अव्वल दर्जे का माहिर नकलची

फॉर्म और स्टाइल को एआइ भले ही परफेक्ट बना दे लेकिन कलाकार और उसके अनुभव के बीच जो सामाजिक संवाद होता है, वही कला को नैतिक और भावनात्मक ताकत देता है, और यह एआइ के पास नदारद

AI-TM Krishna

- टी.एम. कृष्ण

महज 'एआइ' शब्द सुनते ही लोगों की प्रतिक्रिया बदल जाती है. कोई इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करता है तो कोई चिंतित हो जाता है. सब मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) इंसानी दिमाग की ही देन है और इसके नैतिक इस्तेमाल को लेकर बहस भी खूब होती है. फिर भी हम अक्सर एआइ को ऐसा मान लेते हैं जैसे यह उसकी अपनी सोच हो.

अंदर ही अंदर एक स्वीकार्यता बन चुकी है कि एआइ कोई अलग हस्ती है. यह बात हमारी भाषा और उस लहजे में साफ दिखती है, जिसमें हम एआइ से बात करते हैं. यही दूरी इंसानों को यह मौका देती है कि वे एआइ की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लें. लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता रोजर पेनरोज कहते रहे हैं कि 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' शब्द ही गलत है.

असल में हमने एक बेहद उन्नत सीखने वाली मशीन बनाई है, जिसमें चेतना नहीं है. और जब चेतना ही नहीं है तो उसे बुद्धिमान कैसे कहा जा सकता है. बुद्धि और चेतना के रिश्ते पर बहस में गए बिना इतना कहना काफी है कि हमें याद रखना चाहिए, हम जैविक प्राणी कुछ मायनों में खास हैं. हम खुद को पहचानते हैं, समझते हैं और यही बात हमें अलग बनाती है.

एक कलाकार के तौर पर हमारी खोज हमेशा भावनाओं की दुनिया में भटकती रहती है. हम असली दुनिया को ध्वनि, रंग, गति और शब्दों के जरिए नए रूप में पेश करने के तरीके ढूंढते हैं. ऐसा करते हुए हम वास्तविकता की असली तस्वीर सामने रखते हैं. बात यहीं नहीं रुकती. हम कल्पनाओं के नए रास्ते भी खोलते हैं और सामने वाले को आजादी देते हैं कि वह इसे अपने दिमाग में आगे बढ़ाए.

तकनीक हमेशा से इस सफर में हमारी मददगार रही है. ब्रश और वाद्य यंत्रों ने कलाकारों को यह भ्रम रचने का मौका दिया. डिजिटल तकनीक आने के बाद नए औजार बने. फर्क यह रहा कि इन औजारों ने कला को देखने और सोचने का तरीका ही बदल दिया. कला ऐसे बदली, जैसा इंसानों ने सोचा भी नहीं था.

किसी जमाने में श्रोता वही सुनते थे, जो कलाकार पेश करता था. धीरे-धीरे कलाकार की प्रस्तुति और श्रोता तक पहुंचने वाले अंतिम रूप के बीच की दूरी बढ़ती गई. डिजिटल तकनीक ने यह मुमकिन बना दिया कि संगीत को सुनने से पहले ही बदला जा सके. पहले यह काम सिर्फ रिकॉर्डिंग स्टूडियो में होता था. अब तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि लाइव कॉन्सर्ट में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है. इसका नतीजा यह हुआ कि संगीत रचते वक्त जो छोटी-छोटी, स्वाभाविक खूबसूरत चूकें और समझौते होते थे, वे धीरे-धीरे साफ कर दिए गए.

जब औजार फैसले लेने लगें
एआइ ने डिजिटल तकनीक को एकदम नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. यह अब सिर्फ मेरी आवाज को बेहतर या कला को ज्यादा सुंदर नहीं बनाता. यह तय करता है कि मुझे कैसा सुनाई देना चाहिए, और यह मेरी जगह खुद फैसले लेता है. अजीब बात है कि यह मेरे जैसा या किसी और के जैसा भी बन सकता है और ऐसी कला रच सकता है, जिसमें कई कलाकारों की संवेदनाएं घुली हों.

शायद आपने भी गौर किया होगा कि मैं खुद उसी जाल में फंसता जा रहा हूं, जिसके बारे में इस लेख की शुरुआत में चेतावनी दी थी. मैंने एआइ को एक स्वतंत्र हस्ती बना दिया है. सवाल यह है कि कला रचना में हम एआइ से आखिर चाहते क्या हैं? सीधी बात यह है कि हम खुद का सबसे बेहतरीन संस्करण बनना चाहते हैं. हम नहीं चाहते कि दुनिया हमारी कला को हमारी कमियों और भटकावों के साथ देखे. हम उन चीजों को भी पाना चाहते हैं, जो हमारे पास नहीं हैं.

एआइ हर कलाकार से उसकी तकनीक और पहचान के संकेत उठाता है. जैसा कि हम जानते हैं, नकल कई बार असली से भी बेहतर मानी जाती है. एआइ दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे माहिर नकलची है. एआइ जब कलाकारों की नकल करता है, तो वह हमें वही देता है, जिसे समाज उस कलाकार का बेहतर रूप मान लेता है. इस बनावटीपन में एक सचाई छिपी है. हम सभी खुद को लेकर असंतुष्ट हैं. हमें यह यकीन दिला दिया गया है कि एआइ उस खालीपन को भर देगा.

हम परफेक्शन नहीं चाहते, हम सिंथेटिक बनना चाहते हैं. हम सिर्फ यह नहीं चाहते कि कोई रोबोट हमारे आदेश माने, बल्कि हम खुद भी रोबोट की तरह परफॉर्म करना चाहते हैं. एआइ यह काम बेहद शानदार तरीके से करता है. तेजी से सीखने की क्षमता के साथ यह हमारी उस चाह को और आगे बढ़ाता है, जिसमें सब कुछ प्रोसेस्ड हो. यह रंग, डिजाइन, धुनें, तस्वीरें और कहानियां गढ़ता है और हमें धीरे-धीरे उसी रास्ते पर ले जाता है. कहा जाता है कि एआइ हमारी कलात्मक खामियों की नकल भी कर सकता है.

यहीं से एक वजूद से जुड़ा सवाल उठता है. क्या कला में कुछ ऐसा है, जो सिर्फ इंसानों का ही हो? मेरे पास इसका कोई पक्का जवाब नहीं है. लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि कलाकार होना सिर्फ दूसरों के लिए सुंदर और मनोरंजक चीजें बनाने तक सीमित नहीं है. कला एक सचेत क्रिया है, जिसमें एक उद्देश्य होता है, और यह उद्देश्य गहरे नैतिक स्तर से निकलता है. कला न तो सिर्फ अंतिम नतीजे के बारे में है और न ही इस बात से जुड़ी है कि लोग उसे कैसे स्वीकार करते हैं.

कला रचते वक्त कलाकार कुछ ऐसा महसूस करता है, जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता. कैनवस और चित्रकार के बीच, सुर और संगीतकार के बीच, गति और नर्तक के बीच जो निजी संवाद होता है, वहीं कला जन्म लेती है. कला की सामाजिक बातचीत इसी अनुभव से तय होती है, जिससे हर कलाकार गुजरता है. अगर यह अनुभव खत्म हो जाए, तो कला का वह रूप बेजान हो जाता है.

रिसीव करने वाला पक्ष
दर्शकों को भी अपने स्तर पर यही सवाल खुद से पूछना होगा कि कला से जुड़ने का मतलब आखिर क्या है. सिर्फ उपभोग उनकी प्रेरणा नहीं हो सकता. उन्हें यह समझना होगा कि कला के साथ उनका रिश्ता कितना गहरा और अलग न किया जा सकने वाला है. यह रिश्ता सिर्फ आनंद से तय नहीं होता. कला हवा में टंगी कोई चीज नहीं है. यह कलाकार की रचना है. यानी हर कला अनुभव में कलाकार, चाहे सामने हो या न हो, दर्शक से बातचीत कर रहा होता है. इस रिश्ते को तोड़ देना कला के एक बुनियादी तत्व को खत्म कर देता है, और वह तत्व है संवाद और साझेदारी.

एआइ से घिरी दुनिया हम सबको धीरे-धीरे बदल रही है. जैसे-जैसे एआइ बिना किसी खामी वाली, आकर्षक और चमकदार 'कला जैसी' चीजें बनाता जाएगा, वैसे-वैसे हमारी इंद्रियां भी उसी के हिसाब से ढलने लगेंगी. एक वक्त आएगा, जब कलाकारों को भी वही कला बनानी पड़ेगी, जो 'एआइ के मानक' पर खरी उतरे. यह मशीन और कलाकार के बीच ताकत के संतुलन को उलट देने जैसा होगा.

लेकिन बात यहीं नहीं रुकेगी. हम दुनिया को उसी नजर से देखने लगेंगे, जैसा नजरिया एआइ ने हमारे लिए तय किया होगा. इंसानी व्यवहार गढ़े हुए ढांचे की मांग के मुताबिक ढलने लगेगा. एक जैसी सोच, एक जैसे रूप को तरजीह मिलेगी. हो सकता है हम इस तरह की दुनिया में खुश भी रहें और रोजमर्रा के काम करते रहें, लेकिन एक-दूसरे से और प्रकृति से हमारा रिश्ता एल्गोरिद्म के हिसाब से तय होगा.

लेकिन ऐसी दुनिया में कला न तो किसी को असहज करेगी, न ढर्रे को तोड़ेगी, न सुंदरता को चुनौती देगी और न कल्पना की मांग करेगी. दूसरे शब्दों में कहें तो कला मर चुकी होगी.

 खास बातें

हम एआइ को एक स्वतंत्र एजेंसी मान लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि असली बुद्धि और चेतना सिर्फ इंसानों के पास है.

जल्द ही कलाकारों पर दबाव होगा कि वे 'एआइ के हिसाब की' कला बनाएं. यह मशीन और कलाकार के बीच ताकत के संतुलन को उलट देगा.

जिस दुनिया का फैसला एआइ करेगा, वहां कला न सवाल उठाएगी, न सुंदरता को चुनौती देगी. यानी वहां कला का अंत हो जाएगा.

एआइ दुनिया का सबसे बड़ा नकलची है. जब एआइ कलाकारों की नकल करता है, तो वह हमें वही देता है, जिसे हम उस कलाकार का बेहतर रूप मान लेते हैं. सचाई यह है कि हम सब खुद को लेकर असंतुष्ट हैं.

(टी.एम. कृष्ण संगीतकार, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पब्लिक इंटेलेक्चुअल हैं.)

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