प्रधान संपादक की कलम से

इंडिगो में इस पैमाने पर हालात कैसे बेकाबू हुए? क्या इसकी जड़ें उस सुधार में छिपी हैं जिसकी भारत को सख्त जरूरत थी.

24  दिसंबर 2025 अंक
24 दिसंबर 2025 अंक

- अरुण पुरी

अधिकतर भारतीय यात्री इस मत के हैं कि इंडिगो ने अपना साम्राज्य किसी दिखावे या तरकीबों से नहीं, एक सीधा-सरल काम करके बनाया: समय पर उड़ान भरना और समय पर उतरना. उसकी दक्षता पर लोगों ने भरोसा किया. इंडिगो की करीब 2,300 दैनिक उड़ानें घड़ी की सुई की तरह चलती थीं. कंपनी बिना शोर-शराबे वाजिब किराए पर रोज पांच लाख यात्रियों को 90 से ज्यादा घरेलू और 45 अंतरराष्ट्रीय ठिकानों तक पहुंचा रही थी.

किंगफिशर, जेट एअरवेज, गो फर्स्ट जैसे प्रतिद्वंद्वियों के पतन के साथ ही इंडिगो और मजबूत होती गई. धीरे-धीरे 6ई 60 फीसद से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ भारतीय आसमान पर लगभग एकाधिकार की स्थिति तक पहुंच गया. अमेरिका जैसे विशाल बाजार में भी सबसे बड़ी घरेलू एअरलाइन की हिस्सेदारी सिर्फ 21 फीसद है.

वित्त वर्ष 25 में इंडिगो का टैक्स के बाद मुनाफा 7,258 करोड़ रुपए रहा. अप्रैल में, थोड़े समय के लिए सही, यह मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर दुनिया की सबसे मूल्यवान एअरलाइन बन गई थी.

इंडिगो की कामयाबी की जड़ में उसका मिनिमलिस्ट बिजनेस मॉडल था: खर्च कटौती, उत्पादकता बढ़ाना और प्रति उपलब्ध सीट किलोमीटर लागत(सीएएसके) को 3.71 रुपए पर रखना, जो एशिया की एअरलाइनों में सबसे कम है. यह 'किफायत' ही उसकी असली ताकत थी. उसके पास 417 विमानों का बेड़ा एअरबस का ही है. इंडिगो के विमान दूसरे कैरियर्स के मुकाबले ज्यादा उड़ान भरते और रोजाना करीब 12 घंटे उपयोग का लक्ष्य पूरा करते. सीटिंग व्यवस्था घनी रहती.

गर्म खाना नहीं परोसने से विमान का वजन कम रहता, ईंधन की खपत घटती. 'आइफ्लाइ' ट्रेनिंग हब में तैयार मानकीकृत क्रू प्रक्रियाओं ने उसकी श्रम दक्षता बढ़ाई. पायलट-टू-एअरक्राफ्ट अनुपात हैरान करता. इंडिगो में हर विमान पर लगभग 13 पायलट जबकि एअर इंडिया के मुख्य बेड़े में यह संख्या लगभग 34:1 है. यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि कंपनी की संसाधन आवंटन रणनीति बेहद धारदार थी. इस हफ्ते की कवर स्टोरी की मुख्य विडंबना यही है कि इंडिगो उसी तेज धार पर चलते-चलते कैसे लड़खड़ा गई.

दिसंबर की शुरुआत में मची अफरातफरी ने सबको चौंका दिया. चंद ही दिनों में 5,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द या बुरी तरह लेट होने से 10 लाख से ज्यादा यात्री फंस गए. 4 से 6 दिसंबर के बीच 2,948 घरेलू उड़ानें टेकऑफ न कर सकीं. अकेले 5 दिसंबर को 1,588 रद्द, जिनमें इंडिगो की 78 फीसद उड़ान थीं. एअरपोर्ट टर्मिनल रेलवे स्टेशनों से भी बदतर दिख रहे थे. सामान के ढेर को कोई देखने वाला नहीं. कई बैग गलत शहर पहुंच गए. दूसरी एअरलाइनों ने किराए बढ़ा दिए और इंडिगो की साख जमीन पर आ लगी.

इंडिगो में इस पैमाने पर हालात कैसे बेकाबू हुए? इसकी जड़ें उस सुधार में छिपी हैं जिसकी भारत को सख्त जरूरत थी: नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशंस (एफडीटीएल), ऐसी नियमावली जिससे यह होता है कि पायलट कितनी देर उड़ान भर सकते हैं और उन्हें कितना आराम की जरूरत है. भारत वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मानकों से पीछे था. कानूनी लड़ाइयों और विशेषज्ञों से परामर्श के बाद नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने जनवरी 2024 में संशोधित नियम जारी किए और एअरलाइनों को तैयारी के लिए करीब दो साल का समय दिया.

नए नियमों ने उड़ान घंटे घटाए, अनिवार्य आराम हर हफ्ते 36 से बढ़ाकर 48 घंटे किया, नाइट ड्यूटी की परिभाषा बदली, और नाइट लैंडिंग छह से घटाकर दो कर दीं. कुल 22 नए मानक, दो चरणों में 1 जुलाई और 1 नवंबर से लागू हुए. इनका सबसे ज्यादा असर इंडिगो पर पड़ा क्योंकि कोई दूसरी एअरलाइन 'लीन एफिशिएंसी' मॉडल पर इतनी निर्भर नहीं थी. नए नियमों ने पायलट उपलब्धता झटके में घटा दी. क्या इंडिगो ने तैयारी की? सबूतों से तो नहीं लगता. दो साल पहले सूचना मिलने पर भी उसने पायलट भर्ती धीमी रखी. पायलट बढ़ाने की जगह उसने मार्च की अपनी पायलट संख्या 5,463 से घटाकर नवंबर में 5,085 कर दी. उसने यह मानकर जोखिम लिया कि एअरबस विमानों की लेट डिलिवरी और बाजार में उसकी प्रभुता उसे अतिरिक्त समय दिला देगी.

नवंबर के आखिर से दिसंबर की शुरुआत तक मौसम बिगड़ने लगा. दक्षिण में दित्वाह साइक्लोन और उत्तर में घने कोहरे ने इंडिगो के पायलटों को रोक दिया. मैनपावर बफर पहले ही कम था, अब रोस्टरिंग सॉफ्टवेयर जाम होने लगा क्योंकि वह एक असंभव समीकरण हल करने की कोशिश कर रहा था—नियम के हिसाब से आराम किए हुए कम पायलटों को ज्यादा विमानों से जोड़ना. विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ गणित की समस्या नहीं थी बल्कि उस बिजनेस मॉडल का नतीजा था जिसे क्षमता से ज्यादा तान दिया गया था.

नियामक की भूमिका भी उतनी ही ढीली साबित हुई. डीजीसीए ने बैठकें जरूर कीं, प्रगति की समीक्षा भी की पर भरोसा एअरलाइंस के दावों पर ही किया. इंडिगो भी सिस्टम को लगातार आश्वस्त करता रहा, आखिर कैसे? नियामक का काम उदार होना नहीं, लगातार निगरानी रखना है. अगर वह पक्का करता कि कंपनी नए थकान-आधारित वर्क प्रोटोकॉल के मुताबिक गंभीरता से काम कर रही है तो पूरा ढांचा यूं नहीं चरमराता.

इस संकट से बड़ा सवाल फिर सामने है: एक दबदबे वाली एअरलाइन को कैसे नियंत्रित करें, बिना पूरे सेक्टर को हिलाए? नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू कहते हैं कि भारत में पांच और एअरलाइनों की जगह है पर यह तभी संभव है जब हम पहले उन दो समस्याओं को हल करें जो आज एअरलाइनों को कमजोर कर रही हैं: बेहद कड़े नियम और भारी टैक्स. भारत में एअरलाइंस के 30-40 फीसद संचालन खर्च टैक्स की वजह से है. अमेरिका में यह औसत 25 फीसद है.

मजबूत पकड़ के चलते इंडिगो को शायद लगा कि रेगुलेटर उसके दबाव में आ जाएंगे और ढील देते रहेंगे. लेकिन उसकी सफलता कुशलता पर खड़ी थी. अब उसे ज्यादा जोखिम लेकर उड़ने के बजाय सुरक्षा को मुनाफे से ऊपर रखना होगा और फिर खड़ा होना होगा. भारत अपनी इकलौती सफल एविएशन उद्योग की कहानी को ढहते देखने का जोखिम नहीं उठा सकता.

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