चैटबॉट और चाकबोर्ड में जब सधेगा याराना

देशभर में कक्षाओं में एआइ टूल्स की परख-पड़ताल जारी. इस संदर्भ में अब पठन-पाठन के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए एक ठोस मानक और नीतिगत ढांचा जरूरी.

future trends AI: education
सांकेतिक तस्वीर

- आशीष धवन और गौरी गुप्ता

पढ़ने-पढ़ाने के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) अब कोई दूर की कल्पना नहीं रहा. यह तेजी से उभरता हुआ ऐसा टूल बन चुका है, जिसे शैक्षणिक संस्थान अपनाने लगे हैं. इससे न सिर्फ छात्रों के सीखने का तरीका बदल रहा है बल्कि शिक्षक भी पढ़ाने के नए तरीके आजमा रहे हैं. एआइ ट्यूटर, ऑटोमैटिक असेसमेंट, लेसन प्लानिंग और टीचर फीडबैक तक, दुनिया भर की क्लासरूम में यह तकनीक अभूतपूर्व रफ्तार से प्रवेश कर रही है.

असल सवाल यह नहीं है कि एआइ शिक्षा में आएगा या नहीं. सवाल यह है कि इसे बराबरी के साथ कैसे जोड़ा जा सकेगा और यह पढ़ाने तथा सीखने, दोनों के नतीजों को कैसे बेहतर बना पाएगा. भारत के लिए यह दौर खास तौर पर अहम है. बड़ी-बड़ी कक्षाएं, छात्रों का अलग-अलग स्तर और शिक्षकों की कमी जैसी चुनौतियों के बीच एआइ एक मौका देता है कि वहां मदद पहुंचाई जा सके, जहां इंसानी क्षमता कम पड़ रही है. शर्त बस इतनी है कि तकनीक सीखने की प्रक्रिया को मजबूत करे, उसे दरकिनार न करे.

अच्छी खबर यह है कि इस लक्ष्य के लिए एआइ टूल्स हर जगह विकसित हो रहे हैं, यहां तक कि कम और मध्यम आय वाले देशों में भी. हाल के विश्लेषण में दुनिया भर में ऐसी करीब 300 मिसालें सामने आई हैं. इनमें भारत सबसे सक्रिय इकोसिस्टम के रूप में उभरा है. फिलहाल ज्यादातर टूल्स छात्रों के लिए बनाए गए हैं, जो थ्योरी और प्रैक्टिस में मदद करते हैं. लेकिन अब धीरे-धीरे ऐसे टूल्स की संख्या भी बढ़ रही है, जो शिक्षकों के लिए असेसमेंट प्लान और पढ़ाई का कंटेंट तैयार करने में सहायक हैं. सिस्टम स्तर पर फैसले लेने वाले एआइ समाधान अभी गिने-चुने ही हैं.

इसी कड़ी में एक दिलचस्प टूल है खानमिगो, जो सीधे जवाब देने के बजाए सवालों के जरिए पढ़ाता है. इसे भारत के कम संसाधन वाले इलाकों में पायलट तौर पर आजमाया जा रहा है. यह टूल अमेरिका की खान एकेडमी ने विकसित किया है और सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन (सीएसएफ) के जरिए भारत लाया गया है. इसे भारतीय पाठ्यक्रम और क्लासरूम की हकीकत के हिसाब से ढाला जा रहा है.

टीचिंग कोच के रूप में एक और एआइ प्रोजेक्ट झांसी में टेस्ट किया जा रहा है. यह शिक्षकों को क्लासरूम में पढ़ाने के तरीके पर समय रहते और व्यक्तिगत फीडबैक देता है. इसका मकसद मौजूदा ट्रेनिंग और सपोर्ट सिस्टम को मजबूत करना है, न कि उसकी जगह लेना. आइआइटी बंबई ने तारा नाम का एक ऐप तैयार किया है, जो एआइ आधारित असेसमेंट के जरिए बच्चों में पढ़ने से जुड़ी दिक्कतों को पहचानता है.

यह खासकर प्राइमरी कक्षाओं के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है. वहीं राजस्थान में ओसीआर आधारित असेसमेंट के जरिए बड़े पैमाने पर लर्निंग डेटा का विश्लेषण तेज किया गया है, जिससे कागज आधारित परीक्षाओं में छात्रों के जवाबों को जल्दी और बेहतर तरीके से परखा जा रहा है.

कुछ मिसालें खास तौर पर ध्यान खींचती हैं. घाना में व्हाट्सऐप आधारित एक ट्यूटर ने गणित में 0.36 स्टैंडर्ड डिविएशन तक सीखने का फायदा दिखाया है. इसमें हफ्ते में सिर्फ एक अतिरिक्त घंटे की पढ़ाई जोड़ी गई थी. बड़ी क्लास और ट्यूशन की सीमित पहुंच वाले सिस्टम में इसे एक अहम नतीजा माना जा रहा है. केन्या में एआइ आधारित रीडिंग और मैथ असेसमेंट ने शिक्षकों का काम काफी हल्का किया है. पहले एक बच्चे का आकलन करने में 13 मिनट से ज्यादा लगते थे, अब यह दो मिनट से भी कम में हो जाता है. इससे अलग-अलग स्तर के बच्चों के लिए टारगेटेड पढ़ाई भी संभव हो पाई है.

लेकिन इतनी तेजी से प्रयोग होने के बावजूद शिक्षा में इस्तेमाल हो रहे एआइ टूल्स की गुणवत्ता अब भी एक जैसी नहीं है और ठीक से समझी भी नहीं गई है. सैकड़ों प्रोडक्ट इस्तेमाल में हैं लेकिन दो दर्जन से भी कम ऐसे हैं जिन पर गुणवत्ता या असर को लेकर प्रकाशित अध्ययन मौजूद हैं. अक्सर विस्तार इस वजह से हो रहा है कि तकनीक नई और सुविधाजनक लगती है, न कि ठोस सबूतों के आधार पर. अगर साफ नियम नहीं तय किए गए तो खतरा है कि एआइ अपनाने से पढ़ाई में मौजूद असमानताएं और गहरी हो जाएं.

जहां भी ठोस सबूत मिले हैं, वहां यह साफ हुआ है कि अगर एआइ को सोच-समझकर डिजाइन किया जाए और सही तरीके से जोड़ा जाए, तो यह सीखने में मददगार हो सकता है. कहीं एआइ ट्यूटर से बच्चों के नतीजे बेहतर हुए हैं, तो कहीं एआइ से जुड़े असेसमेंट ने समय और मेहनत बचाई है. ये संकेत एआइ की क्षमता भी दिखाते हैं और यह भी बताते हैं कि इसके इस्तेमाल में जल्दबाजी नहीं, बल्कि साफ सोच जरूरी है.

सो, इस वक्त यह अहम हो गया है कि भारत नीतियों के स्तर पर किस ढंग से इसका जवाब पेश करता है. केंद्र सरकार शिक्षा के लिए एआइ में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की योजना पर काम कर रही है, जिसके लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. यह कदम एआइ के सार्थक इस्तेमाल की बुनियाद रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है. इसमें स्थानीय डेटा और मॉडल पर जोर दिया गया है क्योंकि भारतीय शिक्षा के लिए एआइ को भारतीय क्लासरूम के हिसाब से ही तैयार करना होगा.

सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन की मदद से चल रही एडटेक तुलना जैसी पहलकदमियां ऐसे मानक तय करने की कोशिश कर रही हैं, जिससे सरकारें और दूसरे खरीदार एआइ टूल्स को समझदारी से चुन सकें. भले ही ये प्रयास अभी शुरुआती दौर में हों लेकिन आगे चलकर यही बाजार की दिशा तय करने वाले साबित होंगे.

तालीम में एआइ की कामयाबी अंत में इस बात पर आकर टिकेगी कि छात्र, शिक्षक और अभिभावक इसे कैसे इस्तेमाल करते हैं. खासकर जब साहित्य चोरी यानी प्लेजरिज्म को लेकर चिंता बढ़ रही है और यह डर भी है कि लिखने और समस्या सुलझाने जैसी बुनियादी क्षमताएं कमजोर पड़ सकती हैं. भारत के शिक्षा तंत्र में ये अंदेशे और भी गहराई से महसूस किए जाते हैं. जब पढ़ाई ज्यादातर तय जवाबों और रटने पर टिकी हो, तो ताकतवर औजार गलत तरीके से इस्तेमाल हो सकते हैं.

लिहाजा, प्रतिक्रिया सिर्फ निगरानी या रोकने तक सीमित नहीं हो सकती. टूल्स ऐसे होने चाहिए जो सोच को सहारा दें, उसकी जगह न लें.  सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन की मदद से चल रही एआइ समर्थ जैसी पहलकदमियां इसी दिशा में काम कर रही हैं. ये आठ राज्यों के सरकारी स्कूलों में अपनाई जा रही हैं और इनका मकसद लाखों यूजर्स को इस नई तकनीक की समझ देना है.

इसमें सबसे ज्यादा जोर सुरक्षित, जिम्मेदार और आलोचनात्मक इस्तेमाल पर दिया गया है. 2026 की तरफ देखते हुए यह साफ है कि क्लासरूम में ब्लैकबोर्ड के साथ-साथ चैटबॉट भी दिखने लगेंगे. यह तकनीक समावेशन की ताकत बनेगी या नई खाइयां पैदा करेगी, यह आज लिए जा रहे फैसलों पर निर्भर करेगा.

(आशीष धवन सेंट्रल सक्वायर फाउंडेशन के संस्थापक और चेयरपर्सन हैं, जबकि गौरी गुप्ता एडटेक और एआइ की सीनियर डायरेक्टर हैं)

खास बातें
असल सवाल यह नहीं है कि एआइ भारतीय शिक्षा में आएगा या नहीं. सवाल यह है कि इसे बराबरी के साथ कैसे जोड़ा जाएगा और यह पढ़ाई और सीखने के नतीजों को कितना बेहतर बना पाएगा.

आज मौजूद सैकड़ों एआइ टूल्स की गुणवत्ता एक जैसी नहीं है. कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं लेकिन दुनिया भर में दो दर्जन से भी कम ऐसे एआइ प्रोजेक्ट हैं, जिन पर असर को लेकर ठोस अध्ययन हुए हैं.

ऐसे वक्त में भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया बेहद अहम हो जाती है. सरकार पहले ही शिक्षा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पर काम कर रही है. यह पहल सही दिशा में कदम माना जा रहा है.

झांसी में टीचिंग कोच, मुंबई में रीडिंग असेसर और राजस्थान में ओसीआर एनालाइजर जैसे टूल्स देश में आजमाए जा रहे हैं. इनकी कामयाबी इस पर टिकी होगी कि शिक्षक और छात्र इन्हें कितनी आसानी से समझते और इस्तेमाल कर पाते हैं. तकनीक तभी असर दिखाएगी, जब उसका प्रयोग आम होगा.

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