छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की टूटी कमर, सिलसिलेवार समर्पण की क्या है असल वजह?

जोर-जबरदस्ती और मान-मनौव्वल की बदौलत बस्तर में माओवादियों ने रिकॉर्ड संख्या में हथियार डाले. इससे उनका नेतृत्व हिला और उग्रवाद खत्म करने के व्यापक अभियान को बढ़त मिली

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 17 अक्तूबर को सरेंडर करने वाले माओवादी अपने हथियारों के साथ

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर इलाके में एक जिले के एसपी का फोन रात साढ़े ग्यारह बजे बजता है. स्क्रीन पर दिख रहे नंबर को देखते ही उनके चेहरे का एक्सप्रेशन थोड़ा बदल जाता है, जैसे कुछ उम्मीद जगी हो. फोन के दूसरी तरफ से आवाज आती है, ''वो बाहर आने को तैयार है.'' इतना कहकर कॉल काट दिया जाता है.

यहां ''वो'' एक अहम माओवादी है जो अपने करीब 30 साथियों के साथ हथियार डालने को तैयार हुआ है. यह कदम 'पूना मार्गम' (नई राह) नाम के उस स्थानीय पुनर्वास कार्यक्रम के तहत है, जिसका मकसद पुराने माओवादियों को दोबारा समाज की तरफ लाना है. और यह कोई अकेली कॉल नहीं है. बस्तर में इन दिनों बड़े पैमाने पर सरेंडर हो रहे हैं.

सिर्फ इस साल ही 1,513 माओवादियों ने हथियार डाले हैं. यह हथियार डालने और शांति चाहने वाले दोनों के लिए फायदेमंद है. लेकिन माओवादियों को मनाना और इसके आसपास की राजनीति को संभालना कोई आसान काम नहीं.

2024 की शुरुआत में, छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के कुछ महीनों बाद, केंद्र और राज्य सरकारों ने माओवाद से निबटने की अपनी रणनीति फिर से सेट की. माओवाद को कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती कहा था. उसी साल बाद में सरकार ने यह ऐलान किया कि 31 मार्च 2026 तक माओवाद को खत्म करना है. इस फैसले का सीधा असर दिखा.

सुरक्षा बलों ने 'रेड टेरर' के खिलाफ ऑपरेशन तेज कर दिए. बस्तर में 2023 में जहां 69 ऑपरेशन हुए थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 123 हो गई. इन ऑपरेशनों में 2024 में 217 माओवादी मारे गए, जबकि उससे पिछले साल सिर्फ 20 मारे गए थे. इस साल नवंबर के आखिरी हफ्ते तक 95 ऑपरेशन में 234 माओवादी मारे गए. साफ है कि माओवादियों पर दबाव काफी बढ़ गया.

इस साल सुरक्षा बलों ने कई बड़े माओवादी नेताओं को मार गिराया, जिनमें भाकपा (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी बसवराजू और सेंट्रल कमेटी के सदस्य कोरस दादा और राजू दादा शामिल थे. इन मौतों से नेतृत्व का सफाया हो गया और निचले स्तर के कैडर में उलझन फैल गई. इसके बाद भीतर असहमति की आवाजें भी उठने लगीं.

मोर्चे पर मिली कामयाबी साफ दिख रही थी, जिनमें टेक्नोलॉजी से मिलने वाली इंटेलिजेंस, ड्रोन और बेहतर हथियार जैसी चीजों का बड़ा रोल था. लेकिन 31 मार्च की डेडलाइन से छह महीने पहले सुरक्षा एजेंसियों की एक मिड-टर्म समीक्षा ने एक बात साफ कर दी. बंदूक ने माओवाद खत्म करने लायक माहौल तो बना दिया है, पर यह लड़ाई सिर्फ हथियार के दम पर खत्म नहीं होने वाली. इसी वजह से सरेंडर इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन गया. माओवाद प्रभावित एक जिले के एसपी कहते हैं, ''हमने करीब 1,200 ऐक्टिव कैडर और 300 ऐसे कैडर चिन्हित किए जो बेहद दूरदराज इलाकों में हैं. सबको खत्म करना मुमकिन नहीं है. लेकिन मकसद हासिल करने के लिए यह जरूरी था कि उनके नेताओं को मनाकर हथियारों के साथ सरेंडर कराया जाए ताकि उनकी ताकत टूटे.''

समर्पण की रणनीति
सरकार और माओवादियों के बीच कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है. लेकिन अक्तूबर में माओवाद के इतिहास के दो सबसे बड़े सरेंडर हुए. पोलितब्यूरो मेंबर भूपति उर्फ सोनू ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में 60 कैडरों और 54 हथियारों के साथ सरेंडर किया. दो दिन बाद सीसी मेंबर रूपेश उर्फ सतीश—जो दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) के नॉर्थ सब जोनल कमेटी का मुखिया था—ने जगदलपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मौजूदगी में 209 कैडरों और 153 से ज्यादा हथियारों के साथ सरेंडर किया.

बस्तर के आइजी सुंदरराज पी. सिर्फ ऑपरेशन में ही व्यस्त नहीं रहते. 25 नवंबर को उनकी मौजूदगी में नारायणपुर में 28 कैडरों ने सरेंडर किया. अगले दिन वे बीजापुर में थे, जहां 41 कैडरों का सरेंडर कराया गया. 28 नवंबर को 10 माओवादियों ने भी जगदलपुर में हथियार डाल दिए. इनमें दरभा डिवीजन का चैतू दादा भी शामिल था, जिस पर उस हमले में शामिल होने का शक है जिसमें कांग्रेस के बड़े नेता मारे गए थे. 30 नवंबर को दंतेवाड़ा में 37 और कैडरों ने सरेंडर किया.

इतने बड़े पैमाने पर हो रहे सरेंडर कैसे मैनेज किए जा रहे हैं? इसकी शुरुआत उन कैडरों की लिस्ट बनाने से हुई जो बाहर आ सकते थे. इसके बाद आया 'साइलेंट सरेंडर', वे माओवादी जो चुपचाप सरेंडर कर चुके थे, लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी. ये लोग अब बाकी साथियों को सरेंडर करने के लिए मनाने में अहम भूमिका निभा रहे थे. आमतौर पर बारिश के मौसम में ऑपरेशन धीमे पड़ जाते हैं क्योंकि भारी बारिश से बस्तर के बड़े हिस्से बाकी इलाकों से कट जाते हैं. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. सुरक्षा बल अबूझमाड़ के अंदर तक पहुंच गए. इससे सरेंडर का दबाव और बढ़ गया.

सरेंडर के खेल में शब्दों का बड़ा मतलब होता है. जो माओवादी सरेंडर कर रहे हैं, उन्हें 'सरेंडर' शब्द पसंद नहीं. उनका कहना है कि आंदोलन जारी रहेगा, बस हथियार नहीं होंगे. इसलिए एक नया शब्द बनाया गया: 'पूना मार्गम'. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता, स्कूल के टीचर, पंचायत के पदाधिकारी और यहां तक कि पत्रकार भी सरकार और माओवादियों के बीच पुल की तरह काम कर रहे हैं. वे लगातार उन्हें समझा रहे हैं कि हथियार छोड़ने में ही भलाई है. दूसरी तरफ पुलिस दबाव कम करने को तैयार नहीं. सुंदरराज पी. कहते हैं, ''पहली शर्त यही है कि हथियार छोड़ो. हमने सिर्फ इतना कहा है कि जो हथियार छोड़कर आम जिंदगी में लौटना चाहते हैं, उनके लिए एक पैकेज रखा गया है.''

आंध्र प्रदेश पुलिस के हाथों 18 नवंबर को माडवी हिडमा के मारे जाने से एक हफ्ते पहले, छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम और गृह मंत्री विजय शर्मा हिडमा के पैतृक गांव पुवर्ती पहुंचे. उन्होंने वहां हिडमा की मां और बारसे देवा की मां के साथ खाना खाया. देवा को अब बटालियन नंबर 1 का कमांडर माना जाता है. हिडमा की मां ने फरार माओवादियों से सरेंडर की अपील भी की, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ.

हिडमा के मारे जाने के बाद स्थानीय नेताओं ने यह कहना शुरू कर दिया कि माओवादी नेतृत्व में दरार है. इनमें पूर्व भाकपा विधायक मनीष कुंजाम भी शामिल थे. उनका कहना था कि पोलितब्यूरो का सदस्य देवजी, जो आत्मसमर्पण के खिलाफ माना जाता है, ने ही शायद पुलिस को सूचना दी हो. हालांकि बड़े माओवादी नेताओं ने ऐसी किसी दरार से इनकार किया है और कहते हैं कि जो भी सरेंडर करना चाहे, वह अपनी मर्जी से कर सकता है (देखें खास बातचीत).

डेडलाइन की चुनौती
भले ही बड़े-बड़े ग्रुप सरेंडर कर रहे हों, लेकिन माओवादी नेतृत्व में हर कोई तैयार नहीं. कुछ लोग किसी भी नतीजे की परवाह किए बिना लड़ाई जारी रखना चाहते हैं. रूपेश इंडिया टुडे से कहते हैं, ''कुंजाम जो कह रहे हैं कि देवजी ने हिडमा को मरवाया, वह सच नहीं है. देवजी सरेंडर बिल्कुल नहीं करना चाहते, जबकि उन्हें पता है कि इसका क्या अंजाम हो सकता है. हिडमा भी यही सोचता था.'' 

उधर, शर्मा ने माओवादी प्रवक्ता अनंत की उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन के तीन मुख्यमंत्रियों से 16 फरवरी तक ऑपरेशन रोकने की गुजारिश की थी, ताकि सरेंडर कराए जा सकें. शर्मा का कहना है कि यह तारीख बहुत दूर है और सरेंडर इससे पहले भी कराए जा सकते हैं. अब अनंत ने 1 जनवरी तक समय मांगा है. सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि उन्हें पता नहीं कि रामदर, जो इस जोन का टॉप ऑपरेटिव है, सरेंडर करने को तैयार है या नहीं, लेकिन यह भी कहा कि अगर छत्तीसगढ़ की तरफ से मंजूरी मिले तो उनकी टीम अलग होकर सरेंडर कर देगी. दूसरी तरफ पापा राव जैसे कुछ लोग किसी भी हालत में सरेंडर करने के मूड में नहीं दिखते.

31 मार्च, 2026 की डेडलाइन जैसे-जैसे करीब आ रही है, दोनों तरफ के लिए मुश्किल फैसले इंतजार कर रहे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि भारत में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में सिर्फ 11 रह गई है. और 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को खत्म करने की उनकी डेडलाइन एकदम पटरी पर चल रही है.

उग्रवादी छोड़ रहे मैदान
बढ़ते आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियों और मौतों से साफ है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी कमजोर पड़ रहे

  • 4,330 पिछले सात साल में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों की तादाद
  • 3,896 गिरफ्तार किए गए माओवादी
  • 669 माओवादी मारे जा चुके हैं सुरक्षा दलों के विभिन्न अभियानों में
  • 180 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए
  • आंकड़े 2019 से 3 दिसंबर, 2025 तक के; स्रोत: छत्तीसगढ़ पुलिस

खास बातचीत आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी: ''हम पब्लिक मूड पढ़ने में नाकाम रहे''

भाकपा (माओवादी) सेंट्रल कमेटी के सदस्य रूपेश उर्फ सतीश ने 17 अक्तूबर को 209 हथियारबंद कैडरों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया. सतीश दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के उत्तरी जोन (डीकेएससीजेड) के मुखिया तथा मुख्य विचारक रहे हैं. इस दुबले-पतले तेलुगु भाषी माओवादी के अलावा उनके प्रमुख साथी और डीकेएससीजेड सदस्य बाजी राव जगदलपुर की जेल में सीनियर एडिटर राहुल नरोन्हा से समर्पण, जनमत को गलत समझने और आंदोलन के भविष्य पर बातचीत की. पेश हैं उसी के कुछ संपादित अंश:

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 27 नवंबर को आत्मसमर्पण के बाद रुपेश (बैठे हुए) अपने कैडरों के साथ

प्र: पिछले दो साल में साफ-साफ हार देखी गई और सुरक्षा बलों की रणनीति भी बदली है. आंदोलन क्यों कमजोर पड़ा?
रूपेश: हम सही रणनीति नहीं बना पाए, न ही समाज के सभी वर्गों तक पहुंच पाए. मसलन, किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हम ज्यादा कुछ नहीं कर पाए; किसानों और मजदूरों की समस्याएं बनी हुई हैं. मजदूर परेशान हैं लेकिन हमारा आंदोलन उनके बीच, या छात्रों या शहरी लोगों के बीच मौजूद नहीं है. हम आदिवासी क्षेत्र तक ही सीमित थे, वहां भी पूरी तरह से नहीं. अगर बड़ी संख्या में लोग हमसे जुड़ते, तो सरकार उसी हिसाब से अपना जवाब देती. मुख्य दोष यह है कि हम देश के हालात को ठीक से समझ नहीं पाए.

बाजी राव: यह पिछले दो साल की ही बात नहीं है; हम पार्टी की सक्रियता को देश के बाकी हिस्सों में नहीं बढ़ा पाए. हम भूमिगत समूह हैं; हमने यहां (दंडकारण्य में) एक ढांचा तैयार किया लेकिन कहीं और ऐसा नहीं कर सके. सरकार सत्ता के जोर पर नीतियां बना रही है लेकिन हम लोगों को उनके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को नहीं समझा सके. हम पढ़े-लिखे लोगों तक भी नहीं पहुंच सके. मशीनीकरण की वजह से उत्पादन के तरीकों में बदलाव आया है, जो लोगों के खाने और पहनने के तरीके में दिखता है. हम उसे पहचान नहीं पाए. पार्टी से इसके आकलन में गलती हुई.

प्र: सुरक्षा बलों के ऑपरेशन में तेजी देख आपने क्या सोचा?
रूपेश: हम मानते हैं कि सुरक्षा बलों के ऑपरेशन में तेजी आई लेकिन हम इससे सहमत नहीं हैं कि पिछले दो साल में उसकी वजह से आंदोलन कमजोर हुआ. ऑपरेशन लंबे समय से चल रहे हैं—राज्य में सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की. हमारे नजरिए में दोनों एक ही हैं.

प्र: केंद्रीय गृह मंत्री ने माओवादी आंदोलन को मिटा देने की आखिरी तारीख 31 मार्च, 2026 का ऐलान किया, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
बाजी राव: हम किसी तारीख की वजह से बाहर नहीं आए हैं. हम रोड मैप और रणनीति बनाने में नाकाम रहे, जो 10, 15 या 20 साल पहले बना लेनी चाहिए थी.

प्र: आप आंदोलन का भविष्य कैसा देखते हैं?
रूपेश: मैं यहां जो कह सकता हूं, उसकी सीमाएं हैं. सरकार ने हथियारबंद माओवादियों को कंट्रोल करने के लिए एक समय-सीमा तय की है लेकिन देश की समस्याएं बनी हुई हैं. सरकार अगर इन मुद्दों पर ध्यान नहीं देती, सही नीतियां नहीं बनाती या उन्हें लागू नहीं करती है तो आंदोलन किसी न किसी रूप में जारी रहेगा. मौजूदा माओवादी नेतृत्व अस्तित्व में है या नहीं, यह जरूरी नहीं. हम उसे रोक या जारी नहीं रख सकते.

प्र: आगे की योजना क्या है?
बाजी राव: जमीन पर हालात बदल गए हैं, जिसका मतलब है कि हथियारबंद लड़ाई को बढ़ाया नहीं जा सकता, उसे रोकना होगा. देश में बहुत सारी दिक्कतें हैं. उन्हें सुलझाना है, तो हमें लोगों से जुड़ना होगा. लोग कभी भी उठ खड़े हो सकते हैं. हमें उन्हें गोलबंद करने और उनमें जागरूकता फैलाने की जरूरत है.

प्र: चुनावी राजनीति के बारे में क्या विचार हैं?
रूपेश: मेरा निजी विचार है कि हमें चुनावी राजनीति का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहिए था. चुनाव का बहिष्कार करने की बजाए हमें उसका फायदा उठाना चाहिए था. बहिष्कार लोगों से हमारी दूरी की एक और वजह बन गया. चाहे हम अपने उम्मीदवार को जिता न पाते, हमें कम से कम उम्मीदवारों पर अपना रुख साफ करना चाहिए था. अगर जरूरत पड़ती तो हम राजनीति में उतर सकते थे.

''चुनावों का बहिष्कार करने की बजाय हमें उनका अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहिए था. बहिष्कार की हमारी मांग जनता से हमारे कटने की एक और वजह बन गई''

रायपुर में हुई डीजीपी-आइजी कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह

लाल गढ़ का सफाई अभियान
हाल ही रायपुर में हुई डीजीपी-आइजी कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जिन इलाकों से वामपंथी अतिवाद (लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म) खत्म हो रहा है, वहां अब समग्र विकास पर फोकस होना चाहिए. वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि अगले साल तक देश पूरी तरह नक्सल-मुक्त हो जाएगा

» कॉन्फ्रेंस के लिए रायपुर का चुना जाना अपने आप में एक संदेश था क्योंकि यह देश के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी है

» प्रधानमंत्री मोदी का मुख्य संदेश यह था कि जिन इलाकों को नक्सली असर से छुटकारा मिल रहा है, वहां अब समग्र किस्म के विकास की जरूरत है

» उनके बयान से साफ था कि वामपंथी अतिवाद पर बड़ी कामयाबी जरूर मिली है, लेकिन अब अभियान का अगला चरण विकास पर टिका होगा

» गृह मंत्री अमित शाह ने फिर कहा कि नक्सलवाद अगले साल तक खत्म हो जाएगा और अगले डीजीपी/आइजीपी सम्मेलन से पहले यह समस्या पूरी तरह खत्म हो चुकी होगी

» उन्होंने बताया कि 586 सशक्त पुलिस थाने बनाए गए हैं और 2014 के मुकाबले नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या काफी घट गई है

» शाह ने कहा कि पिछले 40 साल में तीन बड़ी समस्याएं—नक्सलवाद, पूर्वोत्तर और कश्मीर में उग्रवाद—लगातार बनी रहीं. लेकिन मोदी सरकार ने इनका टिकाऊ हल निकाला है

» उनका कहना था कि कट्टरपंथ, उग्रवाद और ड्रग्स से निबटने की कुंजी है: सटीक इंटेलिजेंस, साफ लक्ष्य और मिलकर कार्रवाई

» भले ही बड़े-बड़े समूह आत्म समर्पण कर रहे हों लेकिन माओवादी नेतृत्व में हर कोई उनके साथ आने को तैयार नहीं. कुछ लोग हर हाल में लड़ाई जारी रखने के पक्ष में.

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