भारत में उद्योगों की सफलता के लिए रिसर्च पर ध्यान देने की जरूरत, एक्सपर्ट आर्थिक विकास के लिए और क्या सुझाते हैं?

भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में वैश्विक दिग्गज बनने की क्षमता है, इसके लिए हमारी इंडस्ट्री को आगे की ओर साहसिक कदम उठाने होंगे और सरकार को एक कदम पीछे हटना होगा

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास

इंडिया टुडे के इस विशेष अंक में पूछा गया है: भारत वैश्विक दिग्गज कैसे बन सकता है? इसमें कोई शक नहीं है. अगर हम 6.5 फीसद की दर से बढ़ते रहे, जो पिछले 30 साल से औसत वृद्धि है, तो हम जल्द ही दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होंगे. हम 2047 तक दुनिया की सबसे बड़ी आबादी होने की वजह से एक विशाल अर्थव्यवस्था बन जाएंगे. लेकिन हम तब तक अमीर नहीं होंगे—एक उच्च-मध्यम आय वाले देश के रूप में, हम आज की विकसित दुनिया से काफी नीचे होंगे. बेहतर करने के लिए हमें मैन्युफैक्चरिंग और भारतीय फर्मों की महत्वाकांक्षा को विकास के केंद्र में रखना होगा.

सबसे पहले, नीति के बारे में दो टूक: यह कोई ऐसा लेख नहीं है जिसमें तर्क दिया गया हो कि सरकार को चीजों की एक सूची बनानी चाहिए. मेरे ख्याल से सरकार की भूमिका केवल उन चीजों तक ही सीमित रहना है जो केवल वह कर सकती है. मैन्युफैक्चरिंग में, राज्य को मुख्य रूप से हस्तक्षेप न करने वाला दृष्टिकोण अपनाना चाहिए—टेक्नोलॉजी, फर्मों का चयन न करें, विशेष उद्योगों को बढ़ावा न दें और विशेष क्षेत्रों को प्रोत्साहित न करें. यानी, भारतीय उद्योग को सक्षम बनाएं; विजेताओं को चुनने की कोशिश न करें. हमारी औद्योगिक नीति को जर्मनी जैसा भविष्य तलाशना चाहिए, जिसमें हजारों विशेषज्ञ ग्लोबल लीडर हों, न कि चीन या दक्षिण कोरिया की तरह जिनमें से प्रत्येक में कुछ दर्जन विशाल राज्य-प्रायोजित चैंपियन हों.

लेकिन अगर मैं जल्दी से एक महाशक्ति बनाने के लिए राज्य के कम दखल चाहता हूं, वहीं मैं भारतीय उद्योग से ज्यादा से ज्यादा की मांग करता हूं. जैसा कि मैंने अपनी किताब, 'द स्ट्रगल ऐंड द प्रॉमिस: रिस्टोरिंग इंडियाज पोटेंशियल' में तफसील से दलील पेश की है. भारतीय उद्योग को आई (अंग्रेजी अक्षर) से शुरू होने वाले चार शब्दों को ज्यादा से ज्यादा आत्मसात करने की कोशिश करनी चाहिए: इन्क्लूसिव (समावेशी), इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय), इनोवेटिव (नवाचारी) और इंडीपेंडेंट (आजाद).

नौशाद फोर्ब्स

समावेशी: 1990 और 2000 के दशक में, भारतीय उपभोक्ता वस्तु (कंज्यूमर गुड्स) उद्योग जीडीपी के मुकाबले ज्यादा दर से बढ़ा. हालिया आर्थिक सर्वेक्षण इशारा करता है कि खपत 4 फीसद की दर से बढ़ रही है, जो जीडीपी वृद्धि दर का लगभग आधा है. यह समावेशन की नाकामी है. हमारे पास लाखों लोग हैं जो पहली बार रेस्तरां में खाना, रेफ्रिजरेटर खरीदने, अस्पताल की सेवाएं लेने, छुट्टियां, मोटरसाइकिल, रेडीमेड कपड़े और टूथपेस्ट खरीदने के लिए उत्सुक हैं. हमें 70 करोड़ और लोगों को उपभोक्ता वर्ग में लाने की जरूरत है. अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम भारतीय उद्योग के लिए धन पैदा करेंगे. इसके लिए भारतीय उद्योग को अपने दरवाजे से परे हर काम में कौशल और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना होगा. 2024 का बजट इंटर्नशिप के लिए प्रोत्साहन के साथ इस गतिविधि का समर्थन करता है; स्कूल के नतीजो में सुधार करना और अपनी आबादी को हुनरमंद बनान हमारे सामूहिक औद्योगिक हित में है.

अंतरराष्ट्रीय: भारतीय फर्मों को दुनिया भर के ब्रांडों और बाजारों में निवेश कर तेजी से काम करना चाहिए. जैसा कि मार्टिन वुल्फ ने हाल में दिल्ली में एक बातचीत में बताया, अगर हमारा व्यापार जीडीपी अनुपात उसी स्तर पर रहता है तो भारतीय फर्मों को 20 साल में हमारे कुल मौजूदा जीडीपी से ज्यादा निर्यात करने की उम्मीद करनी चाहिए.

लेकिन क्या हम ऐसा करने के लिए तैयार हैं? क्या हमारे पास दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फर्मों (हां, चीनी सहित) को हमारे बाजार में निवेश करने और बेचने की इजाजत देने का आत्मविश्वास है क्योंकि हम उनके इनपुट का उपयोग मूल्य जोड़ने और दुनिया भर में अपने सामान का निर्यात करने के लिए करते हैं? क्या हम अपने वाणिज्य मंत्रालय को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ तरजीही व्यापार समझौते करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जो बाजार अगले 20 साल के लिए दुनिया के विकास का सबसे बड़ा हिस्सा बनेंगे? भारतीय उद्योग का दुनिया भर में स्वागत किया जाता है. हमें (अपने उत्तरी पड़ोसी के उलट) सौम्य के रूप में देखा जाता है. हमें अपने स्वागत का लाभ उठाना चाहिए.

नवाचार: भारतीय उद्योग हमारे विकास के स्तर पर अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा हुनर और पूंजी-प्रधान है. इसलिए, औद्योगिक सफलता के लिए आरऐंडडी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. आरऐंडडी में भारतीय उद्योग का निवेश सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.3 फीसद है. हमें इसे 1.5 फीसद के दुनिया के औसत से मेल खाने के लिए कई गुना बढ़ाने की जरूरत है. मैंने अपनी पुस्तक और 'बिजनेस स्टैंडर्ड' के लिए अपने कॉलम दोनों में इस बारे में तफसील से लिखा है. मैं यहां एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं: महत्वाकांक्षा. क्या हम भारतीय जड़ों वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में विश्व नेतृत्व की आकांक्षा रखते हैं? क्या हमने ऐसे उत्पाद और सेवाएं विकसित की हैं जो वास्तव में दुनिया का नेतृत्व करती हैं, जो किसी भी अन्य फर्म के मुकाबले उपभोक्ताओं और उद्योग की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा करती हैं? और क्या हम वैश्विक मांग को पूरा करने की क्षमता वाले दुनिया के अग्रणी मैन्युफैक्चरिंग संयंत्रों में जमीनी स्तर पर निवेश के साथ नेतृत्व करने की उस महत्वाकांक्षा का समर्थन कर रहे हैं?

आजाद: दशकों के लाइसेंस राज ने निजी क्षेत्र को जन्म दिया जो सुरक्षा और एहसानों के लिए सरकार की ओर देखता था. सरकार पर निर्भर निजी क्षेत्र आजाद आवाज के साथ बात नहीं कर सकता. लाइसेंस राज 1991 के बाद पीछे हट गया, लेकिन उद्योग की ओर से सरकार को दिए जाने वाले सम्मान का खुमार अब भी बना हुआ है. हमें सरकार के साथ बराबरी का बर्ताव करना चाहिए, जहां तारीफ जरूरी है, वहां तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन जब आलोचना की जरूरत हो तो आलोचना करनी चाहिए. हमें सरकार से चीजें मांगना बंद कर देना चाहिए. सरकार को उद्योग पर भरोसा करना चाहिए कि वह सही काम करेगा. और उद्योग को उस भरोसे का बेहतर सिला देना चाहिए. उद्योग और सरकार को एक-दूसरे के प्रति उतना ही सख्त, जवाबदेही की मांग करने वाला और क्षमाशील होना चाहिए जितना वे परस्पर सम्मान करते हैं.

लंबी छलांग

> हमारी औद्योगिक नीति को जर्मनी जैसा भविष्य देखना चाहिए जहां हजारों स्पेशलाइज्ड वर्ल्ड लीडर हैं न कि चीन और दक्षिण कोरिया की तरफ देखना चाहिए जहां कुछ दर्जन सरकार प्रायोजित चैंपियन हैं

> भारतीय उद्योग को इन चार अंग्रेजी के आइ अक्षर से शुरू होने वाले शब्दों-इन्क्लूसिव, इंटरनेशनल, इनोवेटिव और इंडिपेंडेंट-को ज्यादा अमल में लाना चाहिए

> हमें सरकार के साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहिए, जहां तारीफ की जरूरत हो वहां तारीफ और जहां आलोचना आवश्यक हो वहां आलोचना करनी चाहिए

- नौशाद फोर्ब्स

लेखक फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन और सीआइआइ के पूर्व अध्यक्ष हैं. उनकी किताब 'द स्ट्रगल ऐंड द प्रॉमिस: रिस्टोरिंग इं‌डियाज पोटेंशियल' हार्पर कॉलिन्स से प्रकाशित हुई है

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