अगुआ बनने की राह पर भारत

भारत विश्वव्यापी एआइ क्रांति की अगुआई करने की राह पर बढ़ रहा. यह टेक्नोलॉजी आज मार्केटिंग की हमारी युक्तियों, कंटेंट रचने, सीखने और सामाजिक बदलाव को आगे बढ़ाने के तौर-तरीकों को नए सिरे से गढ़ रही.

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सांकेतिक तस्वीर

-अरुण श्रीनिवास

इधर हाल के कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बातचीत दो ध्रुवों के बीच झूलती रही—क्या यह हमें बचाएगा या हमारी जगह ले लेगा? लेकिन 2025 में इंडस्ट्री लीडर्स, क्रिएटर्स और डेवलपर्स से हुई चर्चाओं पर नजर डालें तो साफ है कि इससे कहीं ज्यादा गहरा बदलाव हो चुका है. एआइ ने किसी बड़े धमाके के साथ एंट्री नहीं ली. वह चुपचाप रोजमर्रा की जिंदगी के ताने-बाने में घुलता चला गया, अक्सर बिना ध्यान खींचे.

2023 और 2024 के वायरल डेमो और सुर्खियां बटोरने वाले मॉडलों का दौर पीछे छूट चुका है. 2025 में हकीकत यह है कि सवाल बदल गया है. अब हम यह नहीं पूछते कि 'एआइ क्या कर सकता है?’ बल्कि यह पूछते हैं कि 'एआइ कहां फिट बैठता है?’ 2025 वह साल रहा जब एआइ ने हमें प्रभावित करने की कोशिश छोड़ दी और हमारे लिए काम करना शुरू किया.
इसका असर मार्केटिंग से लेकर क्रिएशन और सामाजिक प‌रिवर्तन तक तुरंत दिखने लगा और ठोस भी है.

इस बदलाव की सबसे साफ तस्वीर भारत में दिखती है, जहां हम वैश्विक एआइ क्रांति का नेतृत्व करने के लिए खास तौर पर तैयार हैं. युवा और टेक-सैवी आबादी, गहरी मोबाइल-फर्स्ट संस्कृति और मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम भारत को अलग पहचान देता है. साथ ही मोबाइल कनेक्टिविटी, आधार और यूपीआइ पर टिका देश का डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर—जो दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम है—बड़े पैमाने पर इनोवेशन के लिए एक बेहद मजबूत आधार मुहैया कराता है.

मार्केटिंग में एआइ की ताकत
सैकड़ों बिजनेस लीडर्स से मेरी बातचीत के दौरान एक बात साफ हो गई है: एआइ भारत में आधुनिक मार्केटिंग को ताकत देने वाला साइलेंट इंजन बन चुका है. कैंपेन ऑटोमेशन और कॉपीराइटिंग से लेकर ऑडियंस टारगेटिंग और रियल टाइम एनालिटिक्स तक, एआइ हर स्तर पर बदलाव ला रहा है.

मैनुअल प्रक्रियाओं की सीमाओं से बाहर निकलकर मार्केटर्स अब ज्यादा तेज, ज्यादा लचीले और डेटा आधारित क्रिएटिव वर्कफ्लो अपना रहे हैं. यह कोई दूर की कौड़ी नहीं है. एजेंसियों, स्टार्टअप्स और ग्लोबल ब्रांड्स में यह नई हकीकत बन चुका है, जहां एआइ हर कैंपेन में एक जरूरी, भले ही अक्सर अदृश्य, सहयोगी की भूमिका निभा रहा है.

हम अपने प्लेटफॉर्म्स पर भी इसका असर देख रहे हैं. मेटा प्लेटफॉर्म्स पर लगभग सभी विज्ञापनदाता एआइ संचालित ऐड टूल्स, जिन्हें ऐडवांटेज+ कहा जाता है, का इस्तेमाल कैंपेन ऑटोमेट करने के लिए कर रहे हैं. रिसर्च बताती हैं कि जब भारत में विज्ञापनदाता टारगेटिंग को बेहतर बनाने के लिए एआइ टूल्स का इस्तेमाल करते हैं तो पर्सनलाइज्ड विज्ञापनों से मिलने वाला रिटर्न औसतन 25 फीसद तक बढ़ जाता है.

पिछले एक साल में एक और बात भी साफ हुई है. एआइ मार्केटर्स की जगह नहीं ले रहा. वह उन्हें और बेहतर बना रहा है. भारतीय मार्केटिंग टीमें समझ रही हैं कि एआइ भारी-भरकम, दोहराए जाने वाले काम करता है, जिससे इंसान रणनीति, कहानी कहने की कला और मानवीय भावनाओं की समझ जैसी चीजों पर ध्यान दे सकता है जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. क्रिएटिविटी पर एआइ के असर को लेकर चिंता स्वाभाविक है.

लेकिन जो हम देख रहे हैं, वह इंसानी अभिव्यक्ति का विस्थापन नहीं, उसका विस्तार है. एआइ को क्रिएटिव पार्टनर बनाकर भारतीय क्रिएटर्स नए ट्रेंड सेट कर रहे हैं और डिजिटल किस्सागोई और आत्म अभिव्यक्ति की सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं. मसलन, एडिट्स ऐप में रीस्टाइल टूल के जरिए आया एआइ-सक्षम स्नो इफेक्ट नवंबर में भारत में वायरल हो गया. उस हक्रते भारत में एडिट्स के नए साप्ताहिक यूजर्स की संख्या पिछले हफ्ते के मुकाबले दोगुनी हो गई.

एआइ ने विचारों को दिमाग से ड्राफ्ट तक पहुंचाने की रफ्तार अभूतपूर्व बना दी है. टेक्स्ट, इमेज और वीडियो जेनरेशन के ताकतवर टूल्स के साथ क्रिएशन ज्यादा तेज और सहज हो गया है. भारत का क्रिएटिव समुदाय इस बदलाव को परंपरा और नवाचार से मिलाकर खास अंदाज में अपना रहा है.

हाल ही में हमने ऐलान किया है कि जल्द ही आप मेटा एआइ का इस्तेमाल कर रील्स को भारत की पांच नई भाषाओं में ट्रांसलेट कर सकेंगे. इससे भारत और दुनिया भर से आने वाला ज्यादा मनोरंजक कंटेंट खोजना आसान होगा. इस साल की शुरुआत में हमने क्रिएटर्स के लिए यह सुविधा शुरू की थी कि वे रील्स को इंग्लिश, हिंदी, स्पेनिश और पुर्तगाली में डब और लिप-सिंक कर सकें, जिससे उनकी पहुंच ग्लोबल ऑडियंस तक बढ़ी. अब यही सुविधा बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी में भी उपलब्ध होगी. एआइ क्रिएटिविटी को एक जैसा नहीं बल्कि और ज्यादा सुलभ बना रहा है.

दुनिया का एआइ इंजन
अगर मार्केटिंग और क्रिएटिविटी यह दिखाते हैं कि आउटपुट को कैसे एआइ बदल रहा है, तो भारत का डेवलपर समुदाय बताता है कि एआइ क्षमताओं को कैसे नया आकार दे रहा है. भारत के पास पहले से दुनिया में सबसे बड़े डेवलपर टैलेंट पूल में से एक है और एआइ इसे और बढ़ रहा है. लेकिन असली बदलाव इससे भी गहरा है. एआइ डेवलपर्स को सिर्फ कोड लिखने वालों से आगे बढ़ाकर समस्या सुलझाने वाले प्रोफेशनल बना रहा है.

यही बदलाव भारत को ग्लोबल एआइ रेवोल्यूशन का नेतृत्व करने की स्थिति में ले आता है. दुनिया भर की कंपनियां जब एआइ प्रोडक्ट्स बनाने की दौड़ में हैं, तो वे तेजी से भारतीय टैलेंट पर निर्भर होंगी. सिर्फ डेवलपमेंट नहीं, बल्कि रिसर्च, डिजाइन, डिप्लॉयमेंट और स्केलिंग तक पूरे इनोवेशन साइकल के लिए. भारत में एआइ स्टार्टअप्स अभूतपूर्व रक्रतार से बढ़ रहे हैं. हेल्थकेयर, फाइनेंस, एजुकेशन, एग्रीकल्चर, लॉजिस्टिक्स और क्लाइमेट टेक जैसे क्षेत्रों में ये नए समाधान गढ़ रहे हैं. इनमें से कई स्टार्टअप्स सिर्फ ग्लोबल ट्रेंड्स को फॉलो नहीं कर रहे बल्कि इंडिया-फर्स्ट सॉल्यूशंस बना रहे हैं, जिनसे दुनिया सीख सकती है.

एकात्रा का उदाहरण देखिए. यह पर्सनलाइज्ड, छोटे-छोटे लॄनग मॉड्यूल व्हाट्सऐप के जरिए सीधे पहुंचाकर लास्ट-माइल एजुकेशन को बदल रहा है यानी छात्रों तक वहीं पहुंच रहा है, जहां वे मौजूद हैं. लामा के ओपन-सोर्स एआइ मॉडल पर आधारित इसका कन्वर्सेशनल एआइ ट्यूटर भाषाओं, संदर्भों और कनेक्टिविटी की सीमाओं के अनुसार रियल टाइम में कंटेंट को ढालता है. व्हाट्सऐप-फर्स्ट और लामा-पावर्ड यह तरीका कम डेटा और बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ भी हाइ एंगेजमेंट और कोर्स पूरा करने की बेहतर दर पक्का करता है. इसके जरिए दुनिया भर के वंचित समुदायों में 35,000 से ज्यादा लर्नर्स तक पहुंच बनाई गई है.

2026 की ओर बढ़ते हुए, यह बहस बेमानी लगती है कि एआइ दुनिया को बदलेगा या नहीं. यह बदलाव पहले ही कर चुका है. सवाल यह है कि एआइ के दौर में हम दुनिया को किस दिशा में ढालने के लिए इसका इस्तेमाल कैसे करेंगे. इस साल एआइ परिपक्त हुआ. और भारत उस जगह के रूप में उभरा, जहां दुनिया का एआइ भविष्य गढ़ा जाएगा. एआइ टेक्नोलॉजी की ताकत करोड़ों लोगों के हाथों में दे रहा है. यह तो बस शुरुआत है. 

(अरुण श्रीनिवास मेटा इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और कंट्री हेड हैं)

खास बातें

  • एआइ भारत में मार्केटिंग को ताकत देने वाला साइलेंट इंजन बना और कैंपेन से कॉपीराइटिंग तक का आटोमेशन कर रहा.
  • एआइ से भारतीय क्रिएटर्स नए ट्रेंड सेट कर रहे और डिजिटल किस्सागोई में हरसंभव चीज को नए सिरे से परिभाषित कर रहे.
  • एआइ प्रोडक्ट बनाने की होड़ में एआइ कंपनियां रिसर्च, डिजाइन, डिप्लॉयमेंट और स्केलिंग में भारतीय प्रतिभा पर निर्भर होंगी.

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