पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले संसद में 'वंदे मातरम्' पर बहस के क्या मायने हैं?

राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में बहस और बंगाल के सांस्कृतिक प्रतीकों को नए ढंग से पेश करने का प्रयास, अगले साल के चुनावों से पहले प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने की एक रणनीति है

8 दिसंबर को लोकसभा में 'वंदे मातरम्' पर चर्चा के दौरान पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 दिसंबर को संसद में न तो किसी बिल को पेश करने के लिए उठे और न ही विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए, बल्कि वे एक ऐसे गीत को सम्मान देने उठे, जिसने उन्हीं के शब्दों में ''भारत को उसकी आत्मा दी.''

यह 'वंदे मातरम्' के 150 साल पूरे होने का दिन था. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का भारत-स्तुति गीत, जिसे 1950 में भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया था. लेकिन लोकसभा में उस सुबह जो हुआ, वह सिर्फ एक स्मरण नहीं था.

यह इतिहास और संस्कृति को मिलाकर रचा गया एक व्यवस्थित प्रदर्शन था, जिसमें चुनावी संकेत साफ झलक रहे थे. यह जान-बूझकर किया गया था. मोदी एक घंटे से ज्यादा बोले, विदेश नीति या अर्थव्यवस्था पर हाल के किसी भाषण से भी देर तक. उन्होंने कहा, ''जिन लोगों ने मुस्लिम लीग के आगे झुककर वंदे मातरम् को काटकर छोटा किया, उन्होंने ही विभाजन के बीज बोए.''

वे कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 1937 के फैसले की ओर इशारा कर रहे थे, जिसमें आधिकारिक इस्तेमाल को पहले दो अंतरों तक सीमित किया गया था. ''मोहम्मद अली जिन्ना ने 1937 में लखनऊ में 'वंदे मातरम्' के खिलाफ नारे लगाए. उस वक्त के कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने अपनी कुर्सी खतरे में देखी और मुस्लिम लीग की बातों की निंदा करने और वंदे मातरम् के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने के बजाए उन्होंने खुद वंदे मातरम् की जांच शुरू कर दी.''

राजनैतिक जानकारों का मानना है कि यह संदेश सीधे 2026 के अप्रैल-मई में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव पर निशाना साधता है. खासतौर पर भद्रलोक—कोलकाता, हावड़ा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया, हुगली, बर्धमान और कुछ क्षेत्रों में फैले उस शिक्षित, सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली वर्ग की सोच और कल्पना में जगह बनाने की कोशिश दिखाई देती है. विश्लेषकों का अनुमान है कि इनका प्रभाव बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से करीब 80-100 तक फैला है, जिसका मतलब है कि राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से करीब 15-18 सीटों पर उनका काफी असर पड़ता है.

भाजपा की बंगाल हकीकत
पार्टी के अंदर के लोग भी मानते हैं कि भाजपा का बंगाल प्रोजेक्ट कई परतों वाला और लंबी दौड़ वाला है. पार्टी 2021 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नहीं हटा पाई. भाजपा 77 सीटों पर रुक गई और उसे 38.15 फीसद वोट मिले, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 48.02 फीसद वोट लेकर 214 सीटों के साथ सत्ता में लौट आई. भाजपा की सबसे बड़ी छलांग 2019 के लोकसभा चुनाव में दिखी थी, जब उसे 40.64 फीसद वोट और 18 सीटें मिली थीं. लेकिन 2024 में यह गिरकर 39.08 फीसद रह गया और सीटें घटकर 12 रह गईं.

पार्टी की सबसे बड़ी मुश्किल मुस्लिम बहुल जिलों, मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में है, जहां आबादी का 50 फीसद से ज्यादा मुस्लिम है. सात और जिलों दक्षिण और उत्तर 24 परगना, नदिया, कूचबिहार, दक्षिण दिनाजपुर, हावड़ा और बीरभूम में मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसद के बीच है. ये 10 जिले मिलकर 166 विधानसभा सीटें बनाते हैं, जिनमें से टीएमसी ने 2021 में 130 सीटें जीती थीं. रिवर्स पोलराइजेशन की कोशिशों के बावजूद, मुस्लिम वोट हालिया चुनावों में टीएमसी के साथ बने रहे. ऐसे माहौल में, बंगाल के प्रतीकों—बंकिम, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस—का जिक्र भाजपा की सांस्कृतिक रणनीति का मुख्य हिस्सा बन गया है.

बंकिम ने 'वंदे मातरम्' 1875 में लिखा और 1882 में इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में उस दौर में छापा जब देश में राष्ट्रवादी माहौल तीव्र हो रहा था. इसकी पंक्तियां— ''सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्''—मातृभूमि को एक पवित्र शक्ति के रूप में पेश करती हैं. 1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान यह गीत विरोध का प्रतीक बना. लेकिन 1930 के दशक में इसके दुर्गा स्वरूप की कल्पना पर कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई. मुस्लिम लीग ने इसे बहिष्कारी बताया. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व और महात्मा गांधी के समर्थन से कांग्रेस ने 1937 में इसके आधिकारिक उपयोग को सिर्फ पहले दो अंतरों तक सीमित कर दिया. गांधी ने हरिजन में लिखा, ''यह सुंदर गीत है, पर इसकी सभी पंक्तियां हर भारतीय को पसंद आएं, यह जरूरी नहीं. एकता के लिए संयम जरूरी है.'' मोदी के लिए यह संयम ''विश्वासघात'' था. संसद में उन्होंने कहा, ''जिन्होंने वंदे मातरम् काटा, उन्होंने भारत की आत्मा काटी.'' यह बयान भाजपा की लंबे समय से चली आ रही 'तुष्टीकरण की राजनीति' की आलोचना से सीधा जुड़ता है.

मोदी का संदेश राष्ट्रीय स्तर पर भी था. हिंदी बेल्ट में 'वंदे मातरम्' सांस्कृतिक एकता और सभ्यतागत गर्व का प्रतीक माना जाता है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां भाजपा के आंतरिक डेटा के मुताबिक 'राष्ट्रीय गर्व' वाले मुद्दे आर्थिक मुद्दों से करीब 20 फीसद ज्यादा असर डालते हैं, वहां बंकिम की इस छवि से पार्टी की वैचारिक लाइन और मजबूत होती है. आनंदमठ का कुछ हद तक कथानक असम की पृष्ठभूमि पर रचा गया है, ऐसे में भाजपा बंकिम की विरासत को असमी अस्मिता से जोड़ने की कोशिश कर रही है. भाजपा के लिए ये भावनाएं उसके विकसित भारत 2047 नैरेटिव की नींव बनाती हैं. 'वंदे मातरम्' उसका साउंडट्रैक तैयार करता है.

'वंदे मातरम्' पर बहस आरएसएस के उस बड़े प्रोजेक्ट से भी जुड़ी है, जिसे वह ''मस्तिष्क का उपनिवेशमुक्तीकरण'' कहता है, यानी राष्ट्रवाद के उन पहलुओं को आगे लाना, जो उसके अनुसार मार्क्सवादी इतिहासकारों ने या तो दबा दिया या नजरअंदाज किया.

विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस ने सरकार के नैरेटिव को चुनौती देते हुए कहा कि गांधी और नेहरू का समझौता किसी तरह का झुकाव नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश था. पार्टी सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने तंज किया, ''हम यहां दो वजहों से हैं. पहली, बंगाल चुनाव करीब हैं, इसलिए प्रधानमंत्री अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं.'' 9 दिसंबर को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी जोड़ा, ''सरकार गाने गा रही है, लेकिन किसान अपनी फसल बेच नहीं पा रहे.''

लोकसभा में सपा के अध्यक्ष और कन्नौज के सांसद अखिलेश यादव बोले, ''आज, बांटने वाली ताकतें 'वंदे मातरम्' का इस्तेमाल समाज में दरार पैदा करने के लिए कर रही हैं.'' नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा रूहुल्लाह मेहदी ने कहा, ''हमने आजादी बाहरी ताकतों से छीनकर पाई थी; अगर जरूरत पड़ी, तो अपने संवैधानिक हकों के लिए देश के भीतर भी लड़ेंगे.'' टीएमसी ने सांस्कृतिक जवाब दिया. महुआ मोइत्रा ने कहा, ''आप बंगाल की आत्मा का राष्ट्रीयकरण नहीं कर सकते.''

लेकिन भाजपा के लिए मुद्दा यही है, बंगाल की क्षेत्रीय विशिष्टता को एक बड़े राष्ट्रवादी नैरेटिव में पिरोना. भाजपा के एक वरिष्ठ रणनीतिकार कहते हैं, ''विकास उम्मीद के जरिए एकता लाता है, संस्कृति पहचान के जरिए. हमें दोनों की जरूरत है.'' विपक्ष के लिए चुनौती वही पुरानी है—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मुकाबला कैसे करें, बिना यह दिखे कि वे संस्कृति को ही नकार रहे हैं?

जंग का नया मैदान
एक ओर भाजपा अपनी सांस्कृतिक दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं विपक्ष सबको एकसाथ ला उसका जवाब दे रहा है और उस पर ध्यान भटकाने का आरोप लगा रहा है

> मोदी ने 1937 में गीत के अंतरों को सीमित करने के कांग्रेस के फैसले को ऐतिहासिक कमजोरी के तौर पर पेश किया

> यह संदेश बंगाल के भद्रलोक को लक्षित था ताकि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सांस्कृतिक और चुनावी माहौल बदला जा सके

> कांग्रेस ने 1937 के फैसले को कमजोरी नहीं बल्कि समावेशी राष्ट्र-निर्माण बताया और कहा कि गांधी-नेहरू ने एकता बचाने के लिए ऐसा किया

> विपक्ष ने मोदी पर आरोप लगाया कि वे इस बहस का इस्तेमाल 2026 के बंगाल चुनाव के लिए कर रहे हैं और इसके चलते आर्थिक संकट और किसानों की समस्याओं से ध्यान हटाया जा रहा है.

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