प्रधान संपादक की कलम से

भारत का सतर्क भू-राजनीतिक संतुलन अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी पर निर्भर है, जिसे अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों से समर्थन प्राप्त है. ट्रंप 2.0 को हम अपने फायदे में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?

इंडिया टुडे कवर : दुनिया को किस नजर से देखेंगे ट्रंप
इंडिया टुडे कवर : दुनिया को किस नजर से देखेंगे ट्रंप

—अरुण पुरी

यह अमेरिका के इतिहास में सबसे शानदार वापसी में से एक है. डोनाल्ड ट्रंप जनवरी, 2025 में बतौर 47वें राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत करेंगे. ऐसे नतीजे पर सट्टेबाजों ने भी कुछ महीने पहले तक शायद ही दांव लगाया होगा क्योंकि ट्रंप पहले कार्यकाल में दो बार महाभियोग का सामना कर चुके हैं, लगभग 34 दीवानी और फौजदारी मामलों में उलझे हुए हैं, जिनमें 2020 के चुनाव नतीजों को पलटने की कोशिश का भी एक मामला है.

लेकिन उन्होंने सबको झुठला दिया और खुद को ऐसे बाहरी की तरह पेश किया, जो कुलीन वर्ग के स्थापित सिस्टम का सताया हुआ है, इस कदर कि उसकी हत्या की एक कोशिश भी हो चुकी है. बेहद गरमागरम कांटे के चुनाव में उन्हें ऐसा जनादेश मिला है जो उनके हाथ देश की लगभग पूरी कमान सौंपता है और रिपब्लिकन पार्टी भी अमेरिकी कांग्रेस में पूरे दबदबे की ओर बढ़ रही है.

हर दुविधा को परे करके अमेरिकी मतदाताओं ने भविष्य डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस के हाथ सौंपने से मुंह मोड़ लिया, जिनकी अमेरिका की राष्ट्रपति बनने वाली पहली महिला और दूसरी अश्वेत व्यक्ति के रूप में इतिहास में नाम दर्ज कराने की कोशिश महिलाओं और उनके कुछ मूल मतदाताओं में भी जोश नहीं भर पाई.

विडंबना यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के व्यापक आर्थिक सूचकांक विकसित दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय हैं. उसकी वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सालाना 3.5 फीसद की वृद्धि दर्ज कर रही है. हाल के दौर में बेरोजगारी के आंकड़े निचले स्तर पर हैं, और महंगाई दर महामारी की चोटी 2022 में 9 फीसद से घटकर करीब 3 फीसद पर आ गई है. फिर भी, मतदाताओं ने हैरिस के खिलाफ मतदान किया क्योंकि औसत अमेरिकी को लगा कि पेट्रोल पंप और किराने की दुकान पर उसकी जेब ढीली हो रही है. फिर, दशकों बाद सबसे बुरा आवास संकट भी तारी है—लाखों लोग तनख्वाह का 30 फीसद तक किराए या किस्त में देने को मजबूर हैं.

इसके अलावा ट्रंप ने अपनी अभद्र, आग लगाने वाली बोली से भी हवा दी कि आप्रवासियों की बेरोकटोक आमद से देश बर्बाद हो रहा है कि अमेरिका को सहयोगी देश अपनी रक्षा के लिए मोहरा बना रहे हैं और व्यापार साझीदारों की तो चांदी हो गई है. अमेरिका में एक सांस्कृतिक खाई भी है जिसमें कुलीन वर्ग के 'वोकिज्म' (प्रगतिशील विचारों) के खिलाफ ट्रंप रूढि़वादी विद्रोह के झंडाबरदार हैं. यहां तक कि गर्भपात पर उनके विवादास्पद रुख से भी कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि 2020 के चुनाव में बाइडन के मुकाबले 15 फीसद कम महिलाओं ने हैरिस को वोट दिया. हैरिस ने कहा कि 'फासीवादी' ट्रंप लोकतंत्र के लिए खतरा होंगे, लेकिन इसे ज्यादा तवज्जो नहीं मिली. लोग अपनी माली हालत को लेकर ज्यादा फिक्रमंद थे और अधिकांश ने ट्रंप को हैरिस से बेहतर माना. 

ट्रंप ने चुनाव अभियान में ही इरादे एकदम साफ कर दिए हैं. वे सबसे पहले अवैध आप्रवासियों को बड़े पैमाने पर निकालना शुरू करेंगे, सरकारी एजेंसियों के जरिए 'अंदरूनी दुश्मनों' पर हमला करेंगे और टैरिफ आसमान छूने लगेगा. यह सब अमेरिका को फिर से महान बनाने के नाम पर होगा, हालांकि उन्हें असलियत में अमेरिका को फिर से सहूलत वाला बनाना है. देखना होगा कि इन बयानों में से कितने पर अमल हो पाता है. वैसे, इस बार उनके आगे रोकटोक की अड़चनें भी कम हैं क्योंकि कांग्रेस के दोनों सदनों में उनका वर्चस्व है. पूर्व विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने इसे कुछ यूं बयान किया है, ''सर्वनाश के नए चार घुड़सवार—लोकलुभावनवाद, स्वदेशीवाद, अलगाववाद और संरक्षणवाद—एक साथ सवारी करते हैं, और वे राजनैतिक केंद्र पर धावा बोल रहे हैं.'' ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से यही मायने निकलते हैं. 

अमेरिका को फिक्रमंद होना चाहिए, और दुनिया को भी. यकीनन भारत को भी. दो-दो युद्धों से विश्व व्यवस्था तार-तार हो चली है और ब्रिक्स जैसी संस्थाएं बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ रही हैं, पुरानी विश्व व्यवस्था को नया स्वरूप देने या बदलने की बातें पहले से ही जारी थीं. ट्रंप का पूरी तरह अमेरिका के घरेलू मामलों पर फोकस करना और विश्व मंच से पीछे हटना, इस प्रकिया को और तेज करेगा. वे नाटो से लेकर जलवायु परिवर्तन साझेदारी तक सभी बहुपक्षीय संधियों पर भी अपना तोड़फोड़ का वीटो चलाने के हामी हैं. ऊर्जा के मामले में, जीवाश्म ईंधन पर उनका 20वीं सदी का क्लासिक जुनून है, तेल के मामले में आदर्श वाक्य है ''ड्रिल, बेबी, ड्रिल.''

लेकिन यह जुनून उनके साथी, इलेक्ट्रिक कारों के दिग्गज, इलॉन मस्क की वजह से कुछ बदल भी सकता है. इससे भी बढ़कर, उनका अमेरिका पहले का नजरिया मौजूदा विश्व व्यापार पर विनाशकारी साए की तरह मंडरा रहा है. वे टैरिफ को 'शब्दकोश का सबसे सुंदर शब्द' कहते हैं. दूर चीन से लेकर यूरोपीय संघ और 'ट्रंपरिका' के पास मेक्सिको और कनाडा तक, हर कोई इससे उम्मीद पाल सकता है. भारत ने 2023 में अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार में कुल 128.78 अरब डॉलर में से 28.3 अरब डॉलर का रिकॉर्ड मुनाफा हासिल किया था. शुरुआत में, हम 78.54 अरब डॉलर के निर्यात आंकड़े पर झटके के लिए तैयार रह सकते हैं. और सख्त एच1बी वीजा कानून युवा भारतीयों के लिए अमेरिका को कम सुलभ बना सकता है.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा की आवरण कथा इस बात का जायजा लेती है कि ट्रंप की प्रेसिडेंसी ''अपनी 3-डी नीति तोड़ो, हटो, वैश्वीकरण से दूर (डिसरप्ट, डिसइंगेज, डीग्लोबलाइज)'' से पूरे रणनीतिक और भू-आर्थिक परिदृश्य पर क्या असर डाल सकती है. भारत का सतर्क भू-राजनीतिक संतुलन अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी पर निर्भर है, जिसे अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों से समर्थन प्राप्त है.

ट्रंप 2.0 को हम अपने फायदे में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं? खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें 'दोस्त' मानते हैं, और 'हाउडी मोदी' और 'नमस्ते ट्रंप' कार्यक्रमों की सौहार्दता को याद करते हैं. लेन-देन की शर्तों पर द्विपक्षीय संबंधों में ट्रंप की रुचि भी दरवाजे खोलती है—उनके साथ निबटने का तरीका उनके साथ सौदा करना है. हमें स्मार्ट और पक्के वार्ताकारों की जरूरत होगी.

— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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