क्या महानगरों में नई महामारी की वजह बन रहे हैं कबूतर?

मुंबई में कबूतरों को दाना डालने से लोगों की आस्था, पारिस्थितिकी तंत्र और राजनीति आमने-सामने आ गए हैं

मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया पर कबूतरों को दाना डालते लोगों की पुरानी तस्वीर

खाकसार कबूतर समूचे मानवीय इतिहास में फड़फड़ाता रहा है—संदेशवाहक, साथी और सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर. बॉलीवुड ने तो 1989 की बेहद कामयाब और धमाकेदार रोमांटिक फिल्म मैंने प्यार किया में हर जगह मौजूद इस पक्षी को प्रेम के प्रतीक के तौर पर अमर कर दिया. मगर आज के शहरी भारत में यह दो विपरीत भावनाओं का विषय बन गया है: कुछ लोगों में यह करूणा जगाता है, तो दूसरे इसे बीमारियों और शहरी सड़न का हरकारा मानते हैं. 

हाल ही मुंबई में ऐसे तनाव देखने को मिल रहे हैं. जैन मुनि नीलेशचंद्र विजय ने 3 नवंबर को कबूतरों को दाना चुगाने वाले शहर के सबसे बड़े स्थल दादर के मशहूर कबूतरखाने को बंद करने के बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के फैसले के खिलाफ आजाद मैदान में विरोध प्रदर्शन किया. जैन समुदाय के लिए कबूतरों को दाना डालना पुण्य का काम है. प्रदर्शन से पहले मुनि ने आगाह किया कि समुदाय इस कार्रवाई के खिलाफ 'हथियार उठाएगा'.

उधर अंधेरी के लोखंडवाला में चार नई जगहों पर कबूतरों को नियंत्रित दाना डालने की इजाजत देने के बीएमसी के फैसले को रहवासियों के विरोध का सामना करना पड़ा. उन्हें डर है कि बड़े पैमाने पर कबूतरों को दाना डालने से लोखंडवाला झील में अक्सर आने वाले प्रवासी और विदेशी पक्षियों की करीब 100 प्रजातियां छिटक सकती हैं. इससे पहले संजय गांधी नेशनल पार्क सरीखे इलाकों में कबूतरों के आहार केंद्र स्थापित करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव का वन्यजीव संरक्षक केदार गोरे ने विरोध किया था. उन्होंने आगाह किया कि कबूतरों के साथ दूसरी प्रजातियां भी यहां खिंची चली आएंगी, जिससे वे जूनोटिक या पक्षीजन्य बीमारियों के संपर्क में आ सकती हैं.

विवाद जुलाई में शुरू हुआ जब पूरे मुंबई में फैले 51 आहार केंद्रों पर कबूतरों की बीट से होने वाले सेहत के खतरों पर महाराष्ट्र विधानसभा में चर्चा हुई. उद्योग मंत्री उदय सामंत ने कहा कि बीएमसी से इन्हें बंद करने के लिए कहा जाएगा. पशु अधिकार कार्यकर्ता आनन-फानन बॉम्बे हाइकोर्ट चले गए, जिसने अंतरिम आदेश में यह तो कहा कि 'मानव स्वास्थ्य सर्वोपरि है', लेकिन कबूतर आहार केंद्र बंद करने पर रोक लगा दी.

अगस्त में जब बीएमसी ने दाना डालने से रोकने के लिए आहार केंद्रों को तिरपाल की चादरों से ढका, तो दाना चुगाने वालों ने विरोध किया. सैकड़ों विरोधी दादर के कबूतरखाने में दनदनाते घुस गए और चादरें फाड़ डालीं. करीब 50,000 कबूतर वहां पलते थे और उन्हें रोज करीब 1,500 किलो अनाज के दाने डाले जाते थे, जो मुख्य रूप से जैन समुदाय के लोग डालते थे. विरोध करने वालों ने पुलिस के आदेशों को धता बताते हुए भारत की वित्तीय राजधानी में सांप्रदायिक अशांति की चिंगारी सुलगा दी.

मसला महज मुंबई तक सिमटा नहीं है. कबूतर देश भर में नागरिकों के धैर्य का इम्तहान ले रहे हैं. दिल्ली नगर निगम भी पाबंदी लगाने पर विचार कर रहा है. पुणे में उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है. मैसूरू में भाजपा के सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार ने सेहत और धरोहर दोनों के लिए खतरे का हवाला देकर महल के नजदीक पक्षियों को दाना डालना बंद करने के लिए जैनियों को मना लिया. दुनिया भर में यही हो रहा है. न्यूयॉर्क और लंदन में दाना डालने पर नियम-कायदे लागू हैं और सिंगापुर में जुर्माना लगाया जाता है.

विज्ञान और भावना
महाराष्ट्र की राजधानी में जो आम शहरी कार्रवाई की तरह शुरू हुआ, उसने जल्द ही स्वास्थ्य, धर्म और पहचान को लेकर व्यापक टकराव की शक्ल अख्यिर कर ली. विधान परिषद में यह मामला उठाने वाली शिवसेना की एमएलसी मनीषा कयांदे ने कहा कि वैज्ञानिक और चिकित्सा के लिहाज से एक अहम मुद्दे को भावनात्मक मुद्दे में बदल दिया गया. जंतुविज्ञान की इस पूर्व प्रोफेसर ने कबूतरों को 'उड़ते कृंतक' यानी चूहा और गिलहरी सरीखे कुतरने वाले जानवर करार दिया, जो पक्षीजन्य बीमारियां फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं (देखें: परिंदों से पैदा मर्ज). उन्होंने बताया कि उनके शरीर पर मौजूद मायोफाइब्रिल (प्रोटीन के तंतु) अक्सर इंसान के फेफड़े में दाखिल होने का रास्ता ढूंढ़ लेते हैं और सांस के विकार पैदा करते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे जोखिमों ने दुनिया भर के देशों को कबूतरों की आबादी पर लगाम कसने के लिए उकसाया है. 

याचिकाकर्ता इस नजरिए का विरोध करते हैं. उनमें से एक स्नेहा विसारिया का कहना है कि कोई भी वैज्ञानिक अध्ययन कबूतरों के संपर्क में आने को सांस से जुड़ी बीमारियों के साथ सीधे नहीं जोड़ता. यह बताते हुए कि नगर निकाय बीते आठ महीनों से खार, गोवालिया टैंक, नैगांव और लालबाग के कबूतरखानों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रहा, वे कहती हैं, ''वे यह समझने को तैयार नहीं कि ये बिरलों में भी बिरले मामले हैं जो खुले वातावरण में नहीं होते.'' वे आग्रह करती हैं कि प्रतिबंध लगाने के बजाए दाना डालने वालों को दिन में तीन बार एक-एक घंटे दाना डालने की इजाजत दी जाए.

दादर कबूतरखाना ट्रस्ट के एक ट्रस्टी का कहना है कि पाबंदी की वजह से 'हजारों कबूतर भूख-प्यास से मर गए'. इसी तरह जैन संगठन वर्धमान परिवार के ट्रस्टी अतुल शाह (दाढ़ी) का कहना है कि दाना डालने पर पाबंदी पक्षियों के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होगी, खासकर जब 'पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी अपनी खास जगह' है. वे आरटीआइ के तहत समुदाय-संचालित अस्पतालों के उन जवाबों का हवाला देते हैं जो खतरे के पैमाने को कम करके बताते जान पड़ते हैं: जुलाई 2024 और जुलाई 2025 के बीच सायन अस्पताल ने हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस के 12 मामले दर्ज किए, जिनमें से केवल चार मरीज कबूतरों के संपर्क में आए थे, वहीं केईएम अस्पताल में आठ मामले आए, जिनमें से दो पक्षियों से जुड़े थे.

डॉक्टर इससे इत्तेफाक नहीं रखते. सरकार संचालित जे.जे. अस्पताल में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. दीपक भानुशाली का कहना है कि उनकी टीम कबूतर के पंखों या बीट के संपर्क में आने से होने वाले हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस के हर महीने दो से तीन नए मामले देखती है. वे बताते हैं, ''हालांकि यह साबित करने का कोई टेस्ट नहीं है कि यह केवल कबूतरों के कारण होता है, लेकिन कबूतरों के संपर्क में आना इसके सबसे आम कारणों में से है.'' वे यह भी कहते हैं कि इस बीमारी के बढ़ने की रफ्तार धीमी की जा सकती है, लेकिन इसे उलटा नहीं जा सकता. फेफड़ों के प्रत्यार्पण भी बिरले ही हैं और केवल आधे ही कामयाब होते हैं. वे आगाह करते हैं, ''ऐसी बीमारियों का सामना करने के बजाए इन्हें रोका जाना चाहिए.''

जैन समुदाय के भीतर भी विवेकवान आवाज उठ रही है. अपने को 'कट्टर जैन' कहने वाले पुणे के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. कल्याण गंगवाल स्वास्थ्य जोखिमों की वजह से घनी आबादी वाले इलाकों में कबूतरों को दाना डालने के खिलाफ सलाह देते हैं. नागरिक संगठन चाचक दादर के संस्थापक चेतन कांबले सरीखे कुछ लोगों के लिए समस्या शहरी व्यवस्था की है. उनका कहना है कि दाना डालने वाली जगहों पर कबूतर यातायात और खासकर दोपहिया वाहनों के लिए खतरा पैदा करते हैं. कांबले उस तरफ भी इशारा करते हैं जिसे वे 'पाखंड' कहते हैं: दादर कबूतरखाने के नजदीक एक जैन मंदिर ने कबूतरों को भगाने के लिए जाल बिछा रखे हैं, और फिर भी जैन संगठन जोर देते हैं कि सार्वजनिक जगहों पर पक्षियों को दाने डाले जाएं.

उभर आईं दरारें
खासकर मुंबई तथा उसके आसपास के इलाकों में महाराष्ट्र की राजनीति की भाषा-आधारित फूट ने कबूतरों को दाना डालने के विवाद को ज्यादा तीखे ध्रुवों में बांट दिया—यानी मराठीभाषियों को जैन समुदाय के खिलाफ खड़ा कर दिया. हाल के बरसों में दोनों के बीच रिश्ते कई सारे मुद्दों को लेकर पहले ही तनावपूर्ण थे.

मसलन, शाकाहारी गुजरातियों, मारवाड़ियों और जैनियों के दबदबे वाले मोहल्लों में मांसाहारी महाराष्ट्रियनों को घर नहीं दिए जा रहे; पहले जो इलाके कामगार तबके के महाराष्ट्रियनों के थे, वहां केवल जैनियों के बंद परिसर उभर आए; और ऐसी इमारतों के नजदीक स्थित मछली बाजारों को बंद कर दिया गया या दूसरी जगहों पर ले जाया गया. मुनि नीलेशचंद्र विजय ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के मुखिया राज ठाकरे से दखल देने की अपील की. मगर ठाकरे ने उलटे कबूतरों को दाना डालने से बाज नहीं आने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और जैन मुनि से कहा कि हाइकोर्ट के आदेश का पालन करें.

विवाद के बाद मूलनिवासी समर्थक संगठन मराठी एकीकरण समिति (एमईएस) ने पाबंदी के समर्थन में महाराष्ट्रियनों और स्थानीय निवासियों का मोर्चा निकाला. एमईएस के उपाध्यक्ष प्रमोद पर्ते ने सवाल उठाया कि कबूतरों को दाना डालने पर पाबंदी सरीखे मामूली मुद्दे को जैनियों ने धार्मिक रंग क्यों दिया, और आरोप लगाया कि समुदाय का शक्ति प्रदर्शन मराठियों के खिलाफ था.

विश्लेषकों का कहना है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और एमएनएस सरीखे मराठी-समर्थक दलों ने दादर में अपनी मजबूत मौजूदगी और हिंदीभाषियों पर शारीरिक हमले के इतिहास के बावजूद धनी-मानी जैनियों की तरफ से हमला बोले जाने पर खामोशी ओढ़ ली. मराठी अभ्यास केंद्र के शिक्षक दीपक पवार कहते हैं, ''राजनैतिक पार्टियां जैनियों की एहसानमंद हैं और उन्हें आहत करना गवारा नहीं कर सकतीं. इसने मराठी को लेकर की जा रही राजनीति की सीमाओं को उघाड़कर रख दिया.'' उनका कहना है कि जैनियों के बढ़ते दबदबे की जड़ें भाजपा की हुकूमत और ''उत्तर भारतीयों के संख्याबल, जैनियों के संसाधनों और आरएसएस की विचारधारा की ताकत'' में खोजी जा सकती हैं.

इस मुद्दे ने शिवसेना (यूबीटी) के हाथ में सत्तारूढ़ महायुति को पीटने के लिए छड़ी भी दे दी. लोकसभा सांसद अनिल देसाई ने, जिनके निर्वाचन क्षेत्र में दादर भी आता है, राज्य सरकार पर चुनावी फायदे के लिए वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया. मगर पार्टी के सूत्र सेना (उबाठा) का रुख आक्रामक नहीं होने की वजह जैनियों के एकजुट होकर वोट करके पलड़ा एक तरफ झुका देने की क्षमता को बताते हैं. एमएनएस का कहना है कि भाजपा बीएमसी के आगामी चुनाव में जैनियों और गैर-महाराष्ट्रियनों को गोलबंद करने पर भरोसा करके चल रही है. भाजपा अलबत्ता इस आरोप को खारिज करती है. उसके राज्य प्रवक्ता केशव उपाध्ये जोर देकर कहते हैं कि फडणवीस ''ऐसा समाधान निकालेंगे जो समाज की आस्था और जनता के स्वास्थ्य के बीच सुनहरा संतुलन कायम करेगा.''

पर्यावरणवादियों का कहना है कि खाने की आसान उपलब्धता और बहुत ज्यादा खाने की वजह से कबूतरों की आबादी में तेज बढ़ोतरी हुई है, और इसी के साथ चूहे-गिलहरी सरीखे जंतुओं की संख्या में उछाल आया है, जो जूठन के तौर पर बचे हुए अनाज पर फलते-फूलते हैं. चील और बिल्लियों सरीखे उनके प्राकृतिक भक्षक इस रफ्तार से नहीं बढ़ पाए. द स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स 2023 की रिपोर्ट कहती है कि 2002 से रॉक कबूतर (कोलंबा लिविया) 158.47 फीसद बढ़े, जिसने इन्हें प्रभावी तौर पर आक्रामक प्रजाति बना दिया. अनुमान बताते हैं कि हर पक्षी साल भर में करीब 11.5 किग्रा बीट उत्सर्जित करता है. बीएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि सेहत को होने वाले जोखिमों को छोड़ भी दें तो यह बीट मुंबई की इमारतों के लिए भी खतरा है. वे अक्सर ऐसी रासायनिक प्रतिक्रियाओं को जन्म दे सकती हैं जिनसे प्रतिष्ठित स्मारकों पर दाग-धब्बे पड़ सकते हैं.

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के डायरेक्टर किशोर रीठे पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने की अहमियत पर जोर देते हैं. उनका कहना है कि कबूतरों की तादाद में उछाल ऐसे वक्त आया जब फ्लाइकैचर सरीखी देशज पक्षियों की प्रजातियों में गिरावट आई है. वे बताते हैं, ''वन्यजीव प्रबंधन में यह स्थापित तथ्य है कि एक प्रजाति का दबदबा दूसरी प्रजातियों के लिए खतरनाक है.''

वे यह भी कहते हैं कि कबूतरों को दाना डालने को लेकर चल रही बहस भावनाओं से नहीं बल्कि विज्ञान से तय होनी चाहिए. एमएनएस की पर्यावरण शाखा के प्रमुख और पर्यावरणविद जय शृंगारपुरे का कहना है कि अवैध कबूतरखानों ने कबूतरों की तादाद में अनियंत्रित बढ़ोतरी की आग में घी का काम किया. उनके अभियान का लक्ष्य सजा के बजाय जागरूकता है.

वे कहते हैं, ''अगर कबूतरों को दाना न डाला जाता, तो वे दाना-पानी ढूंढ़ने की प्राकृतिक उमंग के पीछे जाते.'' गोरे इसे ऐसा मसला बताते हैं जिसका कोई सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं है. अलबत्ता यह पक्षी खुद अपने आसपास मची अफरातरफी से बेखबर रहकर अपने लिए डाले गए दानों के इर्द-गिर्द झुंडों में इकट्ठा है. यह इंसान ही है जिसे आस्था और साफ-सफाई के बीच एक को चुनना होगा.—साथ में सोनाली आचार्जी

परिंदों से पैदा मर्ज

पुणे के रूबी हॉल क्लिनिक के वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. अमित सकारिया बता रहे हैं कबूतर से होने वाली बीमारियों के बारे में

> हिस्टोप्लाज्मोसिस: कबूतरों की बीट में पाए जाने वाले हिस्टोप्लाज्मा कैप्सुलेटम सरीखे फफूंद से पैदा होता है; फेफड़ों की संगीन बीमारियों का सबब बन सकता है

> क्रिप्टोकोकोसिस: फेफड़ों की बीमारी जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को निशाना बनाती है, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए ज्यादा खतरा पैदा करती है

> सिटोकोसिस: कबूतरों से होने वाला बैक्टीरिया का संक्रमण, जिसका अगर इलाज न किया जाए तो बढ़कर न्यूमोनिया में बदल सकता है

> एलर्जी: कबूतर से एलर्जी के प्रति पहले से संवेदनशील व्यक्तियों में एलर्जिक प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है

> अस्थमा: पंख, बीट या धूल के बार-बार संपर्क में आने से सांस की परेशानियां पैदा हो सकती हैं

> पिजन ब्रीडर्स लंग: इसे हाइपरसेंसिटिव न्यूमोनाइटिस भी कहा जाता है. बीट की धूल के बारीक कण सांस में जाने से पैदा होती है, जिससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है

> परजीवी संक्रमण: कबूतरों में  अक्सर घुन, जूं और पिस्सू लगे होते हैं,  जो इंसानी परिवेश में फैलकर त्वचा की एलर्जी, खुजली और द्वितीयक संक्रमण पैदा करते हैं

समस्या पर काबू

प्रेम-करुणा, साफ-सफाई और पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य के बीच कैसे संतुलन स्थापित करें

> दाना डालने के सीमित घंटों या निर्धारित क्षेत्रों की इजाजत दें ताकि जनस्वास्थ्य की रक्षा करते हुए आस्था का सम्मान हो सके

> जुर्मानों पर भरोसा करने के बजाए अत्यधिक दाना डालने से होने वाले स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी के जोखिमों के बारे में नागरिक जागरूकता अभियान चलाएं

> कबूतरों की बेलगाम बढ़ोतरी को बढ़ावा देने वाले अनधिकृत कबूतरखानों के खिलाफ कार्रवाई करें

> भावनाओं नहीं बल्कि पारिस्थितिकीय और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर नीतियां बनाएं

> दाना डालना कम करें ताकि कबूतर कुदरती तरीकों से खुराक खोजें और खाएं, और चील-बिल्ली सरीखे भक्षक भी फूले-फलें

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