देश में फ्रेंचाइजी लीगों के आने से गोल्फ, वॉलीबॉल जैसे खेल कैसे बदल रहे हैं?

गोल्फ, वॉलीबॉल, आर्म रेस्लिंग जैसे खेल अब फ्रेंचाइजी आधारित लीग में आकर न सिर्फ भारतीय खिलाड़ियों को हुनर सुधारने में मदद दे रहे, बल्कि पूरी तरह खेलों का ईकोसिस्टम बदल रहे हैं

26 अक्तूबर को प्राइम वॉलीबॉल लीग के फाइनल का एक दृश्य

यह ज्यादा पुरानी बात नहीं, जब खेल चैनलों पर सिर्फ क्रिकेट का रंग चढ़ा होता था. अगर टीम इंडिया की किसी सीरीज का लाइव प्रसारण नहीं हो रहा होता, तब भी भारत की यादगार जीतों या कहीं का दौरा कर रहे दूसरे देशों के मैच बार-बार दिखाए जाते.

फिर दो महीने चलने वाला इंडियन प्रीमियर लीग और उसके रीप्ले दिखाए जाने लगे. मगर वक्त कितनी तेजी से बदलता है! क्रिकेट के भरोसे रहे प्रसारकों को अचानक कई सारे विकल्प मिल गए, जब तरह-तरह के खेलों को बेहद प्रतिस्पर्धी लीग की साज-सज्जा और धूमधाम में पेश करने के लिए खेल संघों ने कंपनियों, निजी निवेशकों और यहां तक कि बॉलीवुड के सितारों से हाथ मिला लिए.

बीते कुछ साल में भारत ने कबड्डी, हॉकी और फुटबॉल की लोकप्रिय लीग के अलावा बैडमिंटन, टेबल टेनिस, खो-खो और वॉलीबॉल की नई लीग उभरती देखीं. इस साल तीरअंदाजी और पिकलबॉल की लीग लॉन्च हुईं, तो साथ ही गोल्फ और निशानेबाजी की लीग का ऐलान भी हो गया. इनकी बदौलत न सिर्फ दर्शकों को तरह-तरह के खेलों का मजा और घरेलू टीमों को सपोर्ट करने का रोमांच मिल रहा है, खेलों के बेहतर ईकोसिस्टम भी विकसित हो रहे हैं.

हाल में हुई प्राइम वॉलीबॉल लीग (पीवीबी) को ही लीजिए. यह खेल मार्केटिंग, मनोरंजन और ब्रांड मैनेजमेंट कंपनी बेसलाइन वेंचर्स के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर तुहिन मिश्र के दिमाग की उपज है, जो पी.वी. सिंधु और स्मृति मंधाना सरीखी खिलाड़ियों की नुमाइंदगी करती है. पीवीबी ने फैंस के आधार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े टीम खेलों में से एक को भारत में बढ़ावा दिया. वे कहते हैं, ''(भारत में) वॉलीबॉल को शहरों और गांवों दोनों में पसंद किया जाता है.

इसे खेलना महंगा नहीं है और यह स्क्रीन पर अच्छा दिखाई देता है.'' चौथे संस्करण में 10 टीमों, अमेरिका, ब्राजील, ईरान और सर्बिया सरीखे वॉलीबॉल से समृद्ध देशों के 24 विदेशी खिलाड़ियों, अमेरिका के ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप के पदक विजेता डेविड ली सरीखे कोच, और 14 प्रायोजकों तथा टीम मालिकों के साथ पीवीबी ने दिखा दिया कि लीग को अपने बूते बनाए रखने से खेल को कितना फायदा होता है.

नतीजा साफ और जाहिर है. 2019 में लीग के शुरू होने के बाद भारतीय पुरुष टीम की विश्व रैंकिंग टॉप 50 में पहुंच गई. भारत अपने से ऊंची रैंक वाली टीमों—दक्षिण कोरिया और चीनी ताइपे—को हराकर 40 साल में पहली बार 2022 के एशियाई खेलों के क्वार्टर फाइनल में पहुंचा. कई लोगों को लगता है कि इसका श्रेय पीवीबी में खेल की गुणवत्ता को दिया जा सकता है.

इतनी ही बड़ी फतह 2024 पीवीबी की विजेता टीम कैलीकट हीरोज का सीएवीए (सेंट्रल एशियन वॉलीबॉल एसोशिएशन) क्लब चैंपियनशिप जीतना था. मिश्र का सपना भारत को ओलंपिक में पहुंचते देखना है. वे कहते हैं, ''मौजूदा रोडमैप के साथ अगर हम सही काम करें और हमें समर्थन मिले, तो  2032 के खेलों के लिए हमारे क्वालिफाइ करने की जबरदस्त संभावना है.''

13 अक्तूबर को आर्चरी प्रीमियर लीग के फाइनल में एक तीरअंदाज

मजबूत हाथ, सभी का साथ
अगर पीवीबी के पास टीम मालिक के तौर पर अभिनेता विजय देवरकोंडा और के.एल. राहुल और मुरीद के तौर पर बैडमिंटन खिलाड़ी सिंधु और सात्विकसाइराज रैंकीरेड्डी हैं, तो 2023 में शुरू हुई आर्म रेस्लिंग की प्रो पंजा लीग के पास सहसंस्थापक परवीन डबास हैं. डबास ने कॉलेज कैंटीन और धीमा जीवन जीने वाले मोहल्लों के इस 'शगल' को संजीदा खेल में बदलने को मिशन बना लिया. वे कहते हैं, ''यह खासा तकनीक आधारित खेल है. किसी को हराने का एहसास अलग है...आप एक खास स्वैग के साथ बाहर निकलते हैं. इसलिए लोग इससे जुड़ते हैं.'' वे यह भी कहते हैं कि यह लीग ''आर्म रेस्लिंग को आगे बढ़ाने के लिए एक आंदोलन'' है और इसका मकसद इसके कद्रदानों के विशेष समुदाय का निर्माण करना है.

डबास को गर्व है कि यह लीग सबको साथ लेकर चल रही है. महिलाएं इसमें भाग लेती हैं और दिव्यांगों के लिए भी इसमें अलग श्रेणी है. इसका असल आकर्षण खिलाड़ियों की पृष्ठभूमि में है. फिटनेस ट्रेनर सरीखे आम लोगों के अलावा इसमें अलग-अलग क्षेत्रों के एथलीट हैं—फैक्ट्री वर्कर, टीचर, रिक्शाचालक, चार्टर्ड अकाउंटेंट और यहां तक कि एक गृहिणी फरहीन देहलवी भी, जो खेल में अपनी महारत का श्रेय घर के कामकाज को देती हैं. इसने मिजोरम के डेनिक लालरुअट्टलुआंगा वांगछिया सरीखे लोगों को स्टार बना दिया, जिन्होंने पंजा लीग के बाद विश्व आर्म रेस्लिंग कप में रजत पदक जीता और बाद में एक मिजो फिल्म में अदाकारी भी की. डबास कहते हैं, ''हमने आर्म रेस्लरों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना, इन्फ्लुएंसर बनना और पैसे कमाना सिखाया.'' वे ग्वालियर के सचिन गोयल का जिक्र करते हैं, जो 'बाइसेप किंग' के नाम से जाने जाते हैं और जिनके 25 लाख से ज्यादा फॉलोवर हैं. डबास को भविष्य में और ज्यादा टीमों के जुड़ने और लीग को भारत से बाहर ले जाए जाने की उम्मीद है.

सबसे अहम बात यह कि खेलों की लीग यह मापने का जरिया हैं कि भारत के शीर्ष पायदान के एथलीट अंतराष्ट्रीय एथलीटों के मुकाबले कहां खड़े हैं. अक्तूबर में नई दिल्ली में हुई आर्चरी प्रीमियर लीग में यही हुआ. एपीएल में शीर्ष पायदान के पुरुष और महिला कंपाउंड तीरअंदाज आए, तो साथ ही रिकर्व ओलंपिक चैंपियन मेटे गाजोज और पेरिस ओलंपिक के रजत पदक विजेता ब्रेडी एलिसन भी. इस प्राचीन खेल को प्रसारण के ज्यादा अनुकूल बनाने के लिए मुकाबले जगमगाती रोशनियों में खेले गए और लक्ष्य पर निशाना लगाने का समय 20 से घटाकर 15 सेकंड कर दिया गया, जिससे रोमांच बढ़ गया. आर्चरी प्रीमियर लीग के अध्यक्ष अनिल कामिनेनी कहते हैं, ''बस ओलंपिक को छोड़कर हमने तमाम विश्व प्रतिस्पर्धाएं जीतीं. हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि हमें क्या करना चाहिए जो हमने नहीं किया.'' अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ प्रशिक्षण लेने, बातचीत करने और उनसे मुकाबला करने का फायदा भारतीय तीरअंदाजों को बेशक मिला ही होगा.

यह विदेशी समकक्षों से सीखने का मौका ही है जो अल्टीमेट टेबल टेनिस लीग को भारतीय टीम की पैडलर श्रीजा अकुला के लिए साल की ऐसी घटना बना देता है जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता है. 2024 में इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ''हम विचार साझा करते हैं और देखते हैं कि वे ट्रेनिंग में क्या करते हैं. हमें उनका खेल पता चलता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में उनके सामने खेलते वक्त मदद मिलती है.''

2023 में अल्टीमेट खो-खो मैच में एक जबरदस्त दांव

सीधा निशाना
दरअसल, तीरअंदाजी अकेला खेल नहीं है जिसे दर्शकों के अनुकूल बनाया गया. गोल्फ भी लीग के प्रारूप के साथ प्रयोग कर रहा है. इंडियन गोल्फ प्रीमियर लीग (आइजीपीएल) के सीईओ उत्तम सिंह मुंडी टीम खेलों में राइडर कप सरीखा माहौल बनाने की उम्मीद कर रहे हैं, जहां गोल्फ के मुरीद टीमों की पीठ थपथपा सकें. मुंडी के लिए ज्यादा बड़ा लक्ष्य इस महंगे खेल का ईकोसिस्टम विकसित करना है. वे कहते हैं, ''हम जमीनी विकास और स्कूलों के साथ काम करने से लेकर ड्राइविंग रेंज बनाने और उन्हें शीर्ष अकादमियों में बदलने तक हर पहलू से जुड़े हैं.'' शिव कपूर, ज्योति रंधावा और जीव मिल्खा सिंह सरीखे प्रतिष्ठित नामों के अलावा आइजीएल कई नौजवानों को भी हरे-भरे मैदानों पर उतारेगी.

भारत में निशानेबाजी की जिम्मेदारी संभालने वाली संस्था नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआइ) के लिए लीग शुरू करने की प्रेरणा कुछ अलग है क्योंकि भारत में पहले ही हुनरमंद सीनियर और प्रतिभावान जूनियर खिलाड़ियों की बहुतायत है. एनआरएआइ के अध्यक्ष कलिकेश नारायण सिंह देव कहते हैं, ''हमारे पास बहुत सारे प्रतिभावान निशानेबाज हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अनुभव नहीं मिला है. लीग से हम देख पाएंगे कि उनमें तकनीकी क्षमता और मानसिक लगन है या नहीं. हम इससे अगले 12 साल के लिए प्रतिभाओं का जखीरा मिलने की उम्मीद कर रहे हैं.''

2026 में होने वाली इस लीग से भारत ऊंचे पायदान की अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं को आकर्षित करके निशानेबाजी में अपने रौब-दाब का प्रदर्शन कर पाएगा. अभी तक 70 अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजों ने आने की प्रतिबद्धता दिखाई है और 500 से ज्यादा घरेलू आवेदन मिले हैं. लीग का मकसद दर्शक को लगभग निशानेबाज की जगह खड़ा करना है. साथ ही वे सांस मापने वाले बायो फीडबैक मॉनिटर और गोली की सटीक लकीर दिखाने वाले कैमरे लगाकर निशानेबाजी के नाजुक पहलुओं को कैद करना भी चाहते हैं.

पिकलबॉल भी लीग की राह पर चल पड़ी है. यह वही खेल है जो टेनिस के अजूबे सहोदर के तौर पर शुरू हुआ और देखते ही देखते फिटनेस और लाइफस्टाइल के खेल के तौर पर दुनिया भर में छा गया. हालांकि अभी यह प्रसारण या स्ट्रीमिंग नेटवर्क पर नहीं आया है, लेकिन महानगरों में पिकलबॉल की बढ़ती लोकप्रियता से इनकार नहीं किया जा सकता. दिसंबर की 7 तारीख को संपन्न हुई इंडियन पिकलबॉल लीग के अध्यक्ष समीर पाठक कहते हैं, ''हम उम्मीद करते हैं कि और ज्यादा लोग पिकलबॉल खेलेंगे, और जल्द ही यह देश का सबसे बड़ा रैकेट खेल होगा.''

खेल के महान हुनर का प्रदर्शन करने वाली खेल लीग रोमांचकारी तो हैं लेकिन वे जीत की गारंटी नहीं देतीं. प्रो कबड्डी लीग सरीखी हर कामयाबी की कहानी के साथ कुश्ती और बैडमिंटन लीग भी हैं जो परवान नहीं चढ़ सकीं. हालांकि इससे डरकर हितधारकों ने खेल में निवेश करना बंद नहीं किया है. क्रिकेट की जुगाली करने वाली जनता को दूसरे खेलों का लुत्फ देना फिलहाल अच्छी कोशिश है. इतना ही नहीं, जब भारत 2030 के कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी करने जा रहा है और 2036 के ओलंपिक की मेजबानी हासिल करने की कोशिश कर रहा है, इन तमाम लीग के आने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था.

उभर रहीं नित-नई लीग
आखिरकार क्रिकेट का हर जगह जमा वर्चस्व टूटने की राह पर. दर्शक इन रोमांचक खेल आयोजनों पर नजर बनाए रखना चाहेंगे- 

द इंडियन गोल्फ प्रीमियर लीग
(जनवरी-फरवरी 2026)*
अपने पहले संस्करण में इस आयोजन का मकसद पुरुषों, महिलाओं और जमीनी टैलेंट को प्रतिस्पर्धा के एक ही मंच पर लाना है. भारतीय गोल्फ के लिए दर्शक बढ़ाने के अलावा इसका मकसद आने वाले वर्षों में 10 लाख से ज्यादा स्कूल और कॉलेज छात्रों को ट्रेनिंग देना है.

इंडियन पिकलबॉल लीग
(1-7 दिसंबर) नई दिल्ली
अमेरिका में टेनिस को कड़ी टक्कर देते हुए तेजी से बढ़ता यह फिटनेस और लाइफस्टाइल स्पोर्ट आइपीबीएल के साथ भारत में बड़े पर्दे और स्ट्रीमिंग पर डेब्यू कर रहा है. मिहिका यादव और अमन पटेल जैसे स्टार पैडलर और इंटरनेशनल

इंडियन पिकलबॉल लीग

इंडियन शूटिंग लीग
(2026 की पहली छमाही)*
शूटर्स को देखकर भले आपको वैसे जज्बात न उभरते हों लेकिन शूटिंग प्रतियोगिता देखना रोंगटे खड़े करने वाला अनुभव होता है. नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया से उम्मीद है कि वह न सिर्फ भारत के सबसे अच्छे बल्कि टॉप रैंक वाले इंटरनेशनल प्लेयर्स को भी इकट्ठा करेगा, जिससे यह इस खेल में अपनी तरह की पहली लीग होगी.

ग्लोबल चेस लीग
(13-24 दिसंबर) मुंबई
इस टीम-आधारित, जेंडर-समावेशी शतरंज लीग की लाइन-अप में कई दिग्गज शामिल हैं: विश्वनाथन आनंद और कोनेरू हंपी से लेकर विश्व चैंपियन डी. गुकेश और 11 वर्षीय प्रतिभाशाली खिलाड़ी फॉस्टिनो ओरो तक. ओरो 'जीसीएल कंटेंडर्स' श्रेणी का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें ग्रैंडमास्टर्स और इंडिविजुअल मास्टर्स के साथ-साथ शौकिया खिलाड़ी भी शामिल होंगे.

ग्लोबल चेस लीग

टैलेंट इस हफ्ते भर चलने वाले इवेंट का हिस्सा होंगे, जिसमें छह टीमें एकल और डबल मैच खेलेंगी. भारतीय मेट्रो शहरों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए आजकल रिहाइशी सोसाइटीज में कोर्ट बनाए जा रहे हैं और टेनिस खिलाड़ी इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं, आइपीबीएल जबरदस्त हिट हो सकता है.

बेसलाइन वेंचर्स के तुहिन मिश्र के मुताबिक, प्राइम वॉलीबॉल लीग में खिलाड़ियों को सीखने का मौका मिलता है और खेल का एक ईकोसिस्टम तैयार होता है—रेफरी, लाइनमैन, ट्रेनर निकलकर आते हैं. अपनी पहचान बनाना भी जरूरी है.

नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कलिकेश नारायण सिंह देव के मुताबिक, हमारे पास बेहद प्रतिभाशाली शूटर हैं लेकिन उन्हें इंटरनेशनल लेवल पर ज्यादा मौका नहीं मिल पाया है. यह लीग उन्हें इंटरनेशनल लीग में हिस्सा लेने का मौका देती है.
 

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