देश के टॉप 10 बी-स्कूल कौन-कौन से हैं?
भारत 4,000 से ज्यादा बी-स्कूलों और दुनिया के सबसे ज्यादा युवा कार्यबल के साथ बदलाव के अहम पड़ाव पर खड़ा है

हर साल होने वाला इंडिया टुडे का सर्वश्रेष्ठ बी-स्कूल सर्वे राष्ट्रीय स्तर पर आत्म-निरीक्षण का एक छोटा लेकिन जरूरी हिस्सा बन चुका है. इसमें कई सवाल प्रमुखता से उठते हैं—आज भारत में महत्वाकांक्षा का चेहरा कैसा है?
देश कहां से प्रबंधकीय प्रतिभाएं आने की अपेक्षा कर रहा है? और प्रौद्योगिकी, भू-राजनीति और नई आकांक्षाओं से बदलती दुनिया में प्रासंगिक बने रहने के लिए प्रबंधन संस्थान कितनी दूर तक जाने का माद्दा रखते हैं?
इस साल मार्केट रिसर्च एजेंसी एमडीआरए की तरफ से किया गया सर्वे एक ऐसे क्षेत्र की कहानी है जिसे कभी अपनी स्थिरता पर गर्व होता था लेकिन अब अस्थिरता से जूझ रहा है. यह उन छात्रों की कहानी है जो कभी सफलता को सैलरी पैकेज से मापते थे लेकिन अब लचीलापन, नेटवर्क और आजीवन प्रासंगिकता ही सबसे ज्यादा अहमियत रखती है.
सभी कैंपस में आमूलचूल बदलाव हो रहे हैं. भारत में एमबीए शिक्षा का स्वरूप कभी एक जैसा ही हुआ करता था—दो साल की क्लासरूम लर्निंग, भारी-भरकम केस-आधारित शिक्षा और संस्थानों का एक सुस्थापित पदानुक्रम. लेकिन अब यह कई लेन वाले एक्सप्रेसवे की तरह है जो अलग-अलग रास्ते मुहैया कराता है.
युवा स्नातकों के लिए फुल-टाइम प्रोग्राम, कामकाजी पेशेवरों के लिए ऑनलाइन डिग्री, मिड-करियर एग्जीक्यूटिव के लिए एडवांस्ड सर्टिफिकेट और वरिष्ठ उद्योग विशेषज्ञों के लिए भी सुलभ डॉक्टरेट कार्यक्रम. प्रबंधन शिक्षा एक सतत प्रक्रिया बन गई है, और भारत 4,000 से ज्यादा बी-स्कूलों और दुनिया के सबसे युवा कार्यबल के साथ बदलाव के अहम पड़ाव पर खड़ा है.
मजबूती दे रही एक दो-स्तरीय प्रणाली
अगर 2025 के बी-स्कूल परिदृश्य की बात करें तो संगठनात्मक सिद्धांत पूरी तरह वर्गीकरण पर केंद्रित है. यह क्षेत्र दो अलग-अलग ट्रैक में बंटा दिखता है—एक अभिजात वर्ग और दूसरा सामान्य वर्ग की भरमार. शिखर पर प्रतिष्ठित दिग्गज हैं—आइआइएम जैसे सार्वजनिक संस्थान और एसपीजेआइएमआर, एक्सएलआरआइ, एमडीआइ गुड़गांव, एनएमआइएमएस और सिम्बायोसिस जैसे सर्वश्रेष्ठ निजी संस्थान. ये अब राष्ट्रीय स्तर के साथ वैश्विक स्तर पर भी प्रतिष्ठा हासिल कर चुके हैं. रिक्रूटर्स के भरोसे और स्थिर वेतन के साथ उनकी स्थिति मजबूत बनी हुई है और पूर्व छात्र नेटवर्क उनके लिए आर्थिक प्रणाली की रीढ़ बना हुआ है.
इस साल, टॉप 10 बी-स्कूलों ने औसतन घरेलू वेतन 29 लाख रुपए से थोड़ा ज्यादा बनाए रखा. इस आंकड़े में वृद्धि भले ही मामूली रही लेकिन स्थिरता रखना सबसे बड़ी खासियत रही. एआइ-आधारित नौकरियों में बदलाव, वैश्विक आपूर्ति-शृंखला के पुनर्गठन और आर्थिक चुनौतियों के कारण दुनिया में अस्थिरता के बाद भी भारतीय कंपनियों में टॉप-टियर मैनेजिंग टैलेंट की मांग अच्छी खासी बनी हुई है.
अभिजात वर्ग से नीचे आकर देखें तो परिदृश्य ज्यादा गतिशील है. 76-100 रैंक वाले संस्थानों की औसत सैलरी 7-8 लाख रुपए के करीब रहती है, जो इतना बड़ा अंतर है कि एक अलग बाजार की तरह ही लगता है. यह असमानता अब और बढ़ गई है. यूं कह सकते हैं कि यह अंतर अब ज्यादा स्पष्ट तरीके से नजर आता है.
आज के छात्र अपेक्षाकृत ज्यादा जानकार, अच्छा-बुरा बेहतर समझने वाले और आरओआइ (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) के प्रति ज्यादा जागरूक होते हैं. वे डेटा पर बारीकी से नजर रखते हैं—आप जिस संस्थान में दाखिला लेते हैं, वह न सिर्फ आपकी पहली नौकरी बल्कि करिअर का रास्ता भी तय कर सकता है.
आइआइएम-ए की वापसी
शीर्ष स्तर के परिदृश्य में आइआइएम अहमदाबाद के नंबर-1 पर लौटने से बेहतर कुछ नहीं दिखाता. पिछले साल हिस्सा न लेने और 2022 और 2023 में आइआइएम कलकत्ता से पिछड़ने के बाद संस्थान फिर मैदान में उतरा और अपना दबदबा हासिल करने में सफल रहा. अपने प्रतिद्वंद्वी को इसने बहुत कम अंतर से पीछे छोड़ दिया.
कई दशकों से प्रबंधन शिक्षा के क्षेत्र में 'ए बनाम सी’ के बीच वर्चस्व की लड़ाई भारत-पाकिस्तान जैसी रही है, जिसमें बहुत कुछ दांव पर होता है, भावनात्मक जुड़ाव होता है और लगातार बहस चलती रहती है. इस साल, मुकाबला बहुत कम स्कोर के अंतर से तय हुआ, जिसमें प्लेसमेंट एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन गया.
कहानी सिर्फ पुराने दिग्गज संस्थानों तक सीमित नहीं है. आइआइएम लखनऊ तीसरे स्थान पर काबिज है; आइआइएम इंदौर टॉप-टियर संस्थान के तौर पर अपनी जगह मजबूत कर रहा; वहीं आइआइएफटी, नई दिल्ली ने अपनी लगातार प्रतिस्पर्धात्मकता से हैरान किया है. इन जाने-पहचाने नामों से इतर भी गहरे बदलाव नजर आते हैं—नई पीढ़ी के आइआइएम—जम्मू, सिरमौर, तिरुचिरापल्ली, उदयपुर—अब प्रदर्शन के मामले में 'नए’ नहीं रह गए हैं. बेहतर शासन, उन्नत बुनियादी ढांचे और भविष्य के कौशल के साथ आक्रामक तालमेल स्थापित कर इन्होंने मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है.
निजी क्षेत्र के दिग्गज संस्थान
यदि सरकारी रैंकिंग में दिग्गजों का बोलबाला है तो निजी बी-स्कूल रैंकिंग काफी शांति के साथ होते क्रांतिकारी बदलावों की कहानी बयां करती है. एसपीजेआइएमआर का नंबर-1 पर पहुंचना और तीन वर्षों तक टिके रहना प्रतीकात्मक बदलाव का प्रतीक है—एक दौर में एक्सएलआरआइ की बेताज बादशाहत थी. लेकिन नए जमाने में शासन, उद्योग साझेदारी और शहरी कॉर्पोरेट निकटता कहीं ज्यादा मायने रखती है.
एक्सएलआरआइ निजी बी-स्कूलों में दूसरे स्थान पर जरूर आ गया है, लेकिन उसका दबदबा बरकरार है. एमडीआइ गुड़गांव को रणनीतिक रूप से 'कॉर्पोरेट कॉरिडोर का लाभ’ मिल रहा है क्योंकि यह भारत के सबसे गतिशील व्यावसायिक क्षेत्र में स्थित है. एनएमआइएमएस और एसआइबीएम पुणे ने मुंबई-पुणे धुरी को मजबूती दी है जो अब देश में सबसे प्रभावशाली निजी शिक्षा केंद्र के तौर पर उभर रही है.
लेकिन असली बदलाव निचले स्तर पर उन संस्थानों में नजर आ रहा जिन्होंने लंबी रेस का घोड़ा बनाने वाली दीर्घकालिक रणनीति अपनाना सीख लिया है. टीएपीएमआइ, केजे सोमैया, ग्रेट लेक्स, बिमटेक, एसडीआइएमडी और वेलिंगकर जैसे संस्थान सिर्फ इसलिए ही आगे नहीं बढ़ रहे क्योंकि उन्होंने शैक्षणिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ किया है, एआइ-आधारित शिक्षण प्रणालियों को अपनाया है, फैकल्टी विकास में निवेश किया है और कॉर्पोरेट जगत के साथ संपर्क मजबूत किए. ये एक नए मध्य वर्ग का उदय है, संस्थानों का एक ऐसा समूह जो खुद को विश्वसनीय, भविष्य के लिए तैयार स्कूलों में बदल रहा है और पारंपरिक अभिजात वर्ग को चुनौती देने में सक्षम है.
डिग्री का मोल
शीर्ष सरकारी और शीर्ष निजी बी-स्कूल दोनों की फीस अब तकरीबन समान हो गई है. शीर्ष-100 में शामिल सरकारी स्कूलों की औसत फीस निजी संस्थानों से थोड़ी ज्यादा ही है, जिसका मुख्य कारण आइआइएम की तरफ से बाजार-आधारित शिक्षण संरचना अपनाना है. इसमें निवेश पर पैसा वसूल करने यानी आरओआइ पर ज्यादा ध्यान होता है. अगर कोई छात्र प्रबंधन की पढ़ाई पर 20 लाख रुपए खर्च करने वाला है तो सिर्फ ब्रांड के आधार पर चुनने के बजाय यह देखता है कि इतनी रकम खर्च करने के बदले उसे क्या हासिल होगा.
इस वर्ष आरओआइ चैंपियन ऐसी जगहों से उभरे, जिनकी उम्मीद नहीं की गई थी—बड़ौदा का एमएस विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय का बिजनेस इकोनॉमिक्स विभाग, तेजपुर विश्वविद्यालय और तमिलनाडु या छत्तीसगढ़ के छोटे निजी संस्थान मामूली फीस लेते हैं लेकिन प्लेसमेंट अच्छा मिलता है. आरओआइ सूची उन छात्रों के लिए एक जवाब या वैकल्पिक मैप की तरह है जो प्रतिष्ठा से ज्यादा मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं.
सर्वेक्षण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भौगोलिक स्थिति नतीजों को कैसे प्रभावित करती है. दशकों से वित्त और परामर्श के केंद्र रहे मुंबई में औसत एमबीए वेतन भारत में सबसे ज्यादा है. गुरुग्राम की कॉर्पोरेट बेल्ट के साथ दिल्ली-एनसीआर की स्थिति मजबूत बनी हुई है. बहरहाल, यह बात काफी हैरान करती है कि पूर्वी क्षेत्र, खासकर कोलकाता और जमशेदपुर, अपनी क्षमता से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं.
इस बीच, दक्षिण को कमजोर स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. बेंगलूरू का औसत वेतन उम्मीदों से कम है, जो दर्शाता है कि टेक सिटी के संस्थानों के बड़े समूह ने बिना किसी आनुपातिक मांग के बाजार में उपलब्धता को जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया है.
प्रबंधन की नई एबीसी
वर्ष 2025 में असली रफ्तार सिर्फ दो वर्षीय मुख्य कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि अन्य वैकल्पिक पाठ्यक्रम भी तेजी से बढ़े. एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम उन पेशेवरों को आकर्षित कर रहा जो कॉर्पोरेट जगत की तीव्र गति के साथ समझौता किए बिना नेतृत्व क्षमता जल्द से जल्द बढ़ाना चाहते हैं. एग्जीक्यूटिव जनरल मैनेजमेंट कोर्स पूरी तरह अलग प्रोफाइल बना रहे और ऐसे महत्वाकांक्षी पेशेवरों के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं जिन्हें अगले चरण की जिम्मेदारियां संभालने में सक्षम बनने के लिए आधारभूत शिक्षण ढांचे की जरूरत है.
वहीं, फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट अपने पुराने अकादमिक खाके से हटकर हाइब्रिड हो रहे हैं, जिसमें औद्योगिक विशेषज्ञता अनुसंधान-आधारित जानकारी के साथ मिलकर ऐसे करिअर के दरवाजे खोल रही है जो अभ्यास, परामर्श, नीति कार्य और छात्रवृत्ति से जुड़े हैं. ऑनलाइन और मिश्रित एमबीए का विस्तार हो रहा है, जिसका नेतृत्व आइआइएम अहमदाबाद, एमडीआइ गुड़गांव, आइआइएम मुंबई, और आइआइएफटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान कर रहे हैं, जिन्होंने प्रबंधन शिक्षा में डिजिटल विश्वसनीयता को फिर से परिभाषित किया है.
क्षमता का खामोश संकट
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) ने पिछले कुछ दशकों में उच्च शिक्षा में सबसे महत्वाकांक्षी बदलाव की नींव रखी है. बहुविषयक शिक्षा, क्रेडिट बैंक, लचीली डिग्री संरचनाएं, विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश और डिजिटलीकृत शिक्षण पद्धतियां अमूर्त सुधार के विचार भर नहीं रहे हैं, बल्कि भारतीय प्रबंधन शिक्षा के पुनर्गठन के सक्रिय तत्व बन चुके हैं.
एनईपी के तहत स्वायत्तता और वैश्विक स्तर पर तालमेल स्थापित करने के प्रयासों ने खासकर दूसरी पीढ़ी के आइआइएम और सर्वश्रेष्ठ निजी बिजनेस स्कूलों को ऊर्जा प्रदान की है. अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां बढ़ रही हैं. दोहरी डिग्री कार्यक्रमों पर मंथन हो रहा है. एआइ-एकीकृत कक्षाएं अब आम हैं. और विदेशी विश्वविद्यालय, जिनमें कुछ वैश्विक स्तर पर शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों में भी शुमार हैं, भारत में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं.
संस्थागत विकास के नीचे एक चिंताजनक सच छिपा है—भारत में बी-स्कूलों के विकास को बनाए रखने योग्य पर्याप्त प्रबंधन संकाय नहीं है. यहां तक शीर्ष बी-स्कूलों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय संकाय को आकृष्ट करना आसान नहीं है. सरकारी संस्थान ढर्रे के वेतन पर अटके हैं, जबकि निजी स्कूल वैश्विक शैक्षणिक वेतन से प्रतिस्पर्धा की स्थिति में नहीं हैं. इस चुनौती से निबटने के लिए संस्थान संकाय विकास कार्यक्रमों, अनुसंधान प्रोत्साहनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोगों में भारी निवेश कर रहे हैं.
आगे क्या
यह समझने के लिए कि 2025 का सर्वे असल में क्या दर्शाता है, हमें सूची से थोड़ा हटकर उस पूरी तस्वीर को देखना होगा जो इससे उभरकर आ रही है. आज के छात्र सिर्फ यह तय नहीं कर रहे हैं कि कहां पढ़ना है, बल्कि यह ज्यादा सोचते हैं कि वे क्या और कैसे सीखना चाहते हैं, क्या हासिल करना चाहते हैं और कौन-सा रास्ता लक्ष्य की तरफ ले जाएगा. वैसे 1990 के दशक में भारतीय एमबीए बूम को जिस भूख ने बढ़ावा दिया, वह आज भी वैसी है.
इसे पूरा करने के रास्ते कई गुना बढ़े हैं और वैश्विक भी हो गए हैं. सर्वे बताता है कि बी-स्कूलों के लिए अब पहचान नहीं, प्रासंगिकता सबसे जरूरी हो गई है. अगले दशक में वही बी-स्कूल अपनी बादशाहत कायम रख पाएंगे जो लचीले, डिजिटल कौशल और वास्तविक दुनिया की जरूरतों पर आधारित आकांक्षाओं के समीकरण को समझेंगे.
एक नया मध्य वर्ग उभर रहा है. ये संस्थान पारंपरिक अभिजात वर्ग को चुनौती देने में सक्षम हैं.
वर्ष 2025 में असली रफ्तार दो वर्षीय मुख्य कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि अन्य एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम तक आ गई है.
सर्वे का तरीका: कैसे की गई बी-स्कूलों की रैंकिंग
इंडिया टुडे ग्रुप के लिए देश के बिजनेस स्कूलों का सर्वे, 2025 दिल्ली स्थित मार्केट रिसर्च फर्म मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) की तरफ से किया गया. इस सर्वे में एकदम नवीनतम डेटा के आधार पर भारत के सर्वश्रेष्ठ बी-स्कूलों की सबसे भरोसेमंद और पूर्ण रैंकिंग की गई है. इस साल के संस्करण में टॉप एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम, टॉप एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम (10 साल से ज्यादा अनुभव वाले पेशेवरों के लिए), टॉप एग्जीक्यूटिव फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट, टॉप ऑन-कैंपस फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट, और भारत में टॉप ऑनलाइन एमबीए के लिए खास सूची भी शामिल है.
कम से कम पांच वर्ष पूर्व स्थापित और 2023 के शैक्षणिक वर्ष के अंत तक न्यूनतम तीन स्नातक बैच वाले पूर्णकालिक कक्षा प्रबंधन कार्यक्रम (पीजीडीएम/एमबीए) प्रदान करने वाले बी-स्कूलों को पूर्णकालिक एमबीए/पीजीडीएम रैंकिंग में शामिल किया गया. हितधारकों को अधिक वास्तविक, अपडेट और सटीक जानकारी प्रदान करने के लिए संस्थानों से 127 विशेषताओं पर नवीनतम प्रासंगिक जानकारी (चालू वर्ष का डेटा) प्राप्त करने के लिए एक वस्तुनिष्ठ प्रश्नावली में कुछ संशोधन किए गए. भागीदारी की पात्रता रखने वाले देशभर के 2,500 से ज्यादा बी-स्कूलों में से 275 ने समयसीमा के भीतर जवाब दिया, और इनमें से 271 को रैंकिंग दी गई.
वस्तुनिष्ठ डेटा मिलने के बाद तार्किक जांच के डेटा की छंटाई, सत्यापन, पुनर्मूल्यांकन और ऑडिट जैसी चार प्रक्रियाएं अपनाई गईं. पहले चरण में उपलब्ध जानकारी और एमडीआरए के डेटाबेस के माध्यम से प्रदान किए गए विवरणों के हरेक पहलू की सावधानीपूर्वक जांच की गई.
दूसरे चरण में उपलब्ध डेटा की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए एमडीआरए के शोधकर्ताओं ने सत्यापन और ऑडिट किया. मूल्यांकन के पांच प्रमुख मानक थे—शिक्षण अनुभव, वास्तविक अनुभव, चयन प्रक्रिया, नियुन्न्ति प्रदर्शन और भविष्योन्मुख दृष्टिकोण. विभिन्न स्तरों पर सत्यापन को एक बार और परखने के बाद वस्तुनिष्ठ डेटा के आधार पर अंतिम रैंक निर्धारित की गई.
इस परियोजना पर शोधकर्ताओं, सांख्यिकीविदों, अर्थमितिविदों और विश्लेषकों की एक बड़ी टीम ने अप्रैल से अक्तूबर 2025 तक काम करती रही. अभिषेक अग्रवाल (कार्यकारी निदेशक) के नेतृत्व में एमडीआरए की प्रमुख टीम में अवनीश झा (वरिष्ठ परियोजना निदेशक), वैभव गुप्ता, मनवीर सिंह, रॉबिन सिंह और ऋभ शर्मा शामिल रहे.
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