पर्यावरण का आजीवन प्रहरी

उन्होंने तर्क दिया कि भारत में पर्यावरण के संघर्ष न्याय और समानता के प्रश्नों से भी जुड़े हैं. उन्होंने 'पारिस्थितिक विवेक' और 'पारिस्थितिक अपव्यय' जैसी अवधारणाओं को सामने रखा

माधव गाडगिल (फाइल फोटो)

- रविन्द्र कुमार

रामचंद्र गुहा की लिखी किताब दिस फिशर्ड लैंड माधव गाडगिल के लेखन और विचारों से मेरे गहरे परिचय का प्रवेश द्वार रही. पृथ्वी पर जीवन के विविध रूपों पर आ रहे संकट के प्रति बेहद चिंतित रहे माधव, महात्मा गांधी की शिक्षा से प्रेरित थे. 7 जनवरी, 2026 को पुणे में 83 वर्ष की आयु में भारत के इस शीर्ष पारिस्थितिकीविद् और लोक बुद्धिजीवी का निधन हो गया. उनकी आवाज पर्यावरण संरक्षण, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय के अटूट संबंध पर जोर देती थी.

पांच दशकों से अधिक समय तक गाडगिल भारत के जंगलों, वन्यजीवों और इकोलॉजी का अध्ययन करते रहे. वे छात्रों और पर्यावरण चिंतकों में जितने पसंद किए गए, उतने ही राजनीतिक-व्यावसायिक हितों को चुनौती दिए जाने की वजह से इन हलकों में नापसंद भी. वे चेताते रहे कि प्रकृति से छेड़छाड़ और अनियंत्रित आर्थिक विकास बहुत बड़ी कीमत वसूल करेगा.

24 मई, 1942 को पुणे में जन्मे माधव गाडगिल के पिता डॉ. धनंजय गाडगिल, एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष थे. 1969 में हार्वड से डॉक्टरेट के बाद माधव गाडगिल ने भारतीय विज्ञान संस्थान में तीन दशक से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संस्थान के निदेशक सतीश धवन के सहयोग से 'सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज' की स्थापना की.

वे अपने काम के जरिए इस बात को मजबूती से रेखांकित करते रहे कि मनुष्य पारिस्थितिकी तंत्र से अलग न होकर इसका एक अभिन्न अंग है. उन्होंने किसानों, चरवाहों और आदिवासी समुदायों के स्थानीय ज्ञान के महत्व को पहचाना और इकोलॉजी रिसर्च में मनुष्य को घटक के तौर पर शामिल किया जाने पर जोर दिया.

एक विपुल लेखक और विचारक के रूप में गाडगिल ने सात किताबें और 200 से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा के साथ लिखी दो मौलिक पुस्तकें, दिस फिशर्ड लैंड: ऐन इकोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ इंडिया और इकोलॉजी ऐंड इक्विटी भारत के पर्यावरणीय अध्ययन की आधारशिला बनीं. 

उन्होंने तर्क दिया कि भारत में पर्यावरण के संघर्ष न्याय और समानता के प्रश्नों से भी जुड़े हैं. उन्होंने 'पारिस्थितिक विवेक' और 'पारिस्थितिक अपव्यय' जैसी अवधारणाओं को सामने रखा. उनकी रिसर्च की ही देन थी कि 1986 में 'नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व' भारत का पहला बायोस्फीयर रिजर्व बना. भारत के जैव विविधता अधिनियम, 2002 के निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. वे गाडगिल ही थे जिन्होंने 'पीपल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर' की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसकी वजह से स्थानीय वनस्पतियों, जीवों और पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का समुदाय-आधारित डॉक्यूमेंटशन हुआ. 

गाडगिल की सबसे प्रसिद्ध और संभवत: विवादास्पद नीतिगत पहल 'गाडगिल आयोग' के रूप में सामने आई. 2010 में भारत सरकार ने गाडगिल को इस पैनल का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिसका उद्देश्य पश्चिमी तट के साथ फैली 1,600 किमी लंबी पर्वत शृंखला के नाजुक पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित करने के उपाय सुझाना था. 2011 में पेश इस रिपोर्ट ने सिफारिश दी कि पश्चिमी घाट के लगभग 64 प्रतिशत क्षेत्र को अलग-अलग स्तरों के संरक्षण के साथ 'इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया' घोषित किया जाए. साथ ही खनन, बड़े बांध, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग और अव्यवस्थित शहरी विस्तार पर सख्त नियंत्रण या प्रतिबंध लगाया जाए. 

पश्चिमी घाट वाले राज्यों, खासकर केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के नेताओं और उद्योग समूहों ने इसका जोरदार विरोध किया और विकास-विरोधी करार दिया. दबाव में, केंद्र सरकार ने 2012 में डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नया पैनल गठित किया, जिसने गाडगिल रिपोर्ट की सिफारिशों को काफी कमजोर कर दिया. गाडगिल ने इसके परिणाम की आलोचना करने से परहेज नहीं किया. 

जब 2018 और 2019 में केरल और पश्चिमी घाट के हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ आई और भूस्खलन हुए तो कई लोगों ने इंगित किया कि यह आपदा ठीक वैसी ही थी जैसी चेतावनी गाडगिल समिति ने दी थी. गाडगिल ने स्वयं टिप्पणी की कि ये केवल 'प्राकृतिक आपदा' नहीं थीं, बल्कि शासन की विफलताएं तथा पर्यावरण की सीमाओं की अनदेखी का परिणाम थी.

पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित माधव गाडगिल को विश्व-प्रतिष्ठित 'टाइलर पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने उन्हें 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' नामित किया. इसके अलावा, पश्चिमी घाट में खोजी गई एक नई वृक्ष प्रजाति का नाम 2021 में एलियोकार्पस गाडगिली रखा गया, जिससे उनका नाम उसी जैव विविधता में स्थायी हो गया, जिसकी रक्षा के लिए उन्होंने काम किया.

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