प्रधान संपादक की कलम से
फिलहाल चुनौती यह है कि आंकड़ों की इस मिठास को टिकाऊ और समावेशी ग्रोथ में कैसे बदला जाए

- अरुण पुरी
अमूमन सेंट्रल बैंकरों से परीकथा जैसी भाषा की उम्मीद नहीं की जाती. लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौजूदा हालात को बयान करने के लिए ऐसा ही जुमला चुना है. वे इसे 'गोल्डीलॉक्स पीरियड' कहते हैं. यानी ऐसा दौर, जब कई अनुकूल फैक्टर एक साथ मिलकर अर्थव्यवस्था के लिए स्वीट स्पॉट या उछाल का अवसर बना देते हैं, वह भी ट्रंप टैरिफ जैसे वैश्विक दबावों के बीच.
आसान शब्दों में कहें तो यह तेज ग्रोथ और कम महंगाई वाली अर्थव्यवस्था है. इंडिया टुडे को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में वे कहते हैं, ''हमारे पास दोनों जहान का फायदा है.'' बड़े पैमानों पर देखें तो भारत ने खुद को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर स्थापित किया है. लेकिन इसके साथ कुछ तल्ख हकीकतें भी जुड़ी हैं, जो जमीन पर टिके रहने की याद दिलाती हैं.
गवर्नर की यह उपमा लुभावना सवाल खड़ा करती है. क्या यह संतुलन का एक छोटा-सा पल है या किसी टिकाऊ दौर की शुरुआत? हाल की दो सुर्खियों ने उनकी आशावादिता को मजबूत किया. वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8.2 फीसद रही, जिसने रिजर्व बैंक के अनुमान समेत सभी उम्मीदों को पूरे एक फीसद से पीछे छोड़ दिया. इस आंकड़े ने भारत पर नजर रखने वालों को हैरान किया.
यह ग्रोथ सिर्फ सर्विस सेक्टर की 9.2 फीसद की मजबूत रफ्तार पर ही नहीं टिकी थी बल्कि मैन्युफैक्चरिंग में 9.1 फीसद की जोरदार वापसी पर भी, जो पिछले एक दशक के बड़े हिस्से में सुस्त रही थी. दूसरा संकेत सड़कों पर दिखा. सितंबर से शुरू हुए फेस्टिव सीजन ने दबी मांग को बाहर निकाल दिया. 42 दिन के इस दौर में ऑटो बिक्री अलग-अलग सेगमेंट में 22 से 23 फीसद तक बढ़ गई. इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स में भी खरीदारों की साफ उत्सुकता दिखी.
यह महज संयोग नहीं था. यह उपभोक्ता के पक्ष में लिया गया एक ऐसा पॉलिसी बदलाव था, जो ठीक 'निशाने पर' लगा. सितंबर में लंबे समय से उलझे माल एवं सेवा कर (जीएसटी) को तर्कसंगत करने के साथ कई उत्पादों को ऊंचे, दंडात्मक टैक्स स्लैब से बाहर निकाला गया. इससे पहले बजट में इनकम टैक्स स्लैब भी नरम किए गए थे. दोनों कदमों ने मिलकर उपभोक्ताओं के हाथ में ज्यादा पैसा छोड़ा और सामान सस्ता किया. नतीजा उम्मीद के मुताबिक रहा. सेंटिमेंट सुधरा और त्योहारों के समय सीधे खर्च में बदल गया.
करीब एक दशक तक सप्लाइ साइड इंसेंटिव निजी निवेश में जान नहीं डाल पाए. अब सरकार साफ तौर पर डिमांड के दम पर ग्रोथ बढ़ाने की दिशा में मुड़ चुकी है. इससे जुड़े कई दूसरे नीतिगत फैसलों ने भी गोल्डीलॉक्स असर को मजबूत किया. इस बदलाव में रिजर्व बैंक अहम साझेदार रहा है. मल्होत्रा के एक साल के कार्यकाल में रेपो रेट कुल 125 बेसिस पॉइंट घटा है. 5 दिसंबर को हुई 25 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद रेपो रेट 5.25 फीसद पर आ गया है, जो साल के आरंभ में 6.5 फीसद था.
तकनीकी बातें भले जटिल लगें लेकिन असर बिल्कुल साफ है. इससे बैंकों को रिजर्व बैंक से सस्ता कर्ज मिलता है. बैंक आगे चलकर लोन की दरें घटाते हैं. यही कड़ी निजी निवेश और खपत, दोनों को रफ्तार देती है. कंपनियों को सस्ते बिजनेस लोन मिलते हैं, जो खासतौर पर ज्यादा फाइनेंसिंग वाले सेक्टर के लिए जरूरी है. यह औसत भारतीय को मजबूरी का बचतकर्ता बनने से हटाकर खर्च करने वाला उपभोक्ता बनाने की प्रक्रिया तेज करता है.
सन् 2000 के बाद से घरेलू बचत आधी रह गई है, जो बढ़ते कर्ज को देखते हुए थोड़ी चिंता की बात है. लेकिन कम ब्याज दरें सेविंग और फिक्स्ड डिपॉजिट को कम आकर्षक बनाती हैं और बैंक खातों में पड़ा पैसा शेयर बाजार जैसे ज्यादा उत्पादक जगहों की ओर धकेलती हैं. इस नजर से देखें तो शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी जोखिम भरा रोमांच नहीं है. यह पूंजी को काम पर लगाने का तरीका है.
फिर भी गोल्डीलॉक्स जैसे अवसर हमेशा नहीं चलते. इसलिए इस उत्साह के साथ थोड़ी सावधानी जरूरी है. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, जीडीपी में उछाल का एक हिस्सा लो बेस की वजह से भी है. वित्त वर्ष 25 की दूसरी तिमाही में ग्रोथ सिर्फ 5.6 फीसद थी. क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी याद दिलाते हैं कि इन फायदों को अर्थव्यवस्था के गहरे हिस्सों तक पहुंचाने के लिए रफ्तार को बनाए रखना जरूरी है. एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्र कम महंगाई की वजह उत्पादन में मौजूद 'ढीलेपन' को मानते हैं.
उनके मुताबिक, आउटपुट अब भी महामारी से पहले के रुझान से 7 से 11 फीसद नीचे है. यह चिंता की बात है, क्योंकि हर साल बड़ी संख्या में लोग वर्कफोर्स में जुड़ रहे हैं. उनका यह भी मानना है कि जीडीपी की ऊपर जाती रेखा ज्यादातर रिजर्व बैंक की मौद्रिक ढील पर टिकी रहेगी क्योंकि ''सितंबर के आखिर और अक्तूबर में दिखी बिक्री की मजबूती लंबे समय तक टिकने के आसार कम हैं.'' त्योहारों से खपत में आई तेजी स्वागत योग्य है, पर यह ढांचागत सुधारों का विकल्प नहीं हो सकती. हालांकि श्रम कानून जैसे कदम दिखाते हैं कि मोदी सरकार का रिफॉर्म वाला जोश लौट रहा है.
इस हफ्ते की कवर स्टोरी में मैनेजिंग एडिटर एम.जी. अरुण और उनकी टीम ने उत्साह के साथ उसके उलट संकेतों को भी सामने रखा है. सीआइआइ के प्रेसिडेंट राजीव मेमानी के शब्दों में, जीएसटी कट 'एक बार का इवेंट' है. गोल्डीलॉक्स का यह पल असली है, लेकिन नाजुक भी. नीति के तौर पर इसका इस्तेमाल 'ज्यादा नौकरियां और आय का बेहतर बंटवारा' पैदा करने के लिए करना होगा. फिलहाल चुनौती यह है कि आंकड़ों की इस मिठास को टिकाऊ और समावेशी ग्रोथ में कैसे बदला जाए.
इसका मतलब है मुश्किल मुद्दों से निबटना. रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल, जो कारोबार की रफ्तार रोकता है. जॉब्स का संकट, जिसे स्किल मिसमैच और गहरा करता है. इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी, जो मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने से रोकती है. यह सुनहरा अवसर हमेशा नहीं रहेगा. इसका समझदारी से इस्तेमाल करना होगा, न कि संतोष में गंवा देना. अर्थशास्त्र में भी, परीकथाओं जैसे, सुखद अंत मिलते नहीं, उसके लिए काम करना होता है.