बचाई धान की धरोहर
धान की कुछ पारंपरिक किस्मों का संरक्षण बसुधा का एक बेहद सराहनीय कार्य. इसने न केवल विलुप्ति की कगार पर पहुंचे बीजों को संरक्षित किया बल्कि जैव विविधता के संरक्षकों का जमीनी नेटवर्क भी बना डाला.

परिस्थितिकीय कृषि और संरक्षण को समर्पित बसुधा नाम का उपक्रम एक ट्रस्ट है जो सेंटर फॉर इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज (सीआइएस) के तहत काम करता है. सीआइएस एक बड़ा संगठन है जिसके तहत पारंपरिक फसल विविधता, खासकर भारत में धान की देसी किस्मों के संरक्षण पर काम किया जाता है.
बसुधा (बांग्ला में 'धरती माता’) दक्षिणी ओडिशा के रायगढ़ जिले के बिसम कटक क्षेत्र स्थित एक आदिवासी गांव में 1.7 एकड़ के फार्म से संचालित है. किसान और शोधकर्ता वहां इकट्ठा होते हैं और पारंपरिक कृषि पद्धतियों, जैविक खेती, पारिस्थितिकीय ताने-बाने और कृत्रिम पदार्थों के इस्तेमाल के बिना खेती के बारे में सीखते हैं.
इस केंद्र का असल मकसद धान की देसी किस्मों को संग्रहीत कर उनका पुनर्जनन करना है. संरक्षण वैज्ञानिक और इसके संस्थापक देबल देव बताते हैं कि उन्होंने पिछले कई वर्षों में धान की 1,480 किस्में एकत्र की हैं, जिनमें से करीब 800 किस्में केवल बसुधा के फार्म या राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय जीन बैंकों में संरक्षित हैं. इसके अलावा 180 'दुर्लभ’ किस्में ऐसी हैं जो बसुधा के फार्म के बाहर कहीं मौजूद नहीं.
आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए केंद्र हर साल धान की हरेक प्रजाति में 56 फेनोटाइपिक विशेषताओं का सत्यापन करता है. देव बताते हैं कि 1970 के दशक तक भारतीय उपमहाद्वीप में चावल की लगभग 1,10,000 अलग-अलग किस्में पाई जाती थीं. लेकिन दशकों से औद्योगिक संकर बीज अपनाने और आधुनिक फसल पद्धतियों ने इस विविधता को काफी कम कर दिया है. अब करीब 6,000 किस्में ही बची हैं.
भारत के आठ राज्यों में करीब 17,000 किसानों को बसुधा से धान के बीज मिले हैं, जिनमें 7,000 किसान अकेले ओडिशा के हैं. किसान बीजों के लिए भुगतान नहीं करते. इसके बजाए उन्हें इसका फायदा दूसरों के साथ साझा करना होता है. इसी माध्यम से बीसेक हजार अन्य किसानों को धान की इन पारंपरिक किस्मों की खेती से जोड़ दिया गया है, जिससे जैव विविधता संरक्षकों का एक जमीनी नेटवर्क भी तैयार हो गया है.
बिधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय के पादप शरीर क्रिया विज्ञान विभाग में प्रोफेसर सुभाशीष मंडल कहते हैं, ''बसुधा का संरक्षण केवल कागजों पर नहीं हो रहा. सहभागी खेती पर आधारित इस पहल ने दुर्लभ जीनों को संजोने और उन्हें फिर विकसित करने में मदद की है.’’
देव ने शुरू में पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा में काम किया पर वहां के किसानों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. 2012 में उन्होंने अपनी इस पहल को ओडिशा में केंद्रित कर दिया, जहां इसे काफी विस्तार मिला. पिछले कुछ वर्षों में तो बसुधा की बीज और संरक्षण पद्धतियों ने न केवल पूर्वी भारत बल्कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी कृषि समुदायों के बीच लोकप्रियता हासिल की है. इन राज्यों में कई किसान धान की पारंपरिक किस्मों को फिर से उगा रहे हैं.
दुर्लभ बीजों को एकत्र करने के लिए देव कई राज्यों की खाक छान चुके हैं, जिसमें कई बार तो उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. बंगाल की ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वे जलपाईगुड़ी जिले के लाटागुड़ी के एक दूरवर्ती गांव तक पहुंचने के लिए पूरे दिन लगातार बारिश में चलते रहे.
उनका लक्ष्य था: तकरीबन विलुप्त हो चुकी धान की किस्म 'अग्निशाल’ के बीज हासिल करना. वे बताते हैं, ''उस दिन मैं पूरी तरह भीग गया था. लेकिन मैं सोचता रहा कि अगर मैं आज नहीं पहुंचा तो ये बीज हमेशा के लिए गायब हो जाएंगे.’’ समर्पण के इसी भाव ने विश्व भर में धान संरक्षण के क्षेत्र में बसुधा को एक खास पहचान दिलाई है.ठ्ठ
लाभार्थी की राय
रायगढ़ के एक किसान कृष्ण कम्हार ने कहा कि इस धान ने हमारे समुदाय में मेरे रवैए को कायम रखने में मेरी खासी मदद की है. इससे एक हेक्टेयर में 24 क्विंटल उपज उपज होती है. नाते-रिश्तेदारों या मित्र-दोस्तों के आने पर जब हम उनके सामने इसे परोसते हैं तो इसकी खुशबू और इसके स्वाद से वे हतप्रभ रह जाते हैं.
आखिर क्यों है यह एक रत्न
बसुधा के संस्थापक देबल देव ने धान की 1,480 पारंपरिक किस्में जुटाई हैं. इनमें से 180 'सबसे दुर्लभ’ किस्में तो सिर्फ उन्हीं के पास हैं.
आठ राज्यों के 17,000 किसानों को बसुधा से बीज मिले हैं; अब 20,000 और किसान इन किस्मों की खेती कर रहे हैं.
आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए केंद्र हर साल चावल की हरेक किस्म में 56 फेनोटाइपिक विशेषताओं का सत्यापन करता है.