मुद्रा का मंत्र अब इस मशीन के पास

क्रेडिट स्कोर से लेकर ट्रेडिंग फ्लोर तक, स्वचालित अर्थव्यवस्था में एआइ चुपचाप ढंग से फैसले ले रहा. यह इस क्षेत्र में भरोसे, जोखिम और व्यवहार-बर्ताव सरीखे इसके अहम पहलुओं की बुनियाद भी बदल रहा

सांकेतिक तस्वीर

- उत्पल चक्रवर्ती

वित्तीय जगत नए तौर-तरीके तो हमेशा से ही अपनाता आया है लेकिन आज जो हो रहा है वह कोई आम तकनीकी बदलाव नहीं. यह बदलाव बड़े पैमाने पर हो रहा है जो बता रहा है कि बैंकों, बाजारों और डिजिटल पेमेंट के सिस्टम में फैसले कैसे लिए जाते हैं.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) कई रूप में फाइनेंस की दुनिया में पहुंच गया है, लेकिन इसका असली असर कुछ ज्यादा ही बारीक और सूक्ष्म चीजों पर हुआ है. यह धीरे-धीरे भरोसे, जोखिम, व्यवहार और वैल्यू क्रिएशन के आधार को बदल रहा है.

जैसे-जैसे हम नए साल में आगे बढ़ रहे हैं, यह साफ है कि एआइ महज मददगार बनकर नहीं रहेगा. इसकी इसमें अहम भूमिका हो जाएगी कि ऑटोमेटेड इकोनॉमी या स्वचालित अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है.

यह उद्योग दशकों से हर जरूरी काम के लिए पुराने डेटा, तय नियमों और इंसानी फैसलों पर निर्भर रहता आया है. लोन देना, ट्रेडिंग और फ्रॉड मैनेजमेंट, इन सबका एक तय पैटर्न होता था. एआइ ने इस ढर्रे को बदल दिया है क्योंकि वह तय नियमों के बजाए संभावनाओं पर काम करता है. मॉडल बहुत सारे संकेतों को खंगालते हैं, बदलते पैटर्न को पहचानते हैं और जोखिम के बारे में अपनी समझ तय करते हैं. स्थिर नियमों से डायनामिक इंटेलिजेंस की ओर हो रहे इस बदलाव से ही आने वाले सालों में फिसड्डियों के बीच से विजेता निकलेंगे.

भारत में बैंकिंग जगत एआइ के लिए बड़े पैमाने पर परीक्षणों की अनूठी प्रयोगशाला है क्योंकि यहां की आबादी में बहुत ज्यादा विविधता है, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर है और रियल-टाइम पेमेंट को तेजी से अपनाया जा रहा है. जहां एआइ से छोटे और मझोले उद्यमों के लिए क्रेडिट आकलन से लेकर यूपीआइ और मोबाइल बैंकिंग में जालसाजी का पता लगाया जा सकता है, वहीं एल्गोरिद्म लगातार यह तय कर रहा है कि दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते वित्तीय तंत्र में भरोसा और एक्सेस कैसे दिया जाता है.

क्रेडिट का नया स्वरूप
क्रेडिट का आकलन हमेशा से ही अनुमान के आधार पर किया जाता रहा है. पहले कर्ज देना कागजात में दर्ज इनकम, जमानत और चुकारा करने के रिकॉर्ड पर निर्भर करता था. आज, एआइ ने इसका दायरा बढ़ा दिया है और वह व्यवहार संबंधी विशेषताओं, डिजिटल संवाद, छोटे-छोटे खर्च के पैटर्न और प्रासंगिक संकेतकों की भी जांच करता है. पहले ऐसा नहीं होता था. जब जिम्मेदारी से इसका उपयोग किया जाता है, तो इससे वित्तीय समावेशन में खासी बढ़ोतरी होती है. छोटे व्यापारियों, गिग वर्करों और उन ग्राहकों का सटीक आकलन किया जा सकता है जिनका कोई क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं. इससे उनकी ऐसे ऋण तक पहुंच बढ़ती है जो उनको पहले कभी नहीं मिल पाता.

हालांकि, इसी तकनीक के साथ नई जिम्मेदारियां भी आई हैं. जटिल मॉडल अक्सर स्पष्ट शब्दों में यह नहीं बताते कि उन्होंने किस आधार पर कोई काम किया है. अगर प्रशासन मजबूत नहीं है तो उसके छिपे हुए पूर्वाग्रह या सहसंबंध असली जोखिम हो सकते हैं जिनसे परिणाम प्रभावित हो सकते हैं. सफल संस्थान वे होंगे जो एआइ-आधारित क्रेडिट सिस्टम को पारदर्शी व्यवस्था के रूप में देखेंगे और जिसका लगातार ऑडिट और सत्यापन होता रहेगा और जो महज आंकड़े पैदा करने वाले ब्लैक बॉक्स नहीं होंगे. 

ऑटोमेटेड ट्रेडिंग
ट्रेडिंग में हमेशा स्पीड का फायदा मिला है, लेकिन एआइ ने इस स्पीड को एक अलग ही दुनिया में पहुंचा दिया है. ट्रेडिंग के आधुनिक इंजन वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेतकों, वैकल्पिक आंकड़ों और बाजार के छोटे से छोटे पैटर्न को भी जितना ज्यादा समझते हैं वह इंसानी क्षमता से कहीं अधिक है. रीइन्फोर्समेंट लर्निंग एजेंट ऐसे मौके पहचान सकते हैं जो महज कुछ सेकंड के लिए मिलते हैं. वे तंत्र से सीखते हैं, ऐक्शन लेते हैं और इंसानी दखल का इंतजार किए बिना रणनीति बदल लेते हैं.

इससे एक अनोखी चुनौती पैदा होती है. जब कई ऑटोनॉमस एजेंट तेज रफ्तार मार्केट में इंटरैक्ट करते हैं, तो सिस्टम बहुत अच्छे से इंटरकनेक्ट हो जाता है. एक छोटा-सा असंतुलन भी चौंकाने वाली तेजी से फैल सकता है. इसे वे ही वित्तीय संस्थान अच्छी तरह से संभाल पाएंगे, जो एक मजबूत मॉडल और तगड़ी इंसानी निगरानी का इंतजाम करेंगे और एआइ व्यवहार के लिए खास तौर पर तैयार स्ट्रेस टेस्ट लागू करेंगे.

धोखाधड़ी का पता लगाना
वित्तीय अपराध की प्रकृति तेजी से बदली है. धोखेबाजों के पास अब उसी स्तर की कंप्यूटिंग पावर है जिसका इस्तेमाल संस्थान अपनी रक्षा के लिए करते हैं. पहचान बदल लेना, अकाउंट पर कब्जा और ट्रांजैक्शन स्पूफिंग अक्सर एआइ से जेनरेट किए गए पैटर्न पर निर्भर करते हैं. साथ ही बैंक डीप लर्निंग का इस्तेमाल करते हैं जो ग्राहक के व्यवहार को बहुत बारीकी से सीखती है.

यह लगातार विकसित हो रही प्रतिस्पर्धा है. इसमें वे ही कामयाब होंगे जो ऐसा सिस्टम बनाएंगे जो नए खतरों से उतनी ही तेजी से सीखने में सक्षम हो जितनी तेजी से विरोधी नए तरीके अपनाते हैं. नकली पहचान और एआइ से तैयार सोशल इंजीनियरिंग के उभार का मतलब है कि ऑटोमेटेड या स्वचालित अर्थव्यवस्था में भरोसा एडॉप्टिव ऑथेंटिकेशन, व्यवहार विश्लेषण, आवाज के सत्यापन और मॉडल के मजबूत ढांचे पर आधारित होना चाहिए.

सफल और विफल 
वित्तीय जगत नई हायरार्की वाली व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है. यह महज आकार से नहीं, बल्कि अल्गोरिद्म बदलाव की तैयारी से तय होगी. जो संस्थान एआइ के हिसाब से अपनी अंदरूनी प्रोसेस को फिर से विकसित कर लेंगे, वे ऑपरेशनल मजबूती, गहरी समझ और तेजी से फैसले लेने में सक्षम होंगे. ये संगठन डेटा प्रवाह को रणनीतिक एसेट मानेंगे. वे मॉडलिंग के नए तरीकों के साथ प्रयोग करेंगे, वैलिडेशन का सख्त ढांचा बरकरार रखेंगे और एआइ फैसलों को समझने वाली चीजो में निवेश करेंगे.

दूसरे समूह में टेक्नोलॉजी से संचालित चुनौतियां होंगी. हो सकता है कि वे पारंपरिक बैंकों जितने बड़े न हों लेकिन उनके पास चुस्ती और ज्यादा तेज एनालिटिकल साधन होंगे. उन्हें इस बात से बढ़त मिलेगी कि वे बड़े ग्राहक सेगमेंट के बजाए, व्यक्तिगत ट्रांजैक्शन के स्तर पर फैसलों को पर्सनलाइज कर सकेंगे.

खतरा उन संस्थानों को है जो खुद को नहीं ढाल पाएंगे. पुराना सिस्टम, छितरे हुए डेटा और इंसानी प्रक्रियाओं पर बहुत ज्यादा निर्भरता उन्हें इतना धीमा कर देगी कि इस अंतर को भरना मुश्किल हो जाएगा. इन संस्थानों को परिचालन के ज्यादा खर्च, फ्रॉड का खतरा और प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

आखिरी समूह उपभोक्ताओं का है. अगर संस्थान बिना पारदर्शिता या निष्पक्षता के एआइ लागू करते हैं, तो ग्राहकों को रिस्क के गलत वर्गीकरण या सीमित समाधान के रूप में इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. इसलिए फाइनेंशियल सेक्टर को ऑटोमेटेड फैसले लेने के लिए ग्राहकों के अधिकारों के लिए स्पष्ट ढांचा बनाना चाहिए. भारतीय बैंक इनोवेशन और रेगुलेटरी निगरानी के साथ किस तरह से तालमेल बिठाते हैं, वह वित्त क्षेत्र में जिम्मेदार एआइ के लिए दुनिया में नजीर बन सकता है.

जोखिम पर पुनर्विचार की जरूरत
फाइनेंस में जोखिम हमेशा से रहा है लेकिन अब जोखिम का स्वरूप बदल रहा है. हम क्रेडिट और बाजार जोखिम से आगे बढ़ते हुए मॉडल रिस्क, गलत और अधूरे डेटा के जोखिम, विरोधी से जोखिम और एक दूसरे पर निर्भरता के कारण होने वाले जोखिम की ओर बढ़ रहे हैं. अगर डेटा की क्वालिटी बदलती है तो एक अति सयाना मॉडल भी ऐसी गलती कर सकता है जिसका किसी को पता भी न चले. सेंध वाले डेटा से सारे अनुमान गड़बड़ा सकते हैं. बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाला थर्ड-पार्टी एआइ सिस्टम एक साथ कई संस्थानों में सिस्टमैटिक गड़बड़ियां पैदा कर सकता है.

रेगुलेटर एआइ को उसी तरह देखना जारी रखेंगे जैसे उन्होंने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद पूंजी की पर्याप्तता को देखा था. स्ट्रेस टेस्ट, सिनेरियो सिमुलेशन और साझा शासन के मानक जरूरी हो जाएंगे. एआइ के जिम्मेदार उपयोग के लिए लगातार निगरानी, ऑडिट की स्पष्टता और अहम मसलों पर इंसानी निगरानी की जरूरत होगी.

इंसानी विशेषज्ञता की भूमिका
हालांकि एआइ बहुत ज्यादा काम करता है लेकिन इसमें इंसानी फैसले की जरूरत खत्म नहीं होती. सच तो यह है कि किसी खास क्षेत्र में विशेषज्ञता का महत्व बढ़ जाता है. मॉडल का संचालन, नैतिक तर्क, जिम्मेदार तैनाती और सिस्टमैटिक प्रभाव को समझने के लिए अनुभवी प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है. वित्त की दुनिया का भविष्य इंसानी समझ और मशीन की इंटेलिजेंस के बीच सहयोग से तय होगा. जो संस्थान इस तालमेल को पहचानेंगे, वे आत्मविश्वास और मजबूती के साथ आगे बढ़ेंगे.

जाहिर है ऑटोमेटेड इकोनॉमी अब सिर्फ एक सैद्धांतिक संभावना नहीं. यह हमारे सामने उभर रही है क्योंकि एल्गोरिद्म ऋण के प्रवाह, बाजारों की हलचल और धोखाधड़ी पकड़ने को प्रभावित कर रहा है. अब सवाल यह नहीं है कि एआइ फाइनेंस को बदलेगा या नहीं, बल्कि यह है कि इस बदलाव को कितनी समझदारी से लागू किया जाएगा. अगर इसे जिम्मेदारी से लागू किया जाए, तो एआइ समावेश बढ़ा सकता है, संस्थानों को मजबूत कर सकता है और वित्तीय प्रणाली की समूची स्थिरता में सुधार कर सकता है.

यह साल ज्यादा मजबूत और बराबरी वाला वित्तीय परिदृश्य बनाने का मौका देता है. चुनौती यह पक्का करने की है कि इनोवेशन और गवर्नेंस एक ही रफ्तार से बढ़ें. फाइनेंस हमेशा दूरदर्शिता पर निर्भर रहा है. आज वह दूरदर्शिता उन एल्गोरिद्म तक पहुंचनी चाहिए जो ऑटोमेटेड इकोनॉमी के विकल्पों, जोखिमों और अवसरों को आकार दे रही हैं.

(उत्पल चक्रवर्ती गहना एआइ लैब (एग्जोरियन एआइ) के संस्थापक और मुख्य वैज्ञानिक हैं.)

खास बातें

  • एआइ बंधे-बंधाए नियमों की जगह अनुकूलनशील, संभावना आधारित समझ लाकर वित्त की मूल तर्कशक्ति को नए सिरे से गढ़ रहा.
  • एल्गोरिद्म के लिहाज से तैयार ही जीतेंगे. डेटा और मॉडल को रणनीतिक संपत्ति मानने वाले संस्थान बढ़त हासिल करेंगे.
  • स्वचालन नए प्रणालीगत जोखिम भी लाता है, जिससे निगरानी की जरूरत बढ़ जाती है. ऐसे में इंसानी सोच-समझ की अहमियत और ज्यादा हो जाती है.
  • गवर्नेंस के बिना तो छिपे हुए पूर्वाग्रह नतीजों पर असर डाल सकते हैं. वे ही संस्थान कामयाब होंगे जो एआइ आधारित क्रेडिट सिस्टम को ब्लैकबॉक्स की तरह नहीं बल्कि पारदर्शी पाइपलाइन की तरह बरतेंगे.

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