विशेष गहन भूमिका में

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के जरिए मतदाता सूचियों की शुचिता सुनिश्चित करने के प्रयासों के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार लगातार राजनैतिक निशाने पर रहे, क्योंकि सुधार का सीधा सामना अविश्वास और विपक्षी प्रतिरोध के साथ था.

Other Newsmakers gyanesh kumar, Chief Election Commissioner
ज्ञानेश कुमार (फाइल फोटो)

फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार के निर्वाचन सदन में शीर्ष कुर्सी संभालने के साथ संस्थागत पुनर्गठन भी हुआ. 2023 में कानून में संशोधन कर चयन समिति में न्यायिक दखल चुपचाप हटा देने के बाद नियुक्त किए जाने वाले वे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे.

ऐसे में उनकी नियुक्ति ही एक सियासी विवाद का मुद्दा बन गई थी. विपक्ष ने आरोप लगाया कि नई व्यवस्था ने कार्यपालिका का दखल काफी बढ़ा दिया है. हालांकि, सरकार ने इसे तर्कसंगत करार दिया था.

बदलती संवैधानिक स्थितियों के साथ तालमेल बैठाने की कला में माहिर एक अनुभवी नौकरशाह ज्ञानेश कुमार ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम करता रहेगा. वैसे, उनके कार्यकाल का मूल्यांकन ऐसे दावों से ज्यादा इस बात के आधार पर किया जाएगा कि वे आम सहमति के प्रति असहिष्णु राजनैतिक माहौल के बीच भरोसे को फिर बहाल कर पाएंगे या नहीं.

ज्ञानेश कुमार ने तेजी से काम करना शुरू किया. पदभार संभालने के पहले 100 दिनों के भीतर उन्होंने 21-सूत्री व्यापक सुधार एजेंडा सामने रखा. इसमें भीड़भाड़ वाली स्थिति से बचने के लिए प्रति बूथ मतदाताओं की संख्या अधिकतम 1,200 तय करना, मतदाता पर्चियों को सुस्पष्ट करने के लिए फिर से डिजाइन करना और भारत के मतदाताओं की बदलती जनसांख्यिकी को ध्यान में रखकर घनी शहरी बस्तियों में मतदान केंद्रों का विस्तार करना आदि शामिल था.

तकनीकी सुधारों के साथ ज्ञानेश कुमार ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की शुरुआत की जो पुराने, दोहरे और फर्जी नामों को हटाने का एक व्यापक अभियान था. यह उस सफाई अभियान का एक मॉडल बन गया जिसे वे पूरे देश में लागू करना चाहते हैं. उनका मानना था कि मतदाता सूची ही चुनाव का प्रमुख आधार है और अगर वही भरोसमंद न रही तो अन्य हर सुधार केवल दिखावटी बनकर रह जाने का खतरा है.

विपक्ष की नजर में यह सत्ताधारी भाजपा की जीत तय करने में मदद देने की एक और रणनीति थी, जिसमें इस बार मतदाता सूची में हेरफेर की जा रही थी. साल के मध्य में राहुल गांधी ने आरोपों की झड़ी लगा दी और दावा किया कि 2024 के आम चुनाव में 'वोट चोरी’ और फर्जी मतदाता सूचियों का इस्तेमाल किया गया.

फिर हफ्तों भारतीय राजनीति आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजरती रही. राहुल ने स्वतंत्र ऑडिट के लिए मशीन के पढ़ लेने लायक मतदाता सूचियों की मांग की. जवाब में ज्ञानेश कुमार ने उनके दावों को 'झूठा और भ्रामक’ बताया. साथ ही कहा कि आयोग मतदाता गोपनीयता की कीमत पर 'संपादित’ करने योग्य डेटा प्रकाशित नहीं करेगा. उन्होंने विपक्ष को धोखाधड़ी साबित करने के लिए हलफनामे दाखिल करने या माफी मांगने की चुनौती तक दे डाली.

बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव ने उनके प्रशासनिक कौशल का एक अधिक ठोस प्रमाण सामने रखा. भारत के कई चरणों वाले चुनाव से बिल्कुल अलग हटकर ज्ञानेश कुमार ने बेहतर सुरक्षा-व्यवस्था का हवाला देते हुए केवल दो चरणों में बिहार के चुनाव कराए. मतदान 67 फीसद से ज्यादा हुआ; किसी भी दल या उम्मीदवार ने पुनर्निर्वाचन की मांग नहीं की, जो एक दुर्लभ उपलब्धि साबित हुई.

वर्ष के अंत तक ज्ञानेश कुमार का कार्यक्षेत्र चुनाव कराने की जिम्मेदारी से कहीं आगे विस्तारित होता दिखा. दिसंबर में उन्होंने स्टॉकहोम स्थित अंतर-सरकारी संस्था इंटरनेशनल आइडीईए के अध्यक्ष के तौर पर कार्यभार संभाला, जो वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने के प्रति समर्पित है.

इसने भारत की चुनाव प्रबंधन क्षमता को प्रमाणित किया. लेकिन घरेलू मोर्चे पर उनका काम अभी अधूरा है. बिहार में एसआइआर को लागू करने के बाद ज्ञानेश कुमार के सामने अब दूसरे राज्यों में भी इसी तरह संशोधनों को पूरा करने का कहीं ज्यादा जटिल कार्य है, जो चुनावों से पहले राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील भी हो जाता है.

ज्ञानेश कुमार ने बिहार में मतदाता सूची को साफ और भरोसेमंद बनाने की प्रक्रिया शुरू की तो विपक्ष को लगा कि यह राज्य में सत्ताधारी भाजपा की जीत पक्की करने में मदद देने की एक और रणनीति है

अपने क्षेत्र में माहिर
› केंद्रीय गृह सचिव के तौर पर ज्ञानेश कुमार ने उस कानून का मसौदा तैयार करने में मदद की जिसने अनुच्छेद 370 निरस्त करने और 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की राह खोली.

› उन्होंने राम मंदिर विवाद के दौरान सरकार की कानूनी और प्रशासनिक तैयारियों का नेतृत्व किया, और बाद में मंदिर निर्माण की देखरेख करने वाले ट्रस्ट की स्थापना में भी केंद्रीय भूमिका निभाई.

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