एल्गोरिद्म की जंग के चौराहे पर भारत

एआइ जैसे-जैसे युद्ध का स्वरूप बदल रहा, यह याद रखना जरूरी है कि लक्ष्य सिर्फ कल की लड़ाइयों में टिके रहना और जीतना भर नहीं बल्कि अपने सैनिकों को खोए बिना ऐसा करना है.

future trends AI: defence
सांकेतिक तस्वीर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारे दौर की सबसे परिवर्तनकारी, निर्णायक और सर्वव्यापी तकनीक बन चुका है. यह अब सिर्फ नवाचार का औजार नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा का मैदान तेजी से बन रहा है, जहां एआइ को आर्थिक और सैन्य दोनों तरह की रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है. रणनीतिक बढ़त के लिए एआइ की दौड़ दरअसल एक भू-राजनीतिक मुकाबला भी है, जिसे आर्थिक प्रभुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव के लिए निर्णायक माना जा रहा है.

यह ऊंचे दांव का खेल है. यह प्रतिस्पर्धा केवल तकनीकी क्षमता या ज्यादा स्मार्ट एल्गोरिद्म तक सीमित नहीं. असली लड़ाई उस बुनियादी इकोसिस्टम को खड़ा करने की है और उन मानकों तथा शासन ढांचों को आकार देने की है, जिनके जरिए ऐसी तकनीक को नियंत्रित किया जा सके जो सत्ता संरचनाओं को ही नए सिरे से परिभाषित कर सकती है.

एआइ और उसके सैन्य इस्तेमाल से जुड़ी अनिश्चितताओं ने युद्ध पर इसके प्रभाव को लेकर गहन बहस छेड़ दी है. यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि एआइ किस तरह युद्ध के नियमों को फिर से लिख रहा है, उसकी गतिशीलता और नैतिकता को बदल रहा है. युद्धक्षेत्र में एआइ के इस्तेमाल के निहितार्थ आज तीखी और जरूरी बहस का विषय बने हुए हैं: नीति निर्माताओं को इसके अंतर्निहित समझौतों के बीच कैसे रास्ता निकालना चाहिए और किन कानूनी तथा नैतिक सुरक्षा कवचों की जरूरत है.

एल्गोरिद्म से लड़ी जाने वाली जंग का मतलब है सैन्य कार्यों में एआइ और एल्गोरिद्म का इस्तेमाल. इसमें खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण के लिए विशाल डेटा का उपयोग, स्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाना, प्रीडिक्टिव एनालिसिस, तेज निर्णय प्रक्रिया, ऑटोनॉमस हथियार प्रणालियों का इस्तेमाल, सूचना प्रवाह नियंत्रित करना, जनमत को प्रभावित करना और नैरेटिव गढ़ना शामिल है. एआइ भारी रणनीतिक लाभ देने के साथ युद्ध के स्वरूप को बदल रहा है और युद्ध को लेकर हमारी कानूनी, नैतिक और वैचारिक समझ को चुनौती दे रहा है. इसके साथ नए तरह के जोखिम भी सामने आ रहे हैं.

रक्षा क्षेत्र में एआइ प्रणालियों के इस्तेमाल से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों में डेटा सुरक्षा, एल्गोरिद्मिक पक्षपात, ऑटोनॉमस हथियारों के नैतिक सवाल, अनिश्चितता और अविश्वसनीयता, अनचाहे परिणाम, जवाबदेही और जिम्मेदारी शामिल हैं. हाल के संघर्षों में लक्ष्य की पहचान और उन पर कार्रवाई में एआइ की भूमिका को देखते हुए, ऐसा लगता है कि हम युद्ध में निर्णय लेने के और भी अदृश्य और खतरनाक स्वचालित रूपों की ओर बढ़ रहे हैं.

क्या भविष्य में एआइ ऐसे किलर रोबोट तैयार करेगा जो युद्धभूमि में घूमते हुए एल्गोरिद्म के आधार पर मौत और तबाही बांटेंगे? जैसे-जैसे जेनरेटिव एआइ तकनीकें तेजी से विकसित होकर सूचना में हेरफेर के शक्तिशाली औजार बन रही हैं, जो प्रभावशाली कंटेंट तैयार कर सकती हैं और संदेशों को कई गुना बढ़ा सकती हैं, वैसे-वैसे वैश्विक सूचना सुरक्षा पर इसके असर और भी गंभीर होते जा रहे हैं.

जिम्मेदार सैन्य एआइ
जिम्मेदार सैन्य एआइ उन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय ढांचों और दिशा-निर्देशों को संदर्भित करता है, जिनका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में एआइ के नैतिक और कानूनी विकास तथा उपयोग को पक्का करना है. इसमें पारदर्शिता, सख्त वैलिडेशन, विकास और तैनाती के दौरान मानवीय हस्तक्षेप की व्यवस्था, उपयोग की जिम्मेदारी तय करना, विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, परिणामों के लिए जवाबदेही, अनचाहे पक्षपात या नुक्सान के जोखिमों को पहले से कम करना और सशस्त्र संघर्ष के कानूनों का पालन शामिल है.

इतिहास बताता है कि इंसान विज्ञान को नई दिशाओं में आगे बढ़ाता रहेगा, भले ही उनमें से कुछ रास्ते खतरनाक ही क्यों न हों. अगर एआइ हथियारों की दौड़ को बिना नियंत्रण के छोड़ दिया गया, तो यह ऐसे हथियार और युद्ध के तरीके लेकर आ सकती है जो ज्यादा प्रभावी और घातक तो होंगे, लेकिन उनमें मानवीय निगरानी कम होगी और संघर्ष बढ़ने की दहलीज भी नजदीक आ जाएगी.

खतरनाक तकनीकों पर सहयोग और साझा समझ बनाने का सबसे सही समय वही होता है, जब भरोसा अभी टूटा न हो और हथियारों की दौड़ शुरू न हुई हो. एआइ को नियंत्रण और नियमन के लिए एटमी तकनीक के समान मानना, जैसे एटमी अप्रसार संधि, पूरी तरह उपयुक्त नहीं है. इसकी वजह यह है कि एआइ में निरीक्षण और सत्यापन की जटिलताएं, तकनीक के तेज और अप्रत्याशित विकास की रफ्तार तथा निजी कंपनियों की बड़ी भूमिका जैसे अहम फर्क मौजूद हैं.

एआइ हथियारों की दौड़ से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, भरोसे के तंत्र और जिम्मेदार नवाचार तथा शासन व्यवस्था पर जोर देना जरूरी है, ताकि साझा मानक और विश्वास विकसित हो सके. किसी भी वैश्विक समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके तहत ऐसे आश्वासन तंत्र हों, जिनसे देश आपसी समझौतों के पालन की पुष्टि कर सकें. एक प्रभावी आश्वासन व्यवस्था का मकसद सिर्फ नियम तोड़ने से डराना नहीं, बल्कि उसे होने से रोकना होना चाहिए.

एआइ को नियंत्रित करने के लिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर कुछ प्रयास हुए हैं, जिनमें रक्षा क्षेत्र भी शामिल है. सेनाएं यह समझने लगी हैं कि गलत आकलन से बचने के लिए सुरक्षा उपाय बनाना जरूरी है, क्योंकि ऐसे गलत फैसले गंभीर नतीजे ला सकते हैं. कई देशों ने जिम्मेदार सैन्य एआइ को लेकर अपनी रणनीतियां, नीतिगत ढांचे और दिशा-निर्देश सामने रखे हैं. लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं. सभी हितधारकों को सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई करनी होगी ताकि एआइ की हथियारों की दौड़ नियमों और नियंत्रण से तेज न भागने पाए.

एआइ को नियंत्रित करने का दृष्टिकोण एक बुनियादी दुविधा पेश करता है. एक तरफ यह जिम्मेदार एआइ विकास के लिए ढांचा देता है, दूसरी तरफ इसके चलते नवाचार के दबने और देशों के इस क्रांतिकारी तकनीक में आगे बढ़ने से रुक जाने का जोखिम भी पैदा होता है. यूरोप ने एआइ के विकास और इस्तेमाल के लिए कड़े नियम लागू किए हैं. इसके उलट, अमेरिका ने अपेक्षाकृत हल्का नियामक रुख अपनाया है, जहां जोर नवाचार को बढ़ावा देने और अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने पर है. एआइ से जुड़ी चुनौतियों से निबटने में राष्ट्रीय हितों और वैश्विक सहयोग के बीच संतुलन बनाना नीति निर्माताओं के लिए एक अहम मुद्दा रहेगा.

भारत की सैद्धांतिक बहस
भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है. एआइ क्षेत्र में तेजी से हो रही प्रगति के बीच वह वैश्विक टेक सप्लाइ चेन में बड़ा खिलाड़ी बनने की स्थिति में है. सवाल यह है कि क्या भारत को एआइ को विनियमित करना चाहिए और अगर हां, तो किस रास्ते पर—आधुनिकीकरण या संप्रभुता. मौजूदा वैश्विक मॉडलों को ज्यों का त्यों अपनाना भारत के लिए उपयुन्न्त नहीं हो सकता. भारत को चाहिए कि वह एआइ के विशिष्ट नकारात्मक प्रभावों की पहचान करे और उनके लिए लक्षित नियम बनाए, बजाए इसके कि कोई व्यापक कानून लाया जाए जो जल्द ही अप्रासंगिक हो सकता है.

रक्षा क्षेत्र में एआइ के इस्तेमाल को लेकर बहस इस बात पर केंद्रित है कि सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता की तात्कालिक जरूरतों को गंभीर नैतिक, कानूनी और परिचालन चुनौतियों के साथ कैसे संतुलित किया जाए. तकनीक कभी भी मानवीय विवेक की जगह नहीं ले सकती. वह केवल उसे और सशक्त बना सकती है. युद्ध में सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि जंगी मशीनें कितनी इंटेलिजेंट हो जाती हैं, बल्कि इस पर कि इंसान उन्हें कितनी समझदारी से इस्तेमाल करता है.

भारत को रणनीतिक श्रेष्ठता के लिए 'ह्यूमन-इन-द-लूप’ या 'ह्यूमन-ऑन-द-लूप’ प्रणालियों को अपनाने और निगरानी जैसी गैर-घातक गतिविधियों में स्वायत्तता और 'ह्यूमन-आउट-ऑफ-द-लूप’ मॉडल पर ध्यान देना चाहिए. यह सिर्फ गति और नियंत्रण का ही नहीं इस बात का भी सवाल है कि हम अपनी आत्मा खोए बिना भविष्य के युद्धों में कैसे टिकें और जीतें और भारत की विशिष्ट गैर-राज्यीय सुरक्षा चुनौतियों और खतरों का मुकाबला कैसे करें.

जैसे-जैसे यह दौड़ बढ़ रही है और अलग-अलग देश अलग रास्ते अपना रहे हैं, वैश्विक समुदाय और भारत दोनों को एआइ की संभावनाओं का उपयोग करना होगा, जोखिमों को सीमित करना होगा, ताकि यह शक्तिशाली तकनीक पूरी मानवता के हित में काम कर सके. सैन्य क्षेत्र में एआइ लागू करने की जटिलताओं से निबटने के लिए तकनीक के साथ नैतिक, कानूनी, संगठनात्मक और प्रशासनिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा. इसके लिए प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शासन तंत्र अनिवार्य होंगे.

(जनरल मनोज पांडे, पूर्व थल सेना प्रमुख हैं. )

खास बातें
भारत को रणनीतिक श्रेष्ठता के लिए घातक बल के प्रयोग में 'ह्यूमन-इन/ऑन-द-लूप’ प्रणालियों और गैर-घातक गतिविधियों में 'ह्यूमन-आउट-ऑफ-द-लूप’ मॉडल पर ध्यान देना चाहिए.

एआइ की चुनौतियों में डेटा सुरक्षा, भरोसे का अभाव और ऑटोनॉमस हथियारों के बारे में नैतिक मुद्दे शामिल हैं.

रक्षा क्षेत्र में एआइ के इस्तेमाल को लेकर बहस इस बात पर केंद्रित है कि सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता की तात्कालिक जरूरतों को गंभीर नैतिक, कानूनी और परिचालन चुनौतियों के साथ कैसे संतुलित किया जाए. 

भारत अपने बढ़ते एआइ सेक्टर को कैसे नियंत्रित करेगा? संभव है कि मौजूदा नजरिया अनुकूल न हो. उसे एआइ के नकारात्मक परिणामों की पहचान करनी होगी और लक्षित नियम-कायदे बनाने होंगे.

युद्ध में सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि जंगी मशीनें कितनी इंटेलिजेंट हो गई हैं, बल्कि इस पर कि इंसान उन्हें कितनी समझदारी से इस्तेमाल करता है.

Read more!