प्रधान संपादक की कलम से
खंडित जनादेश के इस भूत ने साथ-साथ हुए विधानसभाओं के चुनावों को भी जद में ले लिया. पीटीआइ ने उसमें भी नैतिक जीत हासिल की.

- अरुण पुरी
पाकिस्तान का इतिहास बोन्साई लोकतंत्र का रहा है. फौजी हुकूमत के बीच यदा-कदा चुनावों के हिचकोले खाता. हालांकि कभी-कभार बोन्साई में भी अप्रत्याशित तौर पर अखुए निकलने से वह अपने बागबान (पढ़ें फौज) को भी चकित कर सकता है. हैरतअंगेज चुनाव नतीजों के साथ 11 फरवरी को यही हुआ.
स्वघोषित पुनर्जागरण के करिश्माई लेकिन गुमराह नायक इमरान खान ने सारी नाउम्मीदी को धता बताते हुए मैच तकरीबन जीत ही लिया. पाकिस्तान के मामले में इन दिनों इस नाउम्मीदी का मतलब है फौज के मुखिया जनरल असीम मुनीर, तमाम सियासी तकदीरों के निर्णायक.
दिलेर और तेजतर्रार पूर्व क्रिकेट कप्तान को उसी फौज के साथ टकराव के बाद अप्रैल 2022 में प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटा दिया गया था, जिसने 2018 में उन्हें सहारा देकर इस गद्दी तक पहुंचाया था. वे अगस्त 2023 से गिरफ्तार हैं और एक के बाद एक तीन मामलों में जुर्म साबित होने के बाद सजा काट रहे हैं, जो 14 साल चलेगी.
उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को चुनाव लड़ने से बाकायदा रोका गया—उसका चुनाव चिह्न क्रिकेट बैट जब्त कर लिया गया. फिर भी इमरान जेल के भीतर से अपने दुश्मनों को मुंह चिढ़ाने में कामयाब रहे. निर्दलीय चुनाव लड़ने को मजबूर पीटीआई के लोगों ने नेशनल एसेंबली की 266 में से 93 सीटें जीत लीं.
हालांकि वे बहुमत के लिए जरूरी 134 सीटों से काफी पीछे रह गए, पर उनकी सीट हिस्सेदारी तमाम पार्टियों में सबसे ज्यादा है. नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) ने महज 75 सीटें जीतीं. बिलावल भुट्टो की अगुआई वाली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) 54 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर रही.
इस बीच अपने तीसरे कार्यकाल के आखिरी साल 2017 में प्रधानमंत्री की कुर्सी से बेदखल कर दिए गए नवाज को चार साल के निर्वासन सहित बीते छह साल का ज्यादातर वक्त शर्म और जलालत में बिताने के बाद बहाल कर दिया गया. उनके साबित अपराधों और कदाचारों को, फौज के आला अफसरों के साथ उनकी अदावतों और झगड़ों को इसलिए माफ कर दिया गया ताकि फौजी निजाम इमरान को सियासी मात दे सके.
खंडित जनादेश के इस भूत ने साथ-साथ हुए विधानसभाओं के चुनावों को भी जद में ले लिया. पीटीआई ने उसमें भी नैतिक जीत हासिल की. खैबर पख्तूनख्वा में 115 सामान्य सीटों में से 84 जीतकर उसने न केवल जबरदस्त बहुमत पाया बल्कि सरहदी सूबे के प्रशासन पर नियंत्रण की कतार में आ गई.
पीएमएल-एन के लिए शर्मनाक था कि पीटीआई ने उसके आंगन पंजाब में वोट बांटकर 297 सामान्य सीटों में से पीएमएल-एन की 137 सीटों के बरअक्स 116 सीटें जीत लीं, जिससे दोनों ही नियंत्रण की स्थिति में न रहे. मगर पीएमएल-एन की सीटें इतनी तो हैं ही कि वह गठबंधन का तानाबाना बुन कर सियासी तौर पर पाकिस्तान के सबसे ताकतवर प्रांत में हुकूमत कर सके. पाकिस्तान की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी पीपीपी ने 130 में से 84 सीटें जीतकर सिंध प्रांत के अपने मजबूत गढ़ पर कब्जा बरकरार रखा. बलूचिस्तान में वोट रहस्यमय ढंग से तितरफा बंट गए.
कुल मिलाकर गहरे तक बंटा हुआ सियासी सिनैरियो बौनी शख्सियतों से भरा था. इससे फौज के लिए एक-दूसरे पर निर्भर पार्टियों को गठबंधन में आने के लिए राजी करके सारी प्रक्रिया पर अपने प्रभुत्व की मोहर लगाना आसान हो गया. नतीजा यह कि पीएमएल-एन और पीपीपी ने हाथ मिला लिए, उसी तरह जैसे उन्होंने 2022 में इमरान को सत्ता से बेदखल करने के फौरन बाद पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) बनाकर किया था.
समझौता वार्ताओं के मुश्किल दौर के बाद नवाज शरीफ ने इस मांग के आगे घुटने टेक दिए कि उनके भाई को प्रधानमंत्री बनाया जाए, जबकि उनकी बेटी मरियम को पंजाब की मुख्यमंत्री बनने का इनाम दिया गया. वतन लौटने के बाद नवाज के कई लक्ष्यों में से एक बेटी को पार्टी की नेता के रूप में उत्तराधिकार सौंपना था.
खंडित जनादेश को देखते हुए उनके पीछे हटने के कदम को इस तरह देखा गया कि शहबाज के लिए हालात मुश्किल होने की स्थिति में वे खुद को रिजर्व में रख रहे हैं. फौज के साथ शहबाज के संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं. मुनीर भी उनके साथ काम करते हुए सहज हैं.
बिलावल की अगुआई वाली पीपीपी ने भी अपने पत्ते बहुत एहतियात से खेले. उसने राष्ट्रपति, नेशनल एसेंबली के स्पीकर, सीनेट के सद्र और चारों प्रांतों के गर्वनर सहित सभी अहम संवैधानिक पद उसे दिए जाने की मांग की. पार्टी मंत्रिमंडल में पद मांगे बगैर पीडीएम 2.0 गठबंधन को बाहर से ही समर्थन का मंसूबा भी बना रही है. इरादा यह है कि नई सरकार को मिलने वाली किसी भी अलोकप्रियता से वह अपने को दूर रखे और अगर हालात बिगड़ते हैं तो अपने सत्ता में आने का मौका बनाए रखे.
बिलावल को पता है कि शहबाज के सिर पर कांटों का ताज है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बस एक धागे से लटकी है: वृद्धि गोते लगा रही है, महंगाई करीब 40 फीसद, बाहरी कर्ज पिछले साल जीडीपी का 36.5 फीसद था और जून तक बढ़कर 24 अरब डॉलर पर पहुंच जाएगा. इसलिए आईएमएफ, जिसका बेलआउट पैकेज मार्च में आने वाला है, और चीन तथा सऊदी अरब सरीखे दूसरे दानी मदद का हाथ बढ़ाने से पहले अपने हिस्से की कीमत वसूलेंगे.
शरीफ परिवार के लिए यह अग्निपरीक्षा होगी. जेल में होते हुए भी इमरान का साया मंडरा रहा है. फौज पिछली गर्मियों में पीटीआई की भीड़ के हाथों उसके खिलाफ किए गए अराजक 'विद्रोह' को न भूली है, न ही उन्हें माफ किया है.
अब तो उनके पास उस नाफरमानी का लोकतांत्रिक रिप्ले भी है जिसमें पीटीआई ने डिजिटल गुरिल्ला तरकीबों से मीडिया के ब्लैकआउट को मात दे दी और जिसमें एआई से रचे गए इमरान भी थे. ऐसे प्रत्याशित अनुष्ठानों की पूरी संभावना है जिनके जरिए फौज इमरान के संसदीय दबदबे को बेअसर करने की खातिर उनके समर्थित निर्दलीयों को नए 'सम्राट की पार्टी' के पक्ष में अपनी वफादारियां बदलने के लिए उकसाएगी.
मगर ध्यान रहे, 'प्रतिष्ठान' खुद को हर जगह प्रतिष्ठापित रखने में माहिर है. इस हफ्ते हमारी आवरण कथा कराची के पत्रकार हसन जैदी ने लिखी है. इस नए सियासी ड्रामे को देखते हुए बस एक तथ्य दिमाग में रखिए: आजादी के बाद पाकिस्तान का एक भी प्रधानमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया.
इस बीच भारत और पाकिस्तान के रिश्ते 2019 में नए रसातल में पहुंच गए. भारत ने अनुच्छेद 370 क्या खत्म किया कि पाकिस्तान ने गुस्से में भारत के इस्लामाबाद स्थित उच्चायुक्त को निकाल दिया और व्यापार, परिवहन तथा संस्कृति से जुड़े सारे ताल्लुक तोड़ लिए. तभी से पाकिस्तान रिश्ते बहाल करने के लिए मूल मुद्दे के तौर पर कश्मीर को सुलझाने पर अड़ा है.
भारत का नजरिया यह है कि वह पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने का इच्छुक है, पर दिल्ली को बातचीत की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तान को सीमा-पार आतंकवाद के इस्तेमाल की अपनी मूल नीति से बाज आना होगा. दिक्कत हमेशा यह रही है कि भारत के प्रति दुश्मनी ही पाकिस्तानी फौज का सबब और मकसद है. अलबत्ता इस्लामाबाद का हर नया निजाम बदलाव की उम्मीद भरी सुनहरी किरण लेकर आता है, लिहाजा भारत इंतजार करना चाहेगा.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)