भारतीय न्याय संहिता में रेप पीड़ित पुरुषों के लिए न्याय का प्रावधान क्यों नहीं?

आइपीसी की धारा 377 महिला, पुरुष और जानवरों के साथ हुए अप्राकृतिक यौनाचार को अपराध बनाती थी लेकिन यह बीएनएस में नहीं रही, धारा में सुधार के बजाय इसका पूरी तरह खत्म हो जाना पुरुषों के रेप को कानूनन गुनाह के दायरे से बाहर कर देता है

एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लोग मासिक पेंशन देने की मांग को लेकर 14 जुलाई को पटना में प्रदर्शन करते हुए
एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लोग मासिक पेंशन देने की मांग को लेकर 14 जुलाई को पटना में प्रदर्शन करते हुए

हरियाणा के गुड़गांव निवासी विश्व पल्लव श्रीवास्तव जगजाहिर समलैंगिक या ओपनली गे हैं. 1 जुलाई से लागू नए कानूनों में आइपीसी की धारा 377 की गैरमौजूदगी को लेकर वे बहुत चिंतित हैं. वे कहते हैं, "जो पुरुष थोड़े अलग दिखते हैं उनको लोग छक्का, स्वीट वगैरह बोलकर तंग करते हैं. तिसपर जो ओपनली गे हैं, उनका अक्सर तथाकथित स्ट्रेट लड़के फायदा उठाते हैं. बहुत बार ऐसा होता है कि जो शख्स अधिक फेमिनिन लगते हैं, उनके साथ पुरुषों द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने की घटनाएं होती हैं."

श्रीवास्तव कानूनी रूप से असहाय हो चुके इस समुदाय को लेकर यह भी कहते हैं, "यह बहुत साधारण सी बात है, फिर भी सरकार ने इसका ध्यान नहीं रखा है. पुरुषों के साथ हुई यौन शोषण की घटनाएं पहले भी बहुत कम रिपोर्ट होती थीं. अब तो इनकी शिकायत करने का भी स्कोप खत्म हो गया है. सहमति या असहमति का भेद नहीं है. सेक्स के साथ गे रेप भी लीगल हो गया है."

विश्व पल्लव की यह फिक्र जायज है. भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) को 30 जून को रात 12 बजे से खत्म कर दिया गया और 1 जुलाई से इसकी जगह लागू हो गई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस). आइपीसी की धारा 377 महिला, पुरुष और जानवरों के साथ हुए 'अप्राकृतिक' यौनाचार को अपराध बनाती थी लेकिन यह बीएनएस में नहीं रही. हालांकि यह धारा की खामी ही थी कि सहमति और असहमति, दोनों से ही बने समलैंगिक यौन संबंधों को वह अप्राकृतिक मानती थी. धारा में सुधार के बजाए इसका पूरी तरह खत्म हो जाना अब पुरुषों के साथ जबरन एनल सेक्स को कानूनी दायरे से बाहर कर देता है.

चिंता आदमियों के अलावा जानवरों की भी उतनी ही बड़ी है. जानवरों के लिए काम करने वाली संस्था पीपल फॉर इथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पीईटीए या पेटा) ने दिसंबर 2023 में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र भेजकर बीएनएस से जानवरों के यौन शोषण से जुड़े प्रावधान को हटाने पर गहरी चिंता जाहिर की थी. आइपीसी की धारा 377 में ही जानवरों के साथ यौन कृत्य गैर जमानती अपराध था जिसमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान था. जानवरों के साथ होने वाले यौन अपराधों में कोई चाहकर भी न्याय की पहल तक नहीं कर सकेगा. लेकिन इस पर कोई भी बात नहीं कर रहा. शायद सरकार ने इसके बारे में सोचा भी नहीं होगा.

एलजीबीटीक्यू+ (लेस्बियन, गे, ट्रांस, क्वियर+) समुदाय के लोगों के लिए काम करने वाले समाजसेवी संगठन नाज फाउंडेशन की संस्थापक अंजलि राजगोपालन कहती हैं, "हमें कोर्ट में जाना होगा. सरकार से बात करनी होगी और समाज को भी आवाज उठानी होगी. लेकिन इस पर कोई बात ही नहीं हो रही है."  गोपालन खुलकर कहती हैं, "मेल टु मेल रेप होता है और हमारे कानूनों को जेंडर न्यूट्रल होना चाहिए. एक आदमी को दूसरे आदमी से खतरा है. बलात्कार से जुड़े मौजूदा कानून जेंडर न्यूट्रल नहीं है."

बीएनएस के बलात्कार से जुड़े कानूनों का जेंडर न्यूट्रल (सभी लिंग के लोगों पर लागू होने वाला) न होना ही समस्या की जड़ है. दिल्ली हाइकोर्ट के वकील ज्ञानंत सिंह कहते हैं, "बीएनएस तैयार करने की प्रक्रिया में धारा 377 को उसके तब के स्वरूप में बरकरार रखना शायद संभव नहीं था क्योंकि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए अलग से कानून बना दिए गए. आइपीसी की धारा 375 से 377 तक बलात्कार के प्रावधान थे जो कि निर्भया की घटना के कुछ समय बाद तक चले. इसके बाद इसमें बहुत सारे संशोधन कर बलात्कार का दायरा बहुत बढ़ा दिया गया. इसके कुछ संशोधन धारा 377 के विरोध में आ गए." इसी बीच 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सहमति के आधार पर बने अप्राकृतिक संबंध को अपराध करार देने वाले 377 के उपबंध खत्म कर दिए. दरअसल, 377 जेंडर न्यूट्रल था. महिला के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध 375 और 377- दोनों में अपराध हो गए. 

जेंडर न्यूट्रल रेप लॉ की बहस बहुत समय से चल रही है. आइपीसी में चैप्टर 16 था, जिसमें ऐसे अपराधों का जिक्र था जो मानव शरीर को नुक्सान पहुंचाते हैं. बीएनएस में चैप्टर 5 में रेप परिभाषित है. इसका हेडनोट ही महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध है. हालांकि आइपीसी के तहत भी रेप की परिभाषा में पुरुष पीड़ित के तौर पर शामिल नहीं था. लेकिन 'अप्राकृतिक' सेक्स के दायरे में पीड़ित पुरुष को न्याय की उम्मीद थी.

धारा 377 हटने से कानून में उत्पन्न हुए शून्य को लेकर दिल्ली हाइकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस.एन. धींगरा कहते हैं, "18 साल से कम उम्र के लड़कों के साथ हुए यौनाचार के मामले पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज) ऐक्ट में आ जाएंगे लेकिन वयस्क पुरुषों से रेप होने पर पीड़ित के लिए न्याय पाने का रास्ता मुश्किल हो गया है. वैसे, पुराने कानून के तहत भी बगैर सहमति वाले मामलों में शिकायत होती थी. सिर्फ सहमति वाले उपबंध को हटाकर असहमति वाले को जारी रहने देना चाहिए था."

हालांकि, बीएनएस की धारा 142 में जबरन बंधक बनाकर पुरुषों के साथ यौनाचार अपराध है. लेकिन यह दायरा बेहद छोटा है और जो बंधक नहीं है उस पर लागू नहीं होता. 

अब सवाल उठता है कि अगर पुरुष के साथ किसी अन्य पुरुष द्वारा किए गए रेप का कोई केस पुलिस के सामने आता है तो पुलिस क्या करेगी. इस पर एक आइपीएस अफसर कहते हैं, "फिलहाल हम हर्ट यानी चोट पहुंचाने का मुकदमा लिखेंगे. चोट पहुंचाने की अलग-अलग कैटेगरी (साधारण और गंभीर) हैं, उसके मुताबिक केस दर्ज किया जाएगा. वैसे, पुलिस भी इस संबंध में अदालतों से आने वाले निर्देशों का इंतजार कर रही है."

स्पष्ट है कि अगर चोट नहीं लगी है तो पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती. चूंकि कानून नहीं है तो कोर्ट भी कुछ नहीं कर सकता. त्रासद यह भी है कि चोट और यौन शोषण में पीड़ित को हुए ट्रॉमा में कई स्तर का फर्क  है. चोट का कानून रेप के पीड़ित के साथ न्याय नहीं कर सकता. वकील ज्ञानंत सिंह कहते हैं, "ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सिर्फ सुप्रीम कोर्ट को ही कोई व्यवस्था देने का अधिकार हासिल है. इसमें प्रावधान है कि अगर कानून में कोई शून्यता है तो कोर्ट व्यवस्था दे सकता है, साथ ही, कानून में व्याख्या की गुंजाइश है तो समय की जरूरत के मुताबिक ऐसा कर किसी खास केस में राहत दी जा सकती है. अगर मेरे पास कोई ऐसा केस आया तो मैं सुप्रीम कोर्ट जाऊंगा."

कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़ी विशाखा गाइडलाइंस भी इसी अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने जारी की थीं. इसमें स्पष्ट था कि कानून बनने तक ये गाइडलाइंस लागू रहेंगी. सेक्शुअल हैरासमेंट ऑफ विमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन ऐंड रिड्रेसल) ऐक्ट, 2013 लागू हो जाने के बाद विशाखा गाइडलाइंस अब प्रभावी नहीं है.

धारा 377 के इस मुद्दे पर एक पक्ष सरकार भी है. 1 जुलाई को कानून लागू होने के बाद संवाददाता सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जब पूछा गया कि क्या धारा 377 को लेकर भी नए कानून में संशोधन होगा तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, "संशोधन तो नहीं लेकिन इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट भी है. इसकी इंटरप्रिटेशन का सवाल है, हम सुप्रीम कोर्ट से चर्चा जरूर करेंगे." हालंकि उन्होंने बीएनएस में सुधार के सुझावों का स्वागत करने की बात भी कही है.

अब बिल्कुल स्पष्ट है कि धारा 377 को लेकर संपूर्ण पुरुषों और समलैंगिक समुदाय के साथ पुलिस, सरकार और वकील, सब अदालत की तरफ देख रहे हैं. बीएनएस में 35 धाराएं महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले अपराधों पर आधारित हैं. लेकिन पुरुष के मामले में कोर्ट से आने वाली व्यवस्था का एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के साथ ही सबको इंतजार है.

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