बिहार: क्या सियासत की भेंट चढ़ जाएगा मिशन दक्ष प्रोग्राम!

पिछले साल दिसंबर में पढ़ने-लिखने में कमजोर, बिहार के 36 लाख स्कूली छात्रों के लिए'मिशन दक्ष' योजना शुरू हुई थी. लेकिन केके पाठक के इस आइडिया पर राज्य में स्कूलों की टाइमिंग को लेकर शुरू हुए विवाद से राहु-केतु की नजर लग गई है

राज्य में एक दिसंबर, 2023 से शुरू हुआ था मिशन दक्ष प्रोग्राम
राज्य में एक दिसंबर, 2023 से शुरू हुआ था मिशन दक्ष प्रोग्राम

बिहार में सुपौल के एक मिडिल स्कूल के छठी कक्षा के छात्र मोहम्मद अरबाज को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को पहचानने में कठिनाई होती थी. दिसंबर, 2023 में उनका दाखिला 'मिशन दक्ष' की विशेष कक्षा में कराया गया. उन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी उनके ही स्कूल की शिक्षिका सुमन संगम को मिली. वे बताती हैं, "अब अरबाज में काफी सुधार आया है. वह अब तीन-चार अक्षरों के शब्द और सरल वाक्य पढ़ लेता है." सुमन के जिम्मे ऐसे आठ बच्चे हैं. उनकी राय है, "कुछ बच्चों के सीखने की गति जरूर धीमी है, मगर उनमें भी बदलाव आ रहा है."

कुछ ऐसी ही कहानी बेगूसराय जिले के मोहनपुर मिडिल स्कूल की पल्लवी और नीकू कुमार की है. सातवीं कक्षा के ये दोनों छात्र महादलित समुदाय से आते हैं. उनके शिक्षक राजन कुमार बताते हैं, "दोनों बच्चों को हिंदी पढ़नी तक नहीं आती थी. एक से सौ तक संख्या की ठीक से पहचान नहीं थी. मिशन दक्ष में इन्हें मेरे जिम्मे दिया गया. अब पल्लवी धड़ल्ले से हिंदी लिखती-बोलती है. अंग्रेजी के शब्द पढ़ लेती है और गणित में जोड़-घटाव, गुणा-भाग से आगे बढ़ कर अब लघुत्तम तक पहुंच गई है. वहीं नीकू कुमार भी अब धड़ल्ले से हिंदी पढ़ और लिख रहा है. एक से 20 तक का पहाड़ा जान गया है और जोड़-घटाव, गुणा-भाग बनाने लगा है."

ये तीनों बच्चे उन 36 लाख बच्चों में से हैं, जिनकी पिछले साल नवंबर महीने में बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने पहचान की थी और एक दिसंबर से इन बच्चों के लिए विशेष कक्षाओं का इंतजाम किया. राज्य में पिछले साल जुलाई महीने से सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने में जुटे विभाग के अपर मुख्य सचिव के.के. पाठक की यह खास योजना थी, जिसे मिशन दक्ष नाम दिया गया था.

एनुअल स्टैटस ऑफ एजुकेशन यानी असर की रिपोर्ट में भी पिछले दस वर्षों से लगातार ऐसे आंकड़े सामने आ रहे थे कि बिहार के सरकारी स्कूलों के बच्चे हिंदी, अंग्रेजी और गणित में कमजोर हैं. ऐसे में विभाग ने यह तय किया था कि 15 मार्च, 2024 तक इन कमजोर बच्चों की रोज विशेष कक्षाएं चलेंगी ताकि ये बच्चे सामान्य बच्चों की श्रेणी में आ जाएं.

इसके बाद भी हर साल इन कक्षाओं को उस वक्त तक चलाया जाना था, जब तक बिहार के कमजोर बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता बेहतर न हो जाए. इस परियोजना के लिए विभाग ने स्कूल के पुराने टाइम टेबल में बदलाव किया था और स्कूलों का टाइम एक घंटा बढ़ा दिया था. 

मगर टाइम टेबल में बदलाव कर शिक्षकों को स्कूल में एक घंटे अधिक रोकने की यह कोशिश शुरू से ही विवादों में रही. इसका शिक्षकों के साथ-साथ राज्य की अलग-अलग पार्टियों के नेता विरोध करते रहे. हाल में विधानसभा और विधान परिषद में भी इसको लेकर हंगामा हुआ.

आखिरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस टाइम टेबल को बदलने का ऐलान कर दिया. पाठक भी अब स्कूलों का टाइम टेबल 10 से 4 करने पर राजी हो गए हैं. हालांकि खबर लिखे जाने तक आधिकारिक रूप से न कोई आदेश निकला है, न यह तय हुआ है कि ये विशेष कक्षाएं बदले टाइम टेबल में कैसे चलेंगी. चलेंगी भी या नहीं चलेंगी.

राज्य के ज्यादातर शिक्षक शुरू से ही इस योजना के विरोध में थे. विरोध की सबसे बड़ी वजह टाइमिंग थी. शिक्षा विभाग चाहता था कि शिक्षक सुबह साढ़े आठ बजे से शाम पांच बजे तक स्कूल में रहें. विभाग ने इसके लिए सख्त उपाय भी लागू किए, जांच अधिकारियों को जिम्मा दिया कि वे हर रोज सुबह साढ़े आठ से नौ बजे के बीच हर स्कूल में जाएं और वहां उपस्थित शिक्षकों के साथ सेल्फी लेकर अपलोड करें. जो शिक्षक सेल्फी में होंगे, उन्हें ही हाजिर माना जाएगा.

शिक्षक मजबूरन स्कूल जा रहे थे, मगर वे दबे स्वर में कह रहे थे कि अगर रोज इसी तरह साढ़े आठ घंटे नौकरी करनी पड़ी तो उनका अपना पारिवारिक जीवन खत्म हो जाएगा. घर की जिम्मेदारियां कैसे पूरी करेंगे? दबाव में होने की वजह से वे मिशन दक्ष में बहुत मन से समय भी नहीं दे पा रहे थे.

कई शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि बच्चे भी सुबह नौ से पांच यानी लगातार आठ घंटे स्कूल में रहना नहीं चाहते. उन्हें जबरन रोकना पड़ता है. एक दिन रोक भी लिया तो वे अगले दिन स्कूल नहीं आते. उनके मां-बाप भी शिकायत करने आ जाते हैं कि बच्चों को इतनी देर स्कूल में क्यों रख रहे हैं? वहां दूसरे काम अटके पड़े हैं.

इस बीच एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें एक अभिभावक मिशन दक्ष के वक्त अपने बच्चे को घर ले जाने आता है और शिक्षक से कहता है कि उसका बच्चा अगर पूरे दिन स्कूल में ही रहेगा तो बकरियां भला कौन चराएगा?

शिक्षक संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष मंडल के सदस्य मार्कंडेय पाठक कहते हैं, "देखिए, शिक्षा ऐसी कोई चीज तो है नहीं कि आप इंजेक्शन की तरह नसों में उतार दें. जिन बच्चों को विशेष कक्षा के नाम पर नौ घंटे रोका जा रहा था, वे रुक तो जा रहे थे, मगर सीख नहीं पा रहे थे. वे सोचते थे, हमारी कक्षा के सारे बच्चे चले गए, हमें जेल में बंद कर रखा गया है.

शिक्षकों के लिए भी एनसीटी और आरटीई ऐक्ट के तहत पढ़ाने का समय तय है. हमें उसके बाद भी रोका जा रहा था. अभिभावक भी परेशान थे. तीनों परेशान, यह व्यावहारिक फैसला नहीं था. इसलिए इसका कोई बेहतर परिणाम सामने नहीं आया. सिवा बच्चे, शिक्षक और अधिकारियों के परेशान होने के."

शिक्षक तो इस मुद्दे पर खुल कर कभी विरोध नहीं कर पाए, मगर राजनेताओं ने शुरुआत से ही बदली हुई टाइमिंग का विरोध किया. दिलचस्प है कि इस फैसले का पहला विरोध तत्कालीन शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने ही किया. इसके बाद जद (यू) नेताओं ने मुट्ठियां लहराना शुरू किया. कहते हैं, इस तरह के विरोध और अंदरूनी दबाव की वजह से 8 जनवरी को के.के. पाठक अचानक लंबी छुट्टी पर चले गए.

बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद की सहमति से शिक्षा मंत्री बदल दिया. पाठक इस योजना को लेकर इतने प्रतिबद्ध थे कि ठंड बढ़ने की स्थिति में भी स्कूल टाइमिंग में बदलाव के लिए तैयार न थे. जब ठंड बढ़ने पर जिलाधिकारियों ने स्कूल के टाइमिंग में बदलाव करना शुरू किया तो शिक्षा विभाग ने इस पर आपत्ति दर्ज की. कहा गया कि खराब मौसम में भी लोग कोचिंग इंस्टीट्यूट तो जाते ही हैं. इन आपत्तियों के बावजूद पटना के डीएम चंद्रशेखर ने स्कूल की टाइमिंग में ठंड के लिहाज से बदलाव कर ही दिया.

इस बीच बिहार में सरकार बदलने के बाद विधानसभा और विधान परिषद् में विधायकों ने स्कूल टाइमिंग के मुद्दे पर हंगामा करना शुरू कर दिया. विरोध करने वालों में राजद और महागठबंधन के विधायक तो थे ही, सत्ताधारी जद (यू) और भाजपा के विधायकों ने भी इसका पुरजोर विरोध किया. इस विरोध की वजह से आखिरकार 20 फरवरी को नीतीश कुमार को कहना पड़ा कि अब स्कूल की टाइमिंग सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक ही होगी और शिक्षकों को पंद्रह मिनट पहले आना और पंद्रह मिनट बाद जाना होगा.

इस बदलाव के बाद बताते हैं, के.के. पाठक खासे नाराज हो गए. उनका एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वे शिक्षकों के खिलाफ अपशब्द बोलते नजर आ रहे थे. इसके बाद अगले दिन 21 फरवरी को इस वायरल वीडियो को लेकर बिहार विधान परिषद् में हंगामा हुआ. विधान परिषद् के सभापति ने इस वीडियो की जांच कराने के आदेश दिए.

अगले दिन 22 फरवरी को इस मसले पर विधानसभा में भी हंगामा हुआ. आखिरकार 23 फरवरी को अपनी कटिहार यात्रा के दौरान के.के. पाठक ने टाइमिंग बदलने का मौखिक आदेश जारी कर दिया. उन्होंने शिक्षकों से बातचीत करते हुए कहा, "सरकार ने तो फैसला कर ही लिया है. अब तो 10 से चार बजे तक ही स्कूल होंगे. लेकिन आप लोग थोड़ा पहले आइए और बाद में जाइए. जो कमजोर बच्चे हैं, उन पर जरूर ध्यान दें. अगर आठवीं का बच्चा एक पन्ना भी नहीं पढ़ पा रहा है तो सोचने की जरूरत है. यह हिंदी की बात है, गणित और विज्ञान की तो बात ही छोड़िए." 

इंडिया टुडे ने जब उनसे इस बाबत पूछना चाहा तो उन्होंने इस संबंध में जानकारी के लिए प्राथमिक शिक्षा निदेशक मिथिलेश मिश्र से बातचीत करने को कहा. मिश्र ने कहा कि बच्चे अगर दक्ष नहीं तो शिक्षकों को अधिक समय देना ही चाहिए. बिहार में शिक्षा व्यवस्था के मसले पर लंबे समय से काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नवेंदु प्रियदर्शी कहते हैं, "इस परियोजना का उद्देश्य काफी अच्छा है, मगर इसे जिस तरह से जोर-जबरदस्ती लागू कराया गया, इससे शिक्षक प्रतिक्रिया में आ गए और टकराव की स्थिति बन गई."

वे आगे कहते हैं, "बेहतर होता कि शिक्षकों से सुझाव लेकर, उन्हें योजना बनाने की प्रक्रिया में शामिल करते हुए इस काम को किया जाता. तब शायद ऐसी स्थिति नहीं बनती. इस बात में भी सचाई है कि बच्चों को नौ घंटे स्कूल में रोका नहीं जा सकता. इसके साथ-साथ कई अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि कमजोर बच्चों को कक्षा से अलग करके पढ़ाया जाए तो वे कुंठित हो जाते हैं. उनमें हीन भावना घर करने लगती है."

हालांकि मोहनपुर मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक विनय कुमार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि बच्चे देर तक स्कूल में रुकना नहीं चाहते. वे कहते हैं, "शुरू में हमें जरूर थोड़ी दिक्कत हुई, मगर बाद में वे खुशी-खुशी रहने लगे. दरअसल सच यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चों के घर में पढ़ने-लिखने की न जगह होती है, न माहौल. ऐसे में बच्चे स्कूल में ही पढ़ सकते हैं. यही एक विकल्प है."

प्रधानाध्यापक कुमार के ही शब्दों में, "मेरा तीस साल का पढ़ने-पढ़ाने का अनुभव है. मेरे स्कूल की भी अच्छे स्कूलों में गिनती होती है. पर अपने शैक्षणिक करियर में पहली बार मैंने और मेरे स्कूल के शिक्षकों ने बच्चों की शैक्षणिक कमजोरी की वजह को समझना, उसका समाधान करना शुरू किया. यह बेहतरीन प्रयोग है."

उनके सहयोगी राजन कहते हैं, "मेरे जिम्मे जो पांच बच्चे हैं, उनमें से तीन बच्चे एक कमरे के घर में रहते हैं. उनका परिवार बड़ा है. एक बच्ची के माता-पिता खुद शाम को नशा करके घर पहुंचते हैं. अक्सर उनके घर और आसपास के घरों में रोज शाम को हंगामा होता है. रोशनी की दिक्कत अलग है. मेरी कक्षा में कई बच्चे ऐसे हैं, जो भूखे स्कूल आते हैं. मिड-डे मील ही उनका पहला भोजन होता है. अगर ऐसे बच्चों को हमें शैक्षणिक रूप से बेहतर बनाना है तो यही बेहतर उपाय है." 

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