पर्दे के पीछे से मजबूत पकड़
भाजपा के राजनैतिक नजरिए में बदलाव से लेकर RSS के सभ्यतागत संदेश तक, 2025 ने दिखाया कि मोहन भागवत खुलकर सामने आए बगैर, पर्दे में रहते हुए किस तरह तय करते हैं नतीजों की दिशा

नागपुर के रेशिमबाग मैदान में अक्तूबर की हल्की धूप के बीच मोहन भागवत हमेशा की तरह शांत भाव से मंच की ओर बढ़े. भगवा झंडे लहरा रहे थे, हजारों स्वयंसेवक कतारबद्ध खड़े थे और हवाओं में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का गीत गूंज रहा था.
दृश्य जाना-पहचाना था, लेकिन यह अवसर खास था. 1925 में जन्मा आरएसएस अपने सौ साल पूरे कर रहा था. अगर इस पल के महत्व को बिना शोर मचाए, सहज लेकिन ठोस अधिकार के साथ सामने रखने के लिए किसी चेहरे की जरूरत थी, तो 75 साल के सरसंघचालक उस भूमिका में बिल्कुल फिट बैठते थे.
यह अधिकार सिर्फ परंपरा से नहीं आता. साल 2025 ने राजनीति में इसकी ठोस अहमियत भी दिखा दी. 2024 में जो जमीनी ताकत दिखी थी, उस पर अब कोई शक नहीं रहा. पांच चुनावों में यह साफ हो गया कि जब आरएसएस चुनावी तैयारी से खुद को दूर रखता है, तो उसका राजनैतिक संगठन कमजोर पड़ता है. और जब संघ की बड़ी संगठनात्मक फौज वोट से पहले मैदान में उतरती है, तो भारतीय जनता पार्टी को उसका पूरा फायदा मिलता है.
2024 के लोकसभा चुनाव में, खासकर उत्तर प्रदेश में, भाजपा को जो झटका लगा था, और उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में मिली बड़ी जीतों को साथ रखकर देखें, तो आरएसएस की ताकत अपने आप साबित हो जाती है.
यही वजह है कि मोहन भागवत को अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद देश का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति कहा जाता है. और यही कारण है कि जब वे बोलते हैं, तो राजनैतिक वर्ग ध्यान से सुनता है. उनकी खासियत यह है कि वे इस असर को बोझ की तरह नहीं, संयम के साथ निभाते हैं. वे रोजमर्रा की नीतियों में दखल नहीं देते, न ही टकराव पैदा करते हैं. वे उतना ही बोलते हैं जितना जरूरी हो:
संघ परिवार के वैचारिक दिशा-सूचक के तौर पर, और भाजपा के लिए एक नैतिक संरक्षक की तरह, नरम लेकिन असरदार मार्गदर्शन देते हुए. साल 2025 में उनका यह असर और टकराव की जगह समाधान की उनकी प्रवृत्ति साफ दिखी. प्रधानमंत्री मोदी ने करीब एक दशक में पहली बार मार्च में नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय का एक दुर्लभ दौरा किया.
15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में मोदी ने राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका को खुले तौर पर स्वीकार किया. सरकार और संघ एक बार फिर एक सुर में दिखे—इरादों और हितों का साफ मेल.
ऐसे माहौल में भागवत के भाषणों का वजन और बढ़ गया. जब उन्होंने 2025 की शुरुआत में कहा कि ''प्रचारक 75 की उम्र में रिटायर हो जाते हैं'', तो इस पर खास ध्यान दिया गया. सितंबर में वे खुद और मोदी, दोनों इस उम्र तक पहुंचने वाले थे.
बाद में भागवत को स्पष्ट करना पड़ा कि यह कोई संकेत या संदेश नहीं था. उन्होंने इसे निरंतरता और बड़े वैचारिक संदर्भ में रखा. आरएसएस के शताब्दी समारोह में वे एक मिशनरी लहजे में बोले: ''आरएसएस अपने दूसरे सौ साल में अतीत का संगठन बनकर नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के मिशन के रूप में प्रवेश कर रहा है.''
आरएसएस के सरसंघचालक के रूप में अपने 16 साल के कार्यकाल में भागवत ने संघ की संस्थागत मौजूदगी को लगातार फैलते देखा है. साथ ही उन्होंने उसकी भाषा और सोच का दायरा भी बढ़ाने की कोशिश की है. उन्होंने बंधुत्व की बात की, दलित समूहों से संवाद शुरू किया, अंतरधार्मिक बातचीत को बढ़ावा दिया और यहां तक कि वाम बुद्धिजीवियों के कुछ वर्गों से भी संवाद किया.
उनकी निजी सादगी उन्हें पुराने त्यागी परंपरा से जोड़ती है. जैसे वे सत्ता की आधुनिक विकृतियों पर निगरानी रखे हुए हों. भीतर कहीं एक नैतिक सुधारक भी है, जो समाज को दिशा देने में विश्वास रखता है.
भरोसेमंद साथ
> आरएसएस को उसके 100वें वर्ष में भविष्य के भारत के मिशन के रूप में पेश किया, न कि अतीत के बोझ के तौर पर.
> 2024 में भाजपा को लगे झटके के बाद वैचारिक धुरी के रूप में उभरे, पार्टी की रणनीतिक दिशा तय करने में भूमिका निभाई.
> ध्रुवीकरण और अतिरेक के मुकाबले बंधुत्व, संतुलन और नैतिक पुनर्निर्माण को आगे रखा.
> जिस साल आरएसएस ने अपने 100 वर्ष पूरे किए और भागवत खुद 75 के हुए, वे ऐसी नेतृत्व-शक्ति के प्रतीक बने जो निरंतरता में निहित अधिकार से उपजती है.