क्यों बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियां पीयूष गोयल को लगने लगी हैं सिरदर्द?

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की टिप्पणियां ऐसे समय पर आई हैं जब भारत में ई-कॉमर्स के कारोबार में जबरदस्त वृद्धि देखी जा रही है

पीयूष गोयल, वाणिज्य और उद्योग मंत्री
पीयूष गोयल, वाणिज्य और उद्योग मंत्री

भारत में कामकाज करने वाली बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार के नियम लाने के करीब पांच साल बाद केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने देश में ई-कॉमर्स के तेजी से होते विस्तार पर चिंता जताते हुए नया विवाद खड़ा कर दिया है. उन्होंने कुछ ई-कॉमर्स फर्मों की ओर से इस्तेमाल की जा रही कीमत रणनीतियों की तरफ भी ध्यान खींचा और सवाल उठाते हुए इन्हें 'प्रीडेटरी कीमतें' बताया.

गोयल ने पिछले हफ्ते नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में कहा, "ई-कॉमर्स की इस विशाल बढ़त के साथ क्या हम बड़ा भारी सामाजिक उथल-पुथल पैदा करने जा रहे हैं? मेरे लिए यह गर्व की बात नहीं कि हमारे बाजार का आधा हिस्सा आज से 10 साल बाद ई-कॉमर्स नेटवर्क का हिस्सा बन जाए, यह चिंता की बात है."

उनकी टिप्पणियां ऐसे समय आईं जब भारत में ई-कॉमर्स के कारोबार में जबरदस्त वृद्धि देखी जा रही है. वित्त वर्ष 22 में अनुमानित 83 अरब डॉलर (करीब 7 लाख करोड़ रु.) के इस बाजार के वित्त वर्ष 26 तक 16 फीसद की सालाना चक्रवृद्धि दर से 150 अरब डॉलर (12.6 लाख करोड़ रु.) पर पहुंचने की उम्मीद है.

यह बढ़ोतरी कई कारणों से होगी: बढ़ता मध्यम वर्ग, इंटरनेट की बढ़ती पैठ, स्मार्टफोन का विस्तार और यूपीआई के जरिए बढ़ता भुगतान. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) और रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की इस साल प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिटेल बाजार 2023 में कुल करीब 820 अरब डॉलर (69 लाख करोड़ रु.) का होने का अनुमान था.

भारतीय ई-कॉमर्स बाजार में वैश्विक दिग्गजों का दबदबा है. इनमें अमेजन और वॉलमार्ट (जिसने 2018 में फ्लिपकार्ट को खरीदा) शामिल है. उनके साथ-साथ, घरेलू ई-कॉमर्स कंपनियां भी खुदरा कीमतों की तुलना में भारी भरकम रियायती दामों की पेशकश करती हैं जिससे ऑनलाइन बिक्री अच्छी-खासी बढ़ रही है. "क्या प्रीडेटरी कीमतों की नीति देश के लिए अच्छी है?"

गोयल ने ई-कॉमर्स के प्रभावों के संतुलित मूल्यांकन की जरूरत पर जोर दिया, खास तौर पर पारंपरिक रिटेल्स जैसे रेस्तरांओं, फार्मेसी और स्थानीय स्टोरों पर. उन्होंने कहा, "मैं ई-कॉमर्स को भगाना नहीं चाहता. उनको यहां रहना है." बाद में, उन्होंने कहा कि ई-कॉमर्स के साथ टेक्नोलॉजी भी आती है जो सुविधा में मददगार है. लेकिन करीब 10 करोड़ छोटे दुकानदार हैं जिनकी जीविका और परिवार का भरण-पोषण उनके कारोबार पर ही निर्भर है.

केंद्र के विशिष्ट कानून हैं जो खास तौर पर बिजनेस टू बिजनेस (बी2 बी) लेनदेन के लिए ई-कॉमर्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत देते हैं. वैसे, गोयल के अनुसार, इन कानूनों का पूरी तरह अनुपालन नहीं किया जाता. इस समय भारत में इन्वेंटरी आधारित ई-कॉमर्स के मॉडल में एफडीआई की अनुमति नहीं है. इस मॉडल में ई-कॉमर्स फर्म को उपभोक्ताओं को सीधे सेवा और सामान (बी2सी) बेचने और रखने की इजाजत है.

उन्हीं फर्म में एफडीआई की अनुमति है जो मार्केटप्लेस मॉडल के जरिए परिचालन करती हैं जिसमें एक ई-कॉमर्स इकाई डिजिटल प्लेटफॉर्म या इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क पर खरीदार और विक्रेता के बीच लेनदेन की सुविधा उपलब्ध कराती है.

देश के कानूनों में स्पष्ट प्रावधान है कि मार्केटप्लेस मॉडल में ई-कॉमर्स कंपनी 'सामान या सेवाओं की बिक्री कीमत को सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित' नहीं कर सकती और उन्हें 'बराबरी का मैदान' बरकरार रखना पड़ता है. मार्केटप्लेस मॉडल में फर्मों को उनके प्लेटफॉर्म पर बी2बी आधार पर पंजीकृत विक्रेताओं के साथ लेनदेन की इजाजत होती है. वैसे, प्रत्येक विक्रेता या उसकी समूह कंपनियों को मार्केटप्लेस मॉडल इकाई की कुल बिक्री का 25 फीसद से अधिक बेचने की इजाजत नहीं होती.

गोयल ने कहा कि बड़े ई-कॉमर्स खिलाड़ियों के अनुकूल कतिपय ढांचे खड़े कर दिए गए हैं. उन्होंने कहा, "इन बड़ी कंपनियों की मोटी जेब उनको कम दाम पर सामान बेचने की सहूलत देती है." उपभोक्ता की पसंद और विकल्प तय करने के लिए एल्गोरिद्म का इस्तेमाल किया गया है. उन्होंने कहा, मसलन, कई फार्मेसी गायब हो गई हैं और कुछ बड़ी शृंखलाओं का ही रिटेल क्षेत्र में दबदबा है. उन्होंने ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स या ओएनडीसी जैसे प्लेटफॉर्मों के महत्व की जरूरत बताई जहां छोटे कारोबार अपने उत्पाद बेच सकते हैं.

प्रीडेटरी कीमतों के तर्क का ई-कॉमर्स फर्म प्रतिकार करती हैं. उद्योग के एक सूत्र का कहना है, "यह विक्रेता का विवेक है कि किस कीमत पर उसे बेचना चाहिए." वे स्पष्ट करते हैं कि प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली ई-कॉमर्स फर्म की इसमें शायद ही कोई भूमिका होती है. उस सूत्र ने कहा, "विक्रेता क्लियरेंस सेल कर सकता है या पुराने उत्पादों को सस्ते दामों पर निकाल सकता है. कुछ विक्रेता निर्माण लागत पर उत्पाद लेते हैं और इसमें वेयरहाउसिंग एजेंट को शामिल करने के बजाए उसे ई-कॉमर्स फर्म के पास रख देते हैं. इससे उनको ओवरहेड लागत कम करने और प्लेटफॉर्म पर कम दाम ऑफर करने की सुविधा मिलती है."

कुछ विशेषज्ञों का विचार है कि सरकार को नियंत्रणों की दिशा में नहीं बढ़ना चाहिए और कीमतों के निर्धारण में बाजार की ताकतों को अपनी भूमिका निभाने देनी चाहिए. मूल्य नियंत्रण से किल्लत, उत्पाद की घटिया क्वालिटी और अवैध बाजार में इजाफे को बढ़ावा मिल सकता है. इसके अलावा भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआइ), जिसका काम एकाधिकार के खिलाफ कदम उठाना है, को और ज्यादा अधिकार दिए जा सकते हैं.

अन्य लोगों की दलील है कि सरकार की भूमिका यह पक्का करने की है कि उचित प्रतिस्पर्धा हो. सलाहकार फर्म थर्ड आईसाइट के संस्थापक देवांशु दत्त कहते हैं, "यह महज छोटे रिटेलर नहीं हैं जिनकी बात सरकार कर रही है, इनमें बड़े घरेलू खिलाड़ी भी हैं." उन्होंने जोर दिया कि सरकार का काम कानून को स्थापित करना और निष्पक्षता को बढ़ावा देना होना चाहिए. उनके अनुसार, यह कोई रहस्य नहीं है कि ई-कॉमर्स डिस्काउंट से ही बढ़ा है.

वे कहते हैं, "बड़ी ई-कॉमर्स फर्में उपभोक्ता के मिजाज और कीमतों के जरिए बाजार का हिस्सा हासिल करती हैं. जब विज्ञापनों पर बड़ा पैसा खर्च किया जाता है, तो वह उपभोक्ता के मिजाज को साधने के लिए होता है. कीमतें भी काफी हद तक महत्व रखती हैं. फिर चाहे आप इसे प्रीडेटरी कीमतें कहें या कीमतों के जरिए बाजार अधिग्रहण, यह इस पर निर्भर करता है कि आप किस पाले में खड़े हैं."

ई-टेल की उछाल
820 अरब डॉलर, (69 लाख करोड़ रु.)
आकार था भारत के खुदरा बाजार का, वित्त वर्ष 23 में

83 अरब डॉलर, (7 लाख करोड़ रु.)
आकार था भारत के ई-कॉमर्स बाजार का, वित्त वर्ष 22 में

150 अरब डॉलर, (12.6 लाख करोड़ रु.)
अनुमानित आकार होगा वित्त वर्ष 26 में ई-कॉमर्स बाजार का

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