प्रधान संपादक की कलम से

इस वक्त दुनिया युद्ध, बढ़ते टैरिफ और बदलते पावर सेंटर की वजह से दो हिस्सों में बंटी हुई है. ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दिल्ली यात्रा से ठीक पहले क्रेमलिन में इंडिया टुडे टीवी की टीम अंजना ओम कश्यप और गीता मोहन को दिया गया इंटरव्यू एक दुर्लभ मौका था.

17 दिसंबर 2025 अंक
17 दिसंबर 2025 अंक

- अरुण पुरी

इस वक्त दुनिया युद्ध, बढ़ते टैरिफ और बदलते पावर सेंटर की वजह से दो हिस्सों में बंटी हुई है. ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दिल्ली यात्रा से ठीक पहले क्रेमलिन में इंडिया टुडे टीवी की टीम—अंजना ओम कश्यप और गीता मोहन—को दिया गया इंटरव्यू एक दुर्लभ मौका था.

यह बताता है कि दुनिया के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले और विवादित नेताओं में से एक भारत, पश्चिमी देशों और उभरती वैश्विक व्यवस्था को कैसे देखते हैं. जिस बात पर मुझे ताज्जुब हुआ वह थी पुतिन की छवि और असल में मिले नेता के बीच का फर्क.

उनकी एक कठोर, बिना मुस्कराहट वाली छवि पेश की जाती है, ऐसे नेता की, जो सत्ता से चिपका हो और सवाल पसंद न करता हो. लेकिन सामने आए तो वे काफी जीवंत, बातूनी और दिलचस्प लगे. उनके चेहरे के भाव, हाथों के इशारे और हल्का-सा ह्यूमर साफ दिख रहा था. उनकी टीम ने कोई रोक-टोक नहीं रखी. जो बातचीत 60 मिनट की होनी थी, वह बढ़कर 100 मिनट तक चली. बाद में उन्होंने हमारी एडिटोरियल टीम के साथ भी अनौपचारिक बातचीत की, मैं खुद उसमें शामिल था.

जब पुतिन मौजूदा दुनिया की बात करते हैं, तो उसमें इतिहास की उनकी समझ झलकती है. भले ही आप उनकी सोच से हमेशा सहमत नहीं होंगे, लेकिन उनके पास बड़ा सोचने की सलाहियत है. उन्होंने भारत-रूस रिश्ते पर बात करते हुए यह नहीं बताया कि दिल्ली की यह यात्रा इतनी देर से क्यों हो रही है. यह उनकी चार साल बाद पहली भारत यात्रा है. और इस बीच दोनों देशों के रिश्ते थोड़ा ठंडे भी पड़े थे. इसके बजाए, पुतिन ने बातचीत की शुरुआत ही सभी जरूरी बातों से की.

क्रेमलिन में राष्ट्रपति पुतिन इंडिया टुडे टीवी की टीम अंजना ओम कश्यप और गीता मोहन से बातचीत करते हुए

उन्होंने ''एकजुटता, दोस्ती और अपनापन’’ की बात की, और साथ ही रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए ''आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइ-टेक डिफेंस और एडवांस्ड न्यूक्लियर रिएक्टर’’ जैसे व्यावहारिक आइडिया भी दिए. उन्होंने अपने मेजबान की खुलकर तारीफ की और कहा, '' प्रधानमंत्री मोदी ऐसे इंसान नहीं हैं जो आसानी से धौंस में आ जाते हैं.’’ फिर उन्होंने रूसी तेल खरीदने पर भारत को दंडित करने की अमेरिका की दोहरी नीति पर कटाक्ष किया.

पुतिन ने कहा, ''अमेरिका आज भी रूस से यूरेनियम खरीदकर अपने न्यूक्लियर प्लांट चलाता है. अगर अमेरिका को हमारा ईंधन खरीदने का हक है, तो भारत को क्यों नहीं?’’ उन्होंने रुपया-रूबल असंतुलन पर कहा कि यह राजनैतिक नहीं, बल्कि आर्थिक मुद्दा है. उन्होंने बताया कि उन्होंने रूसी कारोबारियों को साफ निर्देश दिया है कि भारत से क्या-क्या खरीदा जा सकता है, इसका ठोस हल ढूंढें.

नई विश्व व्यवस्था पर पुतिन जी8 में लौटने की संभावना को बिल्कुल खारिज कर दिया. उन्होंने जी7 की प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठाए, खासकर जब खरीद क्षमता के हिसाब से भारत जैसे देश आज उनसे कहीं ऊपर हैं. पुतिन ने हंसते हुए कहा, ''मैं जी7 क्यों जाऊं? वहां कोई मुझसे बात ही नहीं करता.’’ उनके मुताबिक, असली ताकत ब्रिक्स, एससीओ और बड़े ग्लोबल साउथ जैसे मंचों पर बन रही है.

हालांकि उन्होंने ब्रिक्स मुद्रा को लेकर जल्दबाजी मचाने से मना किया और कहा कि पहले राष्ट्रीय मुद्राओं और इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम को बढ़ाना चाहिए. पुतिन भारत को सिर्फ पुराना साथी नहीं, बल्कि उन नए पावर सेंटरों का मुख्य खिलाड़ी मानते हैं जो वैश्विक व्यापार, फाइनेंस और टेक्नोलॉजी को बदल रहे हैं. वे भारत-चीन तनाव पर बहुत सावधानी से बोले. उन्होंने दोनों को ''हमारे सबसे करीबी दोस्त’’ कहा और यह भी जोड़ा कि रूस कभी इस रिश्ते में दखल नहीं देगा. उन्होंने मोदी और शी जिनपिंग की ''समझदारी’’ की सराहना की, जिन्होंने हाल के तनावों को संभालने की गंभीर कोशिश की है.

प्रधान संपादक अरुण पुरी और कार्यकारी प्रधान संपादक कली पुरी के साथ

बातचीत का माहौल उस वक्त टकराव वाला हो गया जब बात यूक्रेन की जंग पर पहुंची. पुतिन ने लंबी सफाई दी और रूस की कार्रवाई को रूसी बोलने वाले लोगों, उनकी परंपराओं, उनकी भाषा और ऑर्थोडॉक्स चर्च की रक्षा के रूप में पेश किया. वे पश्चिम पर आरोप लगाते हैं कि उसने कीव में तख्तापलट का साथ दिया. उनका दावा है कि रूस ने आठ साल तक मिन्स्क समझौतों के जरिए यूक्रेन से मतभेद सुलझाने की कोशिश की.

उनका कहना है कि ''स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशन’’ जंग शुरू करना नहीं, बल्कि खत्म करना है. पुतिन के मुताबिक, नाटो का पूरब की तरफ फैलाव उन वादों का उल्लंघन है जो मॉस्को से किए गए थे और इससे रूस के लिए असहनीय सुरक्षा खतरा पैदा हुआ. उनका कहना है कि रूस जंग तभी खत्म करेगा जब उसके ''इलाके आजाद कराने’’ और अपने हित सुरक्षित करने के मकसद पूरे होंगे. पुतिन पश्चिम के हाथों धोखा खाए हुए आदमी जैसे लगते हैं. अगर अमेरिका सोचता है कि पाबंदियां रूस को घुटनों पर ला देंगी, तो उसे बड़ा झटका लग सकता है.

मैंने मॉस्को में जो देखा, वह किसी मुसीबत में फंसी अर्थव्यवस्था नहीं थी. आज की ग्लोबल दुनिया में, जहां भी मांग होती है, सामान किसी न किसी रास्ते से पहुंच ही जाता है. दुकानों में विदेशी सामान भरा पड़ा है. कई सेक्टरों में तो पाबंदियां रूस की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद साबित हुई हैं. इससे एक तरह का 'आत्मनिर्भर रूस’ उभर आया है, जहां स्थानीय कंपनियों ने खाली जगहों को भरने के लिए आगे कदम बढ़ाए हैं.

रूस एक बेहद देशभक्त देश माना जाता है. वहां के लोग अपने इतिहास की वजह से बड़ी से बड़ी मुश्किल झेलने के लिए तैयार रहते हैं. यह ऐसा घातक संयोजन है जिसे हल्के में लेना किसी के लिए भी खतरनाक हो सकता है. अक्सर कहा जाता है कि पुतिन का मकसद रूस को पुराने सोवियत संघ जैसा बड़ा बनाना है. लेकिन वे इसे साफ तौर पर नकारते हैं और कहते हैं, ''आज की परिस्थितियों में इसका कोई मतलब नहीं है.’’

अफगानिस्तान और गजा से लेकर एआइ, जेन ज़ी के विरोध और सोवियत संघ के टूटने तक, पुतिन ने पूरी दुनिया की अपनी समझ का खाका पेश किया. यह शिकायतों और महत्वाकांक्षा, इतिहास और कठोर राजनीति का मिश्रण और इस भरोसे पर टिका है कि पश्चिम की पकड़ ढीली पड़ रही है और भारत जैसे देश भविष्य की दिशा तय करेंगे. मैंने रूसी राष्ट्रपति से पूछा कि क्या उन्हें अपने 25 साल के शासन में किसी बात का पछतावा है. इस पर वे कुछ देर सोचते रहे, उनकी नीली आंखें एक बार भी नहीं झपकीं, फिर बोले: ''मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता.’’

शायद वे गलती मानने वाले इंसान नहीं हैं. लेकिन हर बात से यह साफ है कि वे अतीत को बहुत अच्छी तरह समझते हैं, और शायद इसी वजह से भविष्य को अपने मुताबिक ढाल सकते हैं. इंडिया टुडे के लिए यह फख्र की बात है कि पुतिन ने रूस में सत्ता संभालने के बाद सन् 2000 में भारत की किसी पत्रिका को अपना पहला प्रिंट इंटरव्यू हमें दिया. और 25 साल बाद, इतने अहम समय में, उन्होंने किसी निजी टीवी चैनल को अपना पहला लंबा इंटरव्यू फिर हमें दिया.

यह सिर्फ हमारी एडिटोरियल विश्वसनीयता की वजह से नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि पुतिन की नजर में भारत को कितना खास मकाम हासिल है. वे भारत को भरोसेमंद रणनीतिक साथी के रूप में देखते हैं. शायद उन चंद देशों में से एक जिनका मीडिया, उनके मुताबिक, पश्चिमी पूर्वाग्रह के फिल्टर के बिना बातें सुनता है.

आप पुतिन को रणनीतिक जीनियस मानें या खतरनाक तानाशाह, उनके फैसलों का असर दुनिया की व्यवस्था पर बेहद गहरा पड़ता है. भारत, जिसके एक तरफ रूस से दशकों पुराने रिश्ते हैं और दूसरी तरफ पश्चिम से बढ़ती साझेदारी है, उसे इन उथल-पुथल भरे हालात से बहुत समझदारी के साथ पार पाना होगा. खुद पुतिन ने माना है कि मोदी दबाव में झुकने वाले इंसान नहीं हैं. यही स्वतंत्र सोच और स्वतंत्र फैसले भारत की सबसे बड़ी ताकत होंगे.

आप पुतिन से सहमत हों या असहमत, पर दुनिया को देखने का उनका यह खुला और तर्कपूर्ण नजरिया पढ़ना जरूरी है क्योंकि दुनिया को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दूसरा पक्ष दुनिया को कैसे देखता है. एक ऐसी दुनिया में जहां इको-चैंबर और कठोर विचारधाराएं हावी हैं, ऐसे संवाद मायने रखते हैं. यह याद दिलाते हैं कि मुश्किल बातचीत भी चुप्पी से बेहतर है, और सबसे विवादित लोगों को भी सुना जाना चाहिए, ताकि हम यह समझ सकें कि दुनिया किस दिशा में जा रही है.

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