मांग बढ़ रही है फिर भी भारतीय बाजार में बेचैनी क्यों?
भारतीय बाजार में खपत को लेकर बदले रुझानों के चलते GDP में आई तेजी के बरकरार रहने की संभावना है. लेकिन, महंगाई और अमेरिकी टैरिफ के कारण स्थितियां चिंता पैदा करने वाली है

वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में अपेक्षा से अधिक वृद्धि और खपत के पैटर्न में सुधार ने उम्मीद जगाई है कि इस वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2024-25 में 6.5 फीसद की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ेगी. लेकिन सवाल है कि क्या यह बढ़त अगली कुछ तिमाहियों तक बरकरार रह सकती है? इससे भी जरूरी बात यह है कि क्या इससे निजी क्षेत्र में निवेश को और ज्यादा बढ़ावा मिलेगा और नतीजतन ज्यादा नौकरियां सृजित होंगी?
दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 8.2 फीसद रही, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 की इसी अवधि में यह 5.6 फीसद थी और मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 फीसद रही थी. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने इंडिया टुडे को बताया, ''अभी खपत की स्थिति काफी मजबूत हुई है. इस साल हम खपत में बढ़ोतरी देख रहे हैं, निवेश में उतनी वृद्धि नहीं हुई है. खपत ही वह चीज थी जो कोरोना महामारी से सबसे अंत में उबरकर बाहर आई.''
त्योहारी मौसम नए जीडीपी आंकड़ों के दायरे से आमतौर पर बाहर ही रहा है. इसका असर सिर्फ तीसरी तिमाही में दिखेगा. इससे अगली तिमाही में वृद्धि में और तेजी आएगी. हालांकि, इस वृद्धि में दो चीजें ग्रहण लगा सकती हैं. इनमें एक है महंगाई, खासकर खाने-पीने की चीजों के दामों में होने वाली वृद्धि, जो अगली दो तिमाहियों में और बढ़ने के आसार हैं. इसके अलावा, दूसरी छमाही में कम बेस का फायदा नहीं मिलेगा. भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ एक और रुकावट है, और अगर भारत का अमेरिका के साथ व्यापार समझौता नहीं हो पाया तो यह चुनौती बरकरार ही रहेगी.
त्योहारी मौसम से ठीक पहले केंद्र ने जुलाई 2017 में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद से सबसे बड़ा सुधार किया. 'अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों' की घोषणा सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन के दौरान की थी लेकिन नीतिगत घोषणा 4 सितंबर को हुई और बदली दरें 22 सितंबर से लागू की गईं.
त्योहारी उत्सव
इसके साथ, त्योहारी मौसम जिसमें सितंबर के कुछ दिन और दशहरे से दीपावली तक पूरा अक्तूबर शामिल था, मांग में वृद्धि दिखने की उम्मीद रही. और ऐसा हुआ भी. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोटिव डीलर्स एसोसिएशन (एफएडीए) ने 42 दिन के त्योहारी सीजन में ऑटो बिक्री का जो आंकड़ा जारी किया, उससे पता चला कि यात्री गाड़ियों की बिक्री में वृद्धि 2024 के इसी समय के मुकाबले 23 फीसद रही. दोपहिया वाहनों के मामले में यह आंकड़ा 22 फीसद और वाणिज्यिक वाहनों में 15 फीसद रहा.
मीडिया रिपोर्ट में भी कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग तेजी से बढ़ने की बात सामने आई है. काउंटरपॉइंट रिसर्च के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक कहते हैं कि त्योहारी मौसम में स्मार्टफोन की बिक्री में साल दर साल वृद्धि मात्रा में 10 फीसद और मूल्य के लिहाज से 18 फीसद रही. यह 2020 के त्योहारी मौसम के बाद सबसे ज्यादा है.
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च (इंड-रा) के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत कहते हैं कि तीसरी तिमाही के नतीजे तो और खुशी देने वाले होने चाहिए क्योंकि ''त्योहारी मौसम का असर दूसरी तिमाही के आखिरी हफ्ते में ही नजर आ गया. चूंकि दीवाली 20 अक्तूबर को थी, इसलिए मांग में सबसे ज्यादा वृद्धि उसी महीने में होनी चाहिए. अक्तूबर में सभी एफएमसीजी कैटेगरी में जबरदस्त उछाल देखा गया था.'' उन्होंने यह भी कहा कि वेतन में बढ़ोतरी भी एक वजह रही है.
मांग में वृद्धि रहेगी बरकरार
क्या मांग में वृद्धि की यह स्थिति बरकरार रह सकती है? इस बारे में अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह मुमकिन है लेकिन शायद इतनी तेजी से नहीं क्योंकि इस बार त्योहारी मौसम कई मायनों में अलग था. वैसे जीएसटी और आयकर सीमा में बदलाव का असर सकारात्मक बना रहेगा, लेकिन अमेरिकी टैरिफ खेल बिगाड़ सकते हैं. वहीं, महंगाई भी बढ़ सकती है.
दूसरी छमाही में जीडीपी धीमी गति से ही बढ़ेगी. क्रिसिल 6.7 फीसद वृद्धि का अनुमान लगा रहा है, जो इस साल अब तक की कुल वृद्धि से धीमी है, लेकिन फिर भी अच्छी है. जोशी कहते हैं, ''निजी निवेश जोर पकड़ रहा है लेकिन शुरुआत में कुछ चूक हो चुकी हैं.'' हालिया श्रम सुधार ये भी दर्शाते हैं कि सरकार माहौल को निवेशकों के और ज्यादा अनुकूल बनाने का इरादा रखती है. लेकिन अमेरिकी टैरिफ के असर को लेकर चिंता बनी हुई है. जोशी कहते हैं, ''अगर कोई सौदा न हुआ तो वे मुश्किलें खड़ी करते रहेंगे.''
इसका मतलब है कि केंद्र को ऐसी नीतियों को बढ़ावा देना होगा, जिनसे निवेश फिर से बढ़े. लेकिन इसमें अलग ही तरह की चुनौतियां हैं. भारत की अग्रणी प्रोसेस और एनर्जी एफिशिएंसी कंपनी फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरपर्सन नौशाद फोर्ब्स कहते हैं, ''क्षमता उपयोग के लिहाज से निवेश चक्र शुरू करना सबसे बेहतर होता है. आदर्श स्थिति में अगर आप 70 फीसद से कम क्षमता पर चल रहे हैं, तो आप इस पर और निवेश नहीं करते हैं. और 80 फीसद से ऊपर होने पर आप निश्चित तौर पर ऐसा करेंगे.'' उनके मुताबिक, निवेश को बढ़ाना सबसे ज्यादा इस पर निर्भर करता है कि व्यवसायी भविष्य को लेकर कितना आश्वस्त हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी मांग
इंड-रा के पंत को लगता है कि ग्रामीण मांग से खपत को स्थिर बनाए रखा जा सकता है. वे कहते हैं, ''यह ध्यान रखना जरूरी है कि कृषि जीवीए (सकल मूल्य वर्धित) वृद्धि हालांकि दूसरी तिमाही में 3.5 फीसद रही थी, जो पिछली पांच तिमाहियों में सबसे कम थी, लेकन कमोबेश स्थिर रही है, जो ग्रामीण मांग बढ़ने का संकेत है. भारतीय मौसम विभाग का सर्दियों में अच्छी बारिश का डेटा भी उम्मीदें जगाता है क्योंकि इससे रबी की बंपर फसल का अनुमान है. यह स्थिति इस वित्त वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में स्थिरता को लेकर सकारात्मक संकेत देती है और अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकारात्मक तस्वीर बने रहने के आसार हैं.''
इसके अलावा, जीएसटी को तर्कसंगत बनाए जाने की वजह से महंगाई आरबीआइ के निर्धारित लक्ष्य 4 फीसद से कम रहेगी (कम से कम वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही तक). बहरहाल, बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भारत परस्पर टैरिफ पर अमेरिका के साथ कितनी जल्द सौदा कर पाता है. फिलहाल, अर्थव्यवस्था की रफ्तार थामने वाले कई कारक सक्रिय हैं, ठीक वैसे ही जैसे उसके उछाल भरने के कई फैक्टर मौजूद हैं.
आगे की राह...
> आयकर में छूट और जीएसटी के फायदे मांग बढ़ा सकते हैं
> महंगाई, खासकर खाद्यान्न की, जोर पकड़ सकती है
> निजी निवेश बड़े पैमाने पर अब भी आना है
> अमेरिकी टैरिफ निर्यात के रास्ते में रोड़ा डालेंगे
> दुनियाभर में आर्थिक वृद्धि कमजोर पड़ सकती है
मौजूदा जीडीपी आंकड़ों में त्योहारी मौसम की तेजी काफी हद तक नदारद है. यह तीसरी तिमाही के आंकड़ों में ही दिखेगी. इससे जीडीपी के आंकड़े कुछ और बढ़े हुए दिखेंगे.
