प्रधान संपादक की कलम से

कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट 2024 एक स्वागतयोग्य बजट है. इसमें ऐसा कोई झटका नहीं जो भारत के जीडीपी के प्रभावी वृद्धि के सफर को डगमगा दे. इसने लोक-लुभावनवाद के आगे घुटने भी नहीं टेके

इंडिया टुडे कवर : बजट नई पीढ़ी का
इंडिया टुडे कवर : बजट नई पीढ़ी का

- अरुण पुरी

हाल के जिस चुनाव में एनडीए ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया, उसका सबसे ज्वलंत मुद्दा बेरोजगारी था. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पर ध्यान देते हुए 2024 के बजट में 'नौकरियों के सृजन' पर खासा जोर दिया है. वर्ल्ड क्लाउड के विश्लेषण से पता चलता है कि उन्होंने पिछले साल के बजट भाषण में तीन बार 'रोजगार' शब्द का जिक्र किया था, इस साल 23 बार किया.

मुश्किल मसले से बिल्कुल सीधे और आत्मविश्वास से निबटते हुए उन्होंने पांच साल में 2 लाख करोड़ रुपए के खर्च से 4.1 करोड़ युवाओं को लक्ष्य करते हुए नवोन्मेषी पांच सूत्री रास्ते का ऐलान किया. समस्या का पैमाना बहुत बड़ा है—आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 का अनुमान है कि भारत का मौजूदा कार्यबल 56.5 करोड़ है. इनमें से 45 फीसद से ज्यादा कृषि में लगे हैं. वे जीडीपी में बमुश्किल 18.2 फीसद का योगदान देते हैं.

इसका बहुत बड़ा हिस्सा सेवाओं, मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण से आता है, जिसमें श्रमिक करीब 55 फीसद हैं. इसलिए कृषि के मुकाबले उत्पादक क्षेत्रों की तरफ श्रम का निर्णायक बदलाव ही प्रच्छन्न/अल्परोजगार से निबट सकेगा. सर्वे मानता है कि कार्यबल में आने को तैयार सभी लोगों को रोजगार देने के लिए भारत को गैर-कृषि क्षेत्रों में 2030 तक हर साल करीब 80 लाख नौकरियों का सृजन करना होगा.

यहां समस्या पैमाने से आगे चली जाती है—सर्वे के मुताबिक हुनरमंद श्रमिकों की तगड़ी मांग के सामने भारतीय कॉलेजों से निकले दो युवाओं में से मात्र एक रोजगार लायक है. दूसरे इसलिए 'बेरोजगार माने जाते' हैं क्योंकि उनमें 'आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हुनर' नहीं. सो, नौकरियों का सृजन ही नहीं करना, टेक्नोलॉजी के तेज-रफ्तार बदलावों और नए से नए हुनरों से परिभाषित नौकरियों के बाजार के लिए युवा कार्यबल को साथ ही साथ तैयार करना है.

आर्थिक वृद्धि को तेज करने के अहम उपायों की शुरुआत करते हुए बजट 2024 कम कॉर्पोरेट करों के सहउत्पाद के रूप में नौकरियों के सृजन का पीछा करने के विफल प्रतिमान से आगे जाता है. इसके बजाय मोदी सरकार ने भर्ती के लिए सीधे प्रोत्साहन लाभ देकर थोड़े अनजान इलाके में कदम रखा है. ऐसा करते हुए वह उद्देश्यों की तिकड़ी हासिल करना चाहती है.

पांच सूत्री रोजगार पैकेज एक स्तर पर हुनर या कौशल पूल को उन्नत बनाने पर और दूसरे स्तर पर निजी कंपनियों के लिए रोजगार से जुड़े प्रोत्साहनों (ईएलआई) पर जोर देता है. वहीं वह नए भर्ती सभी लोगों को ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) के दायरे में लाकर अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने का जतन करता है.

पांच में से तीन योजनाएं ईएलआई के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. पहली में सरकार नए भर्ती लोगों को उनकी एक महीने की तनख्वाह अधिकतम 15,000 रुपए तक तीन किस्तों में देगी. इसका मकसद उनके आने-जाने और रहन-सहन के खर्चों को पूरा करना है. महीने में 1 लाख रुपए की वेतन पात्रता सीमा के साथ इसका फायदा 2.1 करोड़ युवाओं को मिलने की उम्मीद है, जबकि सरकारी खजाने पर कुल 23,000 करोड़ रुपए की लागत आएगी.

दूसरी योजना मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नौकरियों का सृजन तेज करने की कोशिश करती है. इसमें फायदे पहली बार भर्ती युवाओं और नियोक्ता दोनों को दिए जाएंगे, जो रोजगार के पहले चार साल ईपीएफओ में उनके योगदान के अनुरूप होंगे. खजाने से 52,000 करोड़ रुपए के खर्च के साथ लाभार्थियों की अपेक्षित संख्या—30 लाख युवा और उनके नियोक्ता—से एक बार फिर हमें रोजगार सृजन के लक्ष्य का अंदाजा लगता है.

तीसरी योजना तमाम क्षेत्रों के नियोक्ताओं को 'अतिरिक्त' कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रोत्साहन लाभ देती है, जो 1 लाख रुपए प्रति माह वेतन के भीतर होगी, और जरूरी नहीं कि वे पहली बार नियुक्त हो रहे हों. सरकार हर अतिरिक्त कर्मचारी के लिए नियोक्ताओं को ईपीएफओ में उनके अंशदान के वास्ते दो साल तक 3,000 रुपए महीने की प्रतिपूर्ति करेगी. योजना का फायदा 50 लाख भर्ती लोगों को मिलने की उम्मीद है. लागत है 32,000 करोड़ रुपए.

रोजगार पैकेज की सबसे महत्वाकांक्षी शायद चौथी योजना है. यह पूरे पांच साल 1 करोड़ युवाओं के लिए 500 शीर्ष कंपनियों में साल भर की इंटर्नशिप की परिकल्पना करती है, जिसमें 5,000 रुपए का मासिक भत्ता और एक बार 6,000 रुपए की सहायता दी जाएगी. स्वेच्छा से आगे आने वाली कंपनियों से अपेक्षा की गई है कि प्रशिक्षण का काफी कुछ खर्च अपने सीएसआर फंड से करेंगी.

यह बोझ निजी क्षेत्र पर डाल देने का तरीका है क्योंकि सरकार की कई कौशल विकास योजनाओं का कम ही कुछ असर हुआ है. इस योजना से सरकार पर 63,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा. पांचवीं योजना में केंद्र ने 1,000 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आइटीआइ) को अगले पांच साल के दौरान हब और स्पोक व्यवस्था में उन्नत बनाकर अंतत: अपने कौशल विकास कार्यक्रमों को सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाया है. लागत का 50 फीसद हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जिस पर 30,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा, राज्य 33.3 फीसद का योगदान देंगे, और बाकी कंपनियों के सीएसआर फंड से आएगा. 

इन योजनाओं के नतीजे देने से पहले स्वाभाविक रूप से इनकी तैयारी में वक्त लगेगा. इसलिए मोदी सरकार ने कुछ और जोखिम भरे दांव लगाए हैं. उसने एक नई कर्ज गारंटी योजना और अबाध कर्ज सुविधा पक्की करने के लिए एक और औपचारिक तंत्र के साथ मध्यम, छोटे और बहुत छोटे उद्यमों (एमएसएमई) की बड़ी दुनिया में नए रक्त का संचार किया है, जहां नौकरियों के मामले में मजबूत आंकड़े पैदा किए जा सकते हैं.

प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 2.0 के तहत मकानों के निर्माण को 2.2 लाख करोड़ रु. की खुराक से निर्माण क्षेत्र में बहुत सारी नई नौकरियों के सृजन की उम्मीद है. स्टार्ट-अप को प्रोत्साहन देने के लिए एंजेल टैक्स हटा दिया गया है. छोटे उद्यमियों के लिए मुद्रा कर्ज की सीमा 20 लाख रु. कर दी गई है. अन्य मोर्चों पर बजट 2024 निरंतरता और राजकोषीय समझदारी का दस्तावेज है.

सराहनीय है कि यह राजकोषीय घाटे को बरदाश्त के दायरे के भीतर रखते हुए बुनियादी ढांचे और जनकल्याण पर मोदी के जोर देने की राह पर कायम है. युवाओं के लिए नौकरियों पर जोर दिए जाने के कारण हमारे आवरण पैकेज का शीर्षक 'बजट नई पीढ़ी का' है. अलबत्ता कुछ चीजें गायब भी हैं. विनिवेश और परिसंपत्तियों के मौद्रिकीकरण की योजना में निरंतरता का अभाव है. गठबंधन की बाध्यताओं के कारण या विपक्ष के जोरदार हमले के डर से यह ध्यान से उतर गया लगता है. भाजपा के गठबंधन में बिहार और आंध्र प्रदेश के साथी दलों को दी गई विशेष सौगातों के लिए सरकार को विपक्ष की तीखी आलोचना झेलनी पड़ी.

कुल मिलाकर, यह स्वागतयोग्य बजट है. इसमें ऐसा कोई झटका नहीं जो भारत के जीडीपी के प्रभावी वृद्धि के सफर को डगमगा दे. इसने लोक-लुभावनवाद के आगे घुटने भी नहीं टेके. सबसे अहम, इसने हमारी अत्यंत विशाल मानव पूंजी को विकसित करने का लंबे वक्त का नजरिया अपनाया, जिसके बिना कोई विकसित भारत नहीं हो सकता.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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