प्रधान संपादक की कलम से
सितंबर में इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम व्यवस्था की जमी हुई परतें हटाते हुए जीएसटी 2.0 लागू किया गया और टैक्स स्लैब को व्यापक रूप से तर्कसंगत बनाया गया

- अरुण पुरी
दो ऐसे लोग, जिनके फैसले सीधे करीब दो अरब लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं. इस आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दोनों ही 2025 के 'सुर्खियों के सरताज’ की व्यक्तिगत दौड़ में शामिल हो सकते थे. इन्हें एक साथ क्यों चुना गया?
इसलिए कि 2025 के अनेक मोड़ों और उतार-चढ़ावों के बीच, जहां कई जगह उनके रास्ते एक-दूसरे से टकराए, इन दोनों में एक तीखा कूटनीतिक द्वंद्व चला. मोदी ने इसे संतुलन के साथ साधा. रिश्ते सहज तो रहे लेकिन तनाव से मुक्त नहीं. न टकराव, न ही किसी तरह की भाईचारे वाली गर्मजोशी. इससे भी ज्यादा दिलचस्प यह रहा कि मोदी ने इस चुनौती को अपने व्यक्तित्व के नीतिगत पहलू में बदलाव के अवसर की तरह इस्तेमाल किया.
वर्ष 2024 में ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल जीतने के बाद, भले ही जनादेश पहले से कमजोर था, मोदी इस क्षण को संभालने की मजबूत स्थिति में थे. उन्होंने 2024 में हरियाणा और महाराष्ट्र में बड़ी चुनावी जीत के जरिए अपने आधार को दोबारा मजबूत करना शुरू कर दिया था. 2025 की शुरुआत में दिल्ली की जीत ने इसे और पुख्ता किया. फिर बिहार में जबरदस्त जीत के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दबदबा बिना किसी शक के स्थापित हो गया.
मोदी ने नए जनादेश का इस्तेमाल निर्भीक आर्थिक सुधारों की ओर मुड़ने के लिए किया. बजट 2025 में व्यक्तिगत आयकर स्लैब में ढील दी गई, जिससे आम भारतीय के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा आया. सितंबर में परोक्ष कर व्यवस्था की जमी हुई परतें हटाते हुए जीएसटी 2.0 लागू किया गया और टैक्स स्लैब को व्यापक रूप से तर्कसंगत बनाया गया. इन दोनों कदमों ने मिलकर खपत में तेज उछाल पैदा किया और आर्थिक नीति का फोकस आपूर्ति पक्ष से हटकर मांग आधारित ग्रोथ की ओर शिफ्ट हुआ. वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8.2 फीसद रही, जबकि जीएसटी सुधारों का पूरा असर अभी आना बाकी था.
इस व्यापक आर्थिक नैरेटिव को 2025 में भीतर से भी मजबूती मिली. नई श्रम संहिता, भले ही उनमें आगे सुधार की गुंजाइश हो, कारोबार करने की सहूलियत को बेहतर बनाने की शृंखला का प्रमुख कदम बने. 7,000 अनुपालनों में कटौती की गई, 288 छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया और लालफीताशाही घटाने के लिए एक डी-रेगुलेशन कमेटी बनाई गई. दिसंबर में बड़े सुधारों का सिलसिला जारी रहा.
बीमा क्षेत्र को 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोल दिया गया. उसी महीने शांति (एसएचएएनटीआइ) अधिनियम लाया गया, जिसने एटमी ऊर्जा क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार खत्म करने और निजी क्षेत्र के लिए इसे पूरी तरह खोलने का रास्ता साफ किया. इसने नागरिक जवाबदेही के प्रावधानों को भी विदेशी निवेशकों, खासकर अमेरिकी कंपनियों के लिए अधिक अनुकूल बनाया. यह पहल बजट 2025 में किए गए उस वादे के अनुरूप थी, जिसे फरवरी में वाशिंगटन डीसी में मोदी-ट्रंप की द्विपक्षीय बैठक से पहले एक रणनीतिक सौदे के तौर पर पेश किया गया था, ठीक उस समय जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया था.
शुरुआत में दोनों नेताओं ने आपसी गर्मजोशी को फिर से जीवित किया. भारत उन शुरुआती देशों में था जिसने अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर बातचीत शुरू की, लक्ष्य था 2025 की शरद ऋतु तक इसे अंतिम रूप देना. लेकिन ट्रंप धैर्य में कम और दबाव की राजनीति में कहीं ज्यादा विश्वास करने वाले निकले. 2 अप्रैल को आए उनके टैरिफ झटके में भारत पर 25 फीसद शुल्क लगाया गया, जो 1 अगस्त से लागू होना था.
जहां ज्यादातर देश ट्रंप से समझौते करने के लिए झुक गए, वहीं भारत एक सख्त अपवाद के रूप में खड़ा दिखा. गर्मियों में रिश्ते और ठंडे पड़े. इसी दौरान पहलगाम में आतंकी हमला हुआ और भारत ने पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई की. पहले से ही जटिल मोदी-ट्रंप तालमेल यहीं आकर लड़खड़ा गया. ट्रंप संघर्ष रोकने का श्रेय बार-बार खुद लेते रहे जबकि मोदी ने साफ कहा कि पाकिस्तान ने घुटने टेके थे.
इसके बाद रिश्ते और बिगड़े जब ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाया और उस पर यूक्रेन युद्ध को फंड करने का आरोप लगाया. 1 अगस्त को उन्होंने भारत पर अतिरिक्त 25 फीसद टैरिफ लगा दिया, जिससे कुल शुल्क 50 फीसद हो गया और भारत ब्राजील की श्रेणी में आ खड़ा हुआ.
चूंकि अमेरिका के साथ भारत का व्यापार जीडीपी का करीब 2 फीसद है, यह विकास के लिए बड़ा झटका हो सकता था. लेकिन मोदी ने यहां भी संतुलित और चतुर दांव चला. न तो वे गिड़गिड़ाए, न बदले की भाषा अपनाई. उन्होंने नवाचार में रास्ता खोजा. निर्यातकों को नए बाजारों की ओर मोड़ा और भारत ने ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड समेत कई देशों से मुक्त व्यापार समझौते किए.
भारत ने ट्रंप को संकेत दिया कि वह किसी का मोहरा नहीं, बल्कि ताकतवर मुल्क है. पूरे साल भारत की घरेलू और विदेश नीति की बहस पर मोदी और ट्रंप छाए रहे. इसी वजह से 2025 के सुर्खियों के सरताज के रूप में उनका चयन पूरी तरह मुनासिब है.
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