क्या है BJP का बिहार मॉडल, जिसे पार्टी 2026 विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल करेगी?

असम और तमिलनाडु में बिहार मॉडल को लागू करने की दूसरी चुनौती है. पार्टी नेताओं से इस बारे में बात करने पर पता चलता है कि इन दोनों राज्यों में भाषा की समस्या आएगी

पीएम नरेंद्र मोदी को माला पहनाते हुए संजय झा और उपेंद्र कुशवाहा (फाइल फोटो)

यह 26 नवंबर 2025 की रात की बात है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के दिल्ली स्थित आवास पर एक खास डिनर हुआ. बाहर ठंड थी लेकिन अंदर का माहौल गर्म और उत्साह से भरा था.

मेज पर बैठे लोग वे थे जिन्होंने कुछ हफ्ते पहले बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को 243 सदस्यों वाली विधानसभा में प्रचंड बहुमत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

उस डिनर में इन नेताओं-कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने और उनके प्रयासों की प्रशंसा के लिए नड्डा के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा धर्मेंद्र प्रधान, बीएल संतोष, सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव सरीखे पार्टी के दूसरे अहम नेता भी मौजूद थे. वहां डिनर के साथ-साथ एक लंबी रणनीतिक चर्चा भी चल रही थी. इस चर्चा का विषय था कि अब 'बिहार मॉडल' बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में कैसे लागू किया जाए.

इस बैठक के बाद पार्टी के अंदर यह तय हो गया कि 2025 का बिहार फॉर्मूला अब 2026 के विधानसभा चुनावों का टेम्प्लेट बनेगा.

ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार मॉडल आखिर है क्या? दरअसल, बिहार मॉडल कोई एक जादुई फॉर्मूला नहीं है. बल्कि यह कई स्तरों पर माइक्रो मैनेजमेंट से चलने वाली डेटा-आधारित, हाइपर-ऑर्गेनाइज्ड चुनावी मशीनरी का नाम है. इसके मुख्य स्तंभ के तौर पर प्रवासी प्रभारियों को पार्टी संगठन में काम करने वाले लोग चिह्नित करते हैं.

बिहार में चुनाव प्रबंधन का काम देख रहे भाजपा के एक वरिष्ठ नेता इस बारे में बताते हैं, ''प्रवासी प्रभारियों में भी दो स्तर हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में पहले तो हर लोकसभा सीट के लिए एक प्रवासी प्रभारी बनाया गया. इसके बाद बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों के लिए भी प्रवासी प्रभारी नियुक्त किए गए. ये सभी लोग बिहार के बाहर के थे. इतने बड़े पैमाने पर प्रवासी नेताओं को चुनाव प्रबंधन में लगाने का यह पहला प्रयोग था और पहली बार में ही यह सफल रहा.'' 

दरअसल इससे एक तरफ चुनाव में पार्टी को फायदा हुआ, वहीं दूसरी तरफ पार्टी नेताओं का संगठन कौशल भी बढ़ा. भाजपा के इन्हीं नेता के मुताबिक बिहार के चुनाव प्रबंधन में लगे इन नेताओं में से कई की पहचान की गई है, जिन्हें भविष्य में और बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है.

उत्तरी बिहार के एक जिले के प्रभारी रहे भाजपा के एक लोकसभा सांसद अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहते हैं, ''पार्टी ने मुझे पहले भी दूसरे राज्यों में भेजा है. लेकिन इस तरह से संगठित रूप में प्रवासी प्रभारियों की टीम को पहली बार मैंने काम करते देखा. अधिकांश प्रवासी प्रभारियों के साथ बिहार भाजपा की पहली बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद शामिल थे. इ

ससे प्रदेश भाजपा संगठन को भी यह संदेश दिया गया कि प्रवासी प्रभारी कोई रबर स्टांप नहीं बल्कि पार्टी संगठन ने उन्हें सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भेजा है. सबने काफी मेहनत से काम किया. चुनाव नतीजे आने के बाद मुझे खुद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा का फोन आया और उन्होंने कहा कि आपके काम की अच्छी रिपोर्ट मिली है और आपके योगदान के लिए पार्टी की तरफ से मैं आपको धन्यवाद कहता हूं.''

चुनाव प्रबंधन के इस बिहार मॉडल के तहत हर जिले में अलग 'वॉर रूम' बना. इस वॉर रूम में हर दिन शाम को सात बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से रिपोर्ट ली जाती थी. इस रिपोर्ट के आधार पर चुनावों को लेकर न सिर्फ नई रणनीति बनती थी बल्कि जरूरत पड़ने पर इसमें सुधार भी किया जाता था.

आखिर बिहार के लिए इतने सघन अभियान की योजना कैसे बनी? इस बारे में पार्टी के एक नेता कहते हैं कि इसका आंशिक प्रयोग दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुआ था क्योंकि यहां देश के अलग-अलग राज्यों के लोग रहते हैं. दिल्ली में अलग-अलग प्रदेशों के नेताओं को चुनाव प्रचार अभियान में लगाया गया था. दिल्ली की सफलता के बाद इसे और संगठित रूप में बिहार में लागू करने का निर्णय लिया गया.

बिहार में इस मॉडल को मिली सफलता के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं और चुनाव प्रबंधन करने वाली नेताओं की टीम में इस बात को लेकर सहमति बन गई है कि इसी रणनीति को 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी लागू किया जाए. 2026 में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. भाजपा इन राज्यों में वैसे प्रवासी प्रभारियों को उतारने की योजना बना रही है जो इन राज्यों को समझते हों.

भाजपा के एक नेता बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में औपचारिक तौर पर प्रवासी प्रभारी तो अभी नहीं गए लेकिन पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की टीम ने वहां काम करना शुरू कर दिया है.

भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं कि पश्चिम बंगाल के लिए 294 में से तकरीबन 250 सीटों पर पार्टी प्रवासी प्रभारी नियुक्त करने पर काम कर रही है. पार्टी सूत्रों की मानें तो भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष और सह-संगठन मंत्री शिवप्रकाश ने पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के दौरे किए हैं और ये दोनों इन राज्यों में बिहार मॉडल को सही ढंग से लागू करने की योजना पर काम कर रहे हैं.

भले ही भाजपा प्रवासी प्रभारियों वाले इस बिहार मॉडल को दूसरे राज्यों में लागू करने की योजना बना रही हो लेकिन यह भी एक अलग सचाई है कि हर प्रदेश की जमीनी राजनीति के आयाम अलग हैं और उस हिसाब से एक ही रणनीति हर जगह कामयाब हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है.

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से भाजपा में आए और फिर सांसद बने एक नेता इस बारे में कहते हैं, ''आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि पूरे बिहार में एक तरह की राजनीति थी. लेकिन जमीनी स्तर पर बंगाल की राजनीति में अलग-अलग क्षेत्र में अपनी ही तरह की विविधता दिखती है. इसलिए एक ही मॉडल पूरे बंगाल में प्रभावी होगा, इस बारे में पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. बिहार में भाजपा बंगाल के मुकाबले मजबूत स्थिति में थी और ऐसे राजनीतिक गठबंधन में थी, जिसके पक्ष में वहां की सोशल इंजीनियरिंग थी. बंगाल में ऐसा नहीं है. तृणमूल कांग्रेस की जमीनी हिंसा और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भाजपा के इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी. मुझे लगता है कि बंगाल में प्रवासी प्रभारी से ज्यादा स्थानीय नेताओं को तवज्जो देनी होगी.''

असम और तमिलनाडु में बिहार मॉडल को लागू करने की दूसरी चुनौती है. पार्टी नेताओं से इस बारे में बात करने पर पता चलता है कि इन दोनों राज्यों में भाषा की समस्या आएगी. इस संदर्भ में पार्टी के अंदर यह बात भी चल रही है कि जो प्रवासी प्रभारी इन राज्यों में भेजे जाएंगे, उन्हें जब तक स्थानीय भाषा का ज्ञान नहीं होगा, वे न तो मतदाताओं से संवाद कायम कर पाएंगे और न ही स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से उनका प्रभावी संवाद हो पाएगा.

भाजपा नेता एक दूसरी समस्या यह भी बता रहे हैं कि बिहार में जब चुनाव था तो उस वक्त किसी और राज्य में चुनाव नहीं था लेकिन अगले साल चार राज्यों में एक साथ विधानसभा चुनाव हो रहे होंगे, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर प्रभावी लोगों को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजना आसान नहीं होगा. तमिलनाडु में भले ही पिछले चुनाव में भाजपा को तकरीबन 10 फीसद वोट मिले हों लेकिन अब भी प्रदेश में भाजपा अपने दम पर यहां एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के तौर पर नहीं उभर पाई है. ऐसे में प्रवासी प्रभारी के अलावा चुनाव प्रबंधन से संबंधित पार्टी की अन्य रणनीतियों की सफलता को लेकर तमिलनाडु में कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं.

क्या है बिहार मॉडल

बिहार चुनाव के दौरान भाजपा की कई स्तर की रणनीति में माइक्रो मैनेजमेंट, प्रवासी प्रभारियों की नियुक्ति और डेटा के इस्तेमाल की अहम भूमिका थी. 

भाजपा ने सभी 90,740 बूथों की पहले मैपिंग की, फिर हर बूथ का डेटा निकालकर वोटरों तक पहुंच बनाई.

भाजपा ने प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना, किसान सम्मान निधि योजना और इनके जैसी अन्य प्रमुख योजनाओं के लाभार्थियों से संबंधित जानकारी का बखूबी इस्तेमाल किया. पार्टी ने इसके आधार पर तीन श्रेणियां बनाई थीं. इससे इन लाभार्थियों को लक्षित करना आसान हो गया.

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