क्या नई शिक्षा नीति भी भारत को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं?
भारत की शिक्षा प्रणाली की गंभीर खामियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के जरिए दूर किया गया है लेकिन वैश्विक मानक हासिल करने के लिए इसे सच्चे अर्थों में लागू करना जरूरी

भारत नालंदा और तक्षशिला की प्राचीन संस्थाओं के अतीत का जिक्र करते हुए अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता की ऊंची विरासत पर गर्व करता है. आज भारत वैश्विक शिक्षा क्षेत्र में बड़ी ताकत है. फिर भी वैश्विक शैक्षणिक नेतृत्व के शिखर पर पहुंचने के लिए भारत को ढेर सारी चुनौतियों से निबटने की जरूरत है. साथ ही चतुराई के साथ अपने सामर्थ्य का फायदा उठाना होगा. करीब 15 लाख स्कूलों, 40,000 से ज्यादा कॉलेजों और 1,000 से ज्यादा विश्वविद्यालयों वाले भारत का शिक्षा तंत्र करीब 30 करोड़ छात्रों की जरूरत पूरी करता है. इस तरह वह विश्व के सबसे बड़े शैक्षणिक तंत्र में से एक है.
हालांकि संख्या का यह लाभ गुणात्मक सफलता में नहीं बदल सका है. मसलन, भारत में प्राथमिक शिक्षा में जहां ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) 108 फीसद है, वहीं माध्यमिक शिक्षा में यह आंकड़ा गिरकर करीब 79 फीसद रह जाता है. इसके विपरीत पड़ोसी देश चीन में प्राथमिक शिक्षा के लिए जीईआर 100 फीसद पर बरकरार है और माध्यमिक शिक्षा के लिए 89 फीसद है जो छात्रों के शिक्षा में बने रहने का बेहतर प्रदर्शन है. फिनलैंड और दक्षिण कोरिया की मिसाल वाली शिक्षा प्रणाली में सभी स्कूल स्तरों पर जीईआर करीब 100 फीसद है.
और उच्च शिक्षा के लिए भारत का जीईआर निराशाजनक 27.1 फीसद पर घिसट रहा है. यह आंकड़ा चीन की तुलना में आधा और अमेरिका के शानदार 88 फीसद की तुलना में बेहद कमजोर है. कौशल प्रशिक्षण में भी हालत उतनी ही ज्यादा परेशान करने वाली है, जहां भारत के कार्यबल का महज 4 फीसद वोकेशनल शिक्षा हासिल करता है. यह चीन के 24 फीसद और जर्मनी तथा स्विट्जरलैंड के 75 फीसद से ज्यादा की तुलना में एकदम उलट है. इतना ही नहीं, भारतीय स्नातकों की रोजगार पाने की दर करीब 48.7 फीसद है जिससे संकेत मिलता है कि आधे से अधिक स्नातकों में रोजगार के बाजार के लायक कौशल की कमी है.
ये आंकड़े शिक्षा की पहुंच में अच्छे-खासे अंतर को बताते हैं. वहीं सीखने के नतीजों की गुणवत्ता ज्यादा चिंताजनक है. शिक्षा मंत्रालय के नेशनल अचीवमेंट सर्वे (एनएएस) से खुलासा हुआ कि पांचवीं कक्षा तक के महज 45 फीसद छात्र ही दूसरी कक्षा के स्तर वाली किताबें पढ़ सकते थे. इसी तरह 2023 में एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) ने पाया कि 14 से 18 वर्ष की आयु वाले ग्रामीण छात्रों में से एक-चौथाई अपनी क्षेत्रीय भाषा में दूसरी कक्षा के स्तर की किताब भी फर्राटे से नहीं पढ़ सके.
उच्च शिक्षा में तंत्र के विस्तार के बावजूद कुछ ही संस्थान वैश्विक रैंकिंग में सम्मानजनक स्थिति हासिल करते हैं. जहां इसमें अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों का दबदबा है, चीन की संस्थाएं भी तेजी से यह पायदान चढ़ रही हैं. भारत के शोध नतीजों में पिछड़ने से इस गैर-बराबरी में आश्चर्य की कोई बात नहीं है. उच्च शिक्षा में शोध और विकास (आरऐंडडी) में जीडीपी के एक फीसद से भी कम मामूली निवेश से यह और बिगड़ जाती है. अमेरिका शिक्षा को अपने जीडीपी का करीब 3 फीसद आवंटित करता है. हालांकि भारत के शोधपत्रों के छपने में बढ़ोतरी हुई है पर उनका असर और साइटेशन सूचकांक कम बना हुआ है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)
संयोग से शिक्षा और कौशल विकास में फिर से जान फूंकने का ब्लूप्रिंट राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के रूप में सामने है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, भारत में 10 से 24 वर्ष के बीच के लोगों की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा है. भारत के लिए अपनी आबादी का लाभ उठाने और ज्ञान की अर्थव्यवस्था के अवसरों का फायदा लेने के लिए एनईपी पर कारगर कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है.
एनईपी ने भारतीय शैक्षणिक ढांचे में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव किया है. इसमें 10+2 की व्यवस्था की जगह 5+3+3+4 मॉडल लाने की बात है जिसमें विकास के चरणों का शैक्षणिक चरणों के साथ तालमेल हो. ये चरण हैं, फाउंडेशनल (उम्र 3-8), प्रिपेरटरी (उम्र 8-11), मिडिल (11-14) और सेकंडरी (14-18). इसमें प्रयोग करते हुए सीखने और महत्वपूर्ण सोच, पाठ्य सामग्री में कमी करते हुए गहराई से समझ बढ़ाने के लिए मुख्य जरूरत पर जोर दिया गया है. नीति का मकसद 2030 तक प्री-स्कूल से सेकंडरी स्तर तक 100 फीसद जीईआर का लक्ष्य रखा गया है जिसमें शिक्षा छोड़ने वालों को फिर से जोड़ने के विशेष अभियान शामिल हैं.
उच्च शिक्षा में एनईपी बड़े, बहुविषयक और शोध आधारित ऐसे संस्थानों के बदलाव के पक्ष में है जो विभिन्न विषयों में सीखने को बढ़ावा दें. इसका मकसद हर जिले में इस तरह का कम से कम एक संस्थान बनाने का है. इसके अलावा, नीति में संस्थाओं को ज्यादा स्वायत्तता देने और व्यावहारिक अनुभव के लिए उद्योगों के साथ तालमेल बढ़ाने की जरूरत बताई गई है. इस नीति का मकसद मुख्य धारा की शिक्षा को वोकेशनल शिक्षा के साथ एकीकृत करना भी है जिससे कि कम से कम 50 फीसद लर्नर्स को 2025 तक वोकेशनल प्रशिक्षण का अनुभव दिया जा सके.
क्या हैं बाधाएं?
हालांकि, जैसा कि पिछले चार साल में देखा गया है, इस व्यापक नीति का राष्ट्रीय स्तर पर कार्यान्वयन भारी भरकम चुनौतियों से भरा हुआ है. जहां एनईपी को केंद्र सरकार ने तैयार किया है, इसका सफल कार्यान्वयन राज्यों के सक्रिय सहयोग पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है. कई विपक्ष शासित राज्यों ने एनईपी के प्रावधानों और उन पर अमल को लेकर कड़े ऐतराज जताए हैं. केंद्र को सहकारी संघवाद के सिद्धांतों पर चलना चाहिए और इन पहल को लागू करने के लिए विकेंद्रीकरण करना चाहिए.
एनईपी ने अपने उद्देश्य हासिल करने के लिए शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसद खर्च करने की सिफारिश की है. लेकिन शिक्षा पर भारत का सार्वजनिक खर्च—केंद्र और राज्यों का—कभी भी जीडीपी के 3 फीसद से ज्यादा नहीं रहा. इस व्यापक कार्यक्रम पर अमल के लिए इस फंडिंग अंतर को पाटना बेहद महत्वपूर्ण है. कई स्कूलों और कॉलेजों को आधारभूत ढांचे की समस्याओं और बुनियादी सुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है. महज ईंट-पत्थर जोड़ते हुए भवन बनाने के बजाए टेक्नोलॉजी का लाभ उठाना और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रचर का लाभ लेना क्वालिटी शिक्षा की पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आवश्यक है.
भारत को अपनी विशिष्ट जरूरतों के हिसाब से विश्व स्तर के ऑनलाइन शिक्षा मॉडल की जरूरत है जिसमें 'स्वयं’ और 'दीक्षा’ जैसे प्लेटफार्म महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. आगे की चुनौतियां काफी ज्यादा हैं क्योंकि 66 फीसद भारतीय स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव है. जहां एनईपी अनुसंधान लागत में सुधार पर जोर देता है, वहीं न तो केंद्र और न ही राज्यों ने शोध के लिए फंडिंग में अच्छी खासी बढ़ोतरी की है.
उच्च गुणवत्ता के अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उद्योग के साथ सहयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. एनईपी का विजन ज्यादा लर्नर केंद्रित संस्कृति का है जिसमें छात्रों, शिक्षकों और प्रशासकों की मानसिकता में काफी ज्यादा सुधार की जरूरत है. इस परिवर्तन में अनुकूल व्यापक शिक्षण और सीखने के तरीके शामिल हैं. लिहाजा शिक्षकों को इन मांगों को पूरा करने के लिए नए कौशल में प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है.
दुनिया में भविष्य की मांगों के अनुसार छात्रों को तैयार करने में स्टेम (विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित) शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका पर सहमति बढ़ रही है. एनईपी का जोर है कि स्टेम शिक्षा को छात्रों की अहम सोच, समस्या-समाधान कौशल और इनोवेशन बढ़ाने के लिए पाठ्य सामग्री के साथ एकीकृत किया जाए. यूनेस्को की एक रिपोर्ट में प्रमुखता से बताया गया है कि भारत में दुनिया भर के सबसे अधिक स्टेम स्नातक हैं जो स्टेम क्षेत्र से आने वाले सभी स्नातकों का 34 फीसद है.
अच्छी बात यह है कि इनमें 40 फीसद से अधिक महिलाएं हैं. लेकिन इनमें से ज्यादातर स्नातकों के पास भविष्य के रोजगार के लिए जरूरी कौशल का अभाव है. इस कौशल अंतर से निबटने के लिए काम करते हुए सीखने का अनुभव और आधुनिक टेक्नोलॉजी से परिचित कराना महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) का अनुमान है कि भारत में कौशल प्रशिक्षण में सुधार करने से 2025 तक जीडीपी में एक ट्रिलियन डॉलर का योगदान हो सकता है.
हुनर पैदा करना जरूरी
केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने कौशल विकास की समस्या से निबटने को चुनौती के रूप में लिया है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रोजगार से जुड़ी पांच बड़ी योजनाओं के 'प्रधानमंत्री के पैकेज’ की घोषणा की है जिसके लिए अगले पांच साल में रोजगार सृजन और 4.1 करोड़ युवाओं को कुशल बनाने के लिए दो लाख करोड़ रुपए का महत्वाकांक्षी परिव्यय रखा गया है.
इनमें से दो बड़ी योजनाओं का फोकस कौशल पर जोर है जिनमें सबसे अधिक महत्वाकांक्षी इंटर्नशिप अवसर शुरू करने की है. इसके तहत देश की 500 शीर्ष कंपनियों में पांच साल के दौरान एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप अवसर मुहैया कराए जाने हैं. 21 से 24 वर्ष की आयु के युवा, जो न तो पूरी तरह रोजगार में हैं और न ही पूरी तरह शिक्षा में, इसमें आवेदन कर सकते हैं. स्कीम में 5,000 रु. का मासिक इंटर्नशिप भत्ता शामिल है. इन पांच साल की कुल लागत 63,000 करोड़ रुपए है.
कौशल पर अन्य बड़ी पहल में 1,000 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आइटीआइ) को अपग्रेड करना है जिसके लिए हब और स्पोक मॉडल (साइकिल के पहिए जैसा) का इस्तेमाल किया जाएगा और उद्योग की जरूरतों के अनुसार उनकी पाठ्य सामग्री को बनाया जाएगा. योजना में 200 हब और 800 स्पोक आइटीआइ का विकास करना शामिल है जिन पर पांच साल के दौरान 60,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाने हैं. अन्य पहल के साथ यह स्वागत योग्य कदम है जिनमें भारत के शिक्षा में वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनने की संभावना है, साथ ही उस पीढ़ी को कौशल और ज्ञान से सज्जित करने की जो 21वीं सदी में भारत को वृद्धि और इनोवेशन की राह पर बढ़ा सके.
हालांकि भारत में दुनिया के सबसे अधिक स्टेम स्नातकहैं, इनमें से कई में रोजगार के लायक कौशल की कमी है. इस कौशल अंतर को दूर करने की कुंजी काम करते हुए अनुभव और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उपलब्ध कराना है. भारत की कम ही उच्च शैक्षणिक संस्थाएं वैश्विक रैंकिंग में अच्छी स्थिति हासिल करती हैं, इसकी वजह भारत का अनुसंधान क्षेत्र में पिछड़ना है जो आरऐंडडी में जीडीपी का 1 फीसद से भी कम आवंटित करने से और खराब हुई है.