विशेष दर्जा ना देकर भी बजट 2024 में नीतीश-नायडू का एनडीए ने रखा 'विशेष' ध्यान
उनके राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा भले न मिला हो लेकिन भाजपा के सहयोगी दलों पर बजट में मेहरबानी की तगड़ी बारिश हुई

रिटर्न गिफ्ट या तुष्टीकरण की राजनीति कुछ भी कह लीजिए. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो प्रमुख सहयोगी दलों की अगुआई वाले राज्यों—आंध्र प्रदेश और बिहार पर अच्छे-खासे वित्तीय आवंटनों की बौछार कर दी. मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार ने अचानक मिली इन सौगातों का स्वागत किया तो विपक्ष शासित राज्यों ने यह कहकर इसकी आलोचना की कि यह भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एडीए) को मिले उनके समर्थन के बदले में दिया गया पुरस्कार है.
हाल के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए के पाले में लौटे नायडू और नीतीश ने अपने राज्यों के लिए प्राथमिकतापूर्ण व्यवहार की मांग करने से कभी संकोच नहीं किया. मसलन, प्राथमिकता के आधार पर केंद्रीय अनुदान पाने की खातिर उन्होंने विशेष राज्य के दर्जे के लिए बार-बार दबाव डाला. चुनाव में मजबूत प्रदर्शन करने वाली नायडू की अगुआई वाली तेलुगु देशम पार्टी ने 16 सीटें और नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) ने 12 सीटें जीतीं, इससे उन्हें सौदेबाजी के और ज्यादा मौके मिल गए.
आंध्र की सत्ता में भी धमाके के साथ लौटे नायडू राजधानी शहर अमरावती की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना को जिलाने के लिए केंद्रीय धन की मांग करते रहे थे. राज्य का बंटवारा होने के फौरन बाद नायडू पिछले कार्यकाल (2014-19) में सत्ता में आए थे. उस वक्त साझा राजधानी हैदराबाद भौगोलिक रूप से तेलंगाना में मिला दी गई थी. तब नायडू ने अमरावती को आंध्र प्रदेश का ग्रीनफील्ड राजधानी शहर बनाने की परिकल्पना की थी. पर 2019 में वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी के सत्ता में आने के बाद परियोजना उपेक्षा का शिकार हो गई.
केंद्रीय बजट पेश करते हुए सीतारमण ने राज्य के लिए राजधानी की जरूरत को 'माना’ और कहा, "हम बहुपक्षीय विकास एजेंसियों के माध्यम से विशेष वित्तीय सहायता को सुगम बनाएंगे." उन्होंने भविष्य में 'अतिरिक्त धनराशि के साथ’ मौजूदा वित्त वर्ष में 15,000 करोड़ रुपए देने का वादा किया. नायडू को यकीन है कि धन के आने से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी और राज्य को बेहद जरूरी कर राजस्व कमाने में भी मदद मिलेगी. यह उस राज्य के लिए बेहद अहम है जिसका सार्वजनिक कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 33.32 फीसद है. नायडू ने मीडियाकर्मियों से कहा, "फंड जिस भी रूप में आएं, वे राज्य के लिए बहुत उपयोगी होंगे...और राजधानी शहर को नए सिरे से खड़ा करने में मदद करेंगे."
नायडू की दूसरी सबसे बड़ी प्राथमिकता पोलावरम बिजली-सह-सिंचाई परियोजना को समय से पूरा करना है. उसके लिए केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपए तय किए हैं. जमीनी आकलन से पता चलता है कि अगर परियोजना को नायडू के मौजूदा कार्यकाल में पूरा करना है तो अगले चार साल में कम से कम 12,175 करोड़ रुपए की और जरूरत होगी.
आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 के तहत जो अन्य वादे पूरे किए जाने हैं—मसलन, पिछड़े इलाकों रायलसीमा, उत्तर तटीय आंध्र और दक्षिण तटीय प्रकाशम के विकास के लिए अनुदान—उन्हें भी सीतारमण के बजट भाषण में जगह मिली. हालांकि बजटीय आवंटनों का साफ जिक्र नहीं था. नायडू 4 जुलाई को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले, उन्होंने 'संसाधनों की तीव्र कमी’ को पूरा करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपए के रिकवरी पैकेज की मांग की थी. उन्होंने सड़क, पुल और सिंचाई सरीखे अनिवार्य क्षेत्रों का लक्ष्य साधते हुए प्रधानमंत्री से 'पूंजी निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता’ योजना के तहत अतिरिक्त आवंटन पर विचार करने का भी आग्रह किया था.
वित्तीय विश्लेषकों के मुताबिक, विभिन्न मदों के तहत आवंटनों की गणना से पता चलता है कि राज्य को कुल करीब 65,000 करोड़ रुपए मिलने जा रहे हैं. इनमें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 12,000 करोड़ रुपए और पिछड़े इलाकों के उत्थान के लिए 4,000 करोड़ रु. का अनुदान शामिल है. अन्य अनुमानित आवंटनों में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 3,500 करोड़ रुपए, नए मेडिकल कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थान खोलने के लिए 2,500 करोड़ रुपए और जल जीवन मिशन के तहत 2,000 करोड़ रु. शामिल हैं.
इसके उलट बिहार में, जहां राज्य विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, केंद्र की तरफ से दिए जाने वाले धन के बारे में ज्यादा स्पष्टता है और रकम है 58,900 करोड़ रुपए. इनमें पटना-पूर्णिया एक्सप्रेसवे और बक्सर-भागलपुर एक्सप्रेसवे सहित सड़क इन्फ्रा परियोजनाओं के लिए 26,000 करोड़ रु. शामिल हैं.
भागलपुर जिले के पीरपैंती में लग रहे 2,400 मेगावॉट के ताप बिजली संयंत्र के लिए 21,400 करोड़ रु. और बाढ़ नियंत्रण उपायों के लिए 11,500 करोड़ रुपए दिए गए हैं. सीतारमण ने गया के विष्णुपद मंदिर और बोधगया के महाबोधि मंदिर के लिए कॉरिडोर परियोजनाओं का भी ऐलान किया, जो 'कामयाब काशी विश्वनाथ मंदिर गलियारे की तर्ज पर’ बनेंगे. 'ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय के जीर्णोद्धार की कोशिशें’ भी की जाएंगी. सोच इन्हें 'विश्वस्तरीय तीर्थ और पर्यटन स्थलों’ में बदलने की है.
नीतीश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इन घोषणाओं की तारीफ की. उन्होंने लिखा: "केंद्र सरकार की तरफ से पेश बजट सकारात्मक और स्वागतयोग्य है. बिहार की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया गया है. मानव संसाधन विकास और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया गया है..." उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार राज्य की दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके विकास में इसी तरह सहयोग करती रहेगी.
मगर नीतीश को फिर भी विपक्ष का यह ताना सहना पड़ा कि वे बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा या उसके समकक्ष मौद्रिक सहायता हासिल करने में नाकाम रहे. करीब 54,000 करोड़ रु. प्रति व्यक्ति जीडीपी के साथ बिहार भारत के सबसे गरीब राज्यों में से एक है. नीतीश 2010 से ही राज्य के लिए विशेष दर्जे की मांग करते रहे हैं. उनकी मौजूदा मांग 2023 के बिहार जाति सर्वेक्षण के इस खुलासे से उपजी है कि राज्य की 34.13 फीसद आबादी प्रति माह 6,000 रुपए से कम पर गुजारा कर रही है.
जद (यू) और राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन की पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे और अब नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने बजट घोषणाओं को 'निराशाजन’ बताया. उन्होंने एक्स पर लिखा: "पलायन को रोकने, राज्य का पिछड़ापन दूर करने और युवाओं के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की खातिर हम विशेष श्रेणी के दर्जे की अपनी मांग से एक इंच पीछे नहीं हटेंगे." उनकी पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''बिहार को अपने 94 लाख गरीब परिवारों की मदद के लिए 2.5 लाख करोड़ रु. की जरूरत है. तेजस्वी जिस (नीतीश) सरकार में उपमुख्यमंत्री थे, उसने बेघरों के लिए 1.2 लाख करोड़ रु. और सतत आजीविका योजना के तहत वित्तीय सहायता बढ़ाने का वादा किया था. केंद्र ने महज बजटीय आवंटन का वादा किया है, लेकिन गरीबों का क्या?’’
नीतीश के लिए शायद यह तसल्ली की बात हो कि लंबे वक्त से इसकी वकालत करने के बावजूद तमाम आर्थिक समस्याओं की रामबाण दवा के तौर पर विशेष दर्जे का नैरेटिव जातिगत पहचानों में गहराई से बंटे राज्य में भावनात्मक चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. लिहाजा बिहार के लिए की गई अहम वित्तीय प्रतिबद्धताओं और भविष्य में भी ऐसे ही केंद्रीय आवंटनों की संभावना पर जोर देना उनकी राजनैतिक पूंजी बढ़ाने के लिए शायद काफी हो.
केंद्रीय बजट में बिहार और आंध्र प्रदेश के प्रति दिखाई गई दरियादिली ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में गठबंधन की राजनीति के अक्सर लेन-देन वाले स्वरूप को प्रमुखता से सामने रखा है. इससे भारत के संघीय ढांचे के भीतर संसाधनों के समान वितरण को लेकर चल रहा विमर्श तेज होगा. खीझ से भरे तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने ध्यान दिलाया कि सीतारमण के भाषण में उनके राज्य का कोई जिक्र नहीं था, बावजूद इसके कि 2014 के पुनर्गठन अधिनियम का उनसे भी उतना ही वास्ता था जितना आंध्र प्रदेश से. रेड्डी ने कहा, "नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार को नायडू और नीतीश का समर्थन बरकरार रखने के बदले आंध्र प्रदेश और बिहार को परियोजनाएं देने का सौदा किया है."
वे अब सभी दूसरे विपक्ष-शासित दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने का मंसूबा बना रहे हैं. उन्होंने और उनके समकक्षों—कर्नाटक के सिद्धरामैया, तमिलनाडु के एम.के. स्टालिन और केरल के पिनाराई विजयन—ने 27 जुलाई को मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करने का भी फैसला किया. हालांकि यह आत्मघाती साबित हो सकता है क्योंकि ऐसे वक्त जब विपक्ष ने अंतत: एकजुट आवाज हासिल कर ली है, वह इस मौके का इस्तेमाल नई दिल्ली से मिलने वाली धनराशियों की तर्कसंगत समीक्षा के पक्ष में मजबूत दलील सामने रखने के लिए कर सकता था. बहिष्कार से राजनैतिक अभद्रता का आरोप शायद उन पर ही चिपकेगा.
