव लौट गईं, वे वहीं रुक गईं. आज पिन्होई शिलांग के एनईआइजीआरआइएचएमएस अस्पताल में काम करती हैं, अपने परिवार की पैसों से मदद करती हैं, और बेथनी के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं.

पिन्होई के जैसी कई कहानियों ने 1981 से बेथनी सोसाइटी के काम को परिभाषित किया है. सुदूर गारो हिल्स में काम कर रही स्पैनिश नन सिस्टर रोजारियो लोपेज ने इस सोसाइटी की स्थापना की थी. बार-बार अंधे, बहरे या बौद्धिक चुनौती झेल रहे बच्चों से मिलने पर उन्होंने इसकी शुरुआत की. स्वास्थ्य सेवा के रूप में शुरू हुआ यह काम दिव्यांगता-केंद्रित हस्तक्षेप में बदल गया. 1980 के दशक का मध्य आते-आते बेथनी ने तुरा को अपना संचालन केंद्र बनाया और 1992 में शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए शिलांग में ज्योति स्रोत स्कूल और रोइलांग लाइवलीहुड एकेडमी खोली.

बेथनी की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और खुद भी दृष्टिबाधित बर्था जी. दखार याद करती हैं, ''1990 के दशक की शुरुआत में जब स्कूल शुरू हुआ, मेघालय में अक्षमता के बारे में जागरूकता बहुत कम थी. जब मैं यानी अंधी खासी महिला स्कूल से जुड़ी, तो मेरा मजाक उड़ाया गया. स्कूल मात्र आठ छात्रों के साथ शुरू हुआ था. कई बीच में ही छोड़कर चले गए. पहले बैच में से मात्र दो ने कक्षा 10 पास की. लेकिन एक दशक बाद जब छात्र बोर्ड की परीक्षा पास करने लगे, तो लोगों की राय बदल गई.''

निर्णायक मोड़ 2006 में आया, जब ज्योति स्रोत पूरी तरह समावेशी बन गया. अक्षम और सक्षम बच्चे एक साथ पढ़ते हैं और राज्य के एक ही पाठ्यक्रम की पढ़ाई करते हैं. कुछ अलग है तो वह है सहायता: दृष्टिहीन बच्चे डिजिटल साधनों का इस्तेमाल करते हैं, बधिर छात्र संकेत भाषा के इंटरप्रेटर के साथ काम करते हैं, ऑटिस्टिक या स्वलीन छात्रों के लिए सीखने की लचीली समय सीमाएं हैं.

शुरुआत में इस कदम का स्वागत नहीं किया गया. जब बेथनी ने पहली बार ऐसे समावेशन का प्रस्ताव रखा, सरकारी अफसरों ने आगाह किया कि इससे शिक्षा का स्तर गिर जाएगा. उसी साल देश भर में सर्व शिक्षा अभियान शुरू हुआ और बाद में शिक्षा विभाग ने ज्योति स्रोत को मॉडल स्कूल के रूप में मान्यता दी.

स्कूल के साथ-साथ यह संस्था विकास के समुदाय-आधारित नजरिए का पालन करती है और स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, सामाजिक समावेश और सशक्तीकरण के क्षेत्रों में काम करती है. अक्षमताओं से ग्रस्त लोगों और दरकिनार परिवारों को यह सरकार की मौजूदा योजनाओं से भी जोड़ती है, जिसमें पहुंच, सुभीते और हिमायत पर ध्यान दिया जाता है.

बेथनी का काम मुख्य रूप से मेघालय के भीतर ही लेकिन उसने कार्यक्रम साझा करने और क्षमता का निर्माण करने के लिए पूरे उत्तरपूर्व के संगठनों के साथ भागीदारियां कायम की हैं. जब कार्यक्रम सुचारु रूप से चलने लगता है, तो या तो उन्हें सौंप दिया जाता है या इस तरह सहारा दिया जाता है कि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें. इस तरह संगठन जरूरत के नए क्षेत्रों में आगे बढ़ पाता है.

आज बेथनी सांस्थानिक सेवाओं और ग्राम स्तर के कार्यक्रमों के जरिए काम करती है, जो इस विश्वास पर आधारित है कि व्यवस्थाओं को लोगों के हिसाब से ढलना होगा, न कि लोगों को व्यवस्थाओं के हिसाब से.

मदद पाने वाले की राय
दृष्टिबाधित पूर्व छात्रा पिन्होई टैंग ने कहा, ''बेथनी में आने से पहले मैं हर सुबह बच्चों को स्कूल जाते देख सड़क किनारे रोया करती थी. बेथनी में मैंने सीखा कि मैं बेकार नहीं हूं. इसने मुझे जीने के, अपनी रक्षा के और दूसरों को ऊपर उठाने के साधन दिए.''

आखिर क्यों है यह एक रत्न

> ज्योति स्रोत स्कूल 2006 में समावेशी बना, जहां अक्षम और सक्षम बच्चे एक साथ पढ़ने लगे.

> स्वास्थ्य, आजीविका और सामाजिक समावेश सरीखे कई क्षेत्रों में यह काम करता है, समुदाय आधारित नजरिया अपनाता है.

> पूरे उत्तरपूर्व के संगठनों के साथ भागीदारी कायम करके कार्यक्रम साझा करता है और क्षमता का निर्माण करता है.

Read more!