देश का मिज़ाज : क्या आपकी पारिवारिक आमदनी में सुधार की संभावना है?

अर्थव्यवस्था संभालने में मोदी सरकार के तरीकों की तारीफ तो हो रही है लेकिन आमदनी घटने और अच्छी नौकरियों की कमी का बड़ा संकट है

पटना में 5 जनवरी को एसबीआई क्लर्क की एक परीक्षा के लिए नौजवानों की कतार
पटना में 5 जनवरी को एसबीआई क्लर्क की एक परीक्षा के लिए नौजवानों की कतार

मार्च 2020 के बाद कोविड-19 महामारी की तीन लहरों से देश की अर्थव्यवस्था पस्त हुई, तो यह अनुमान लगाना मुश्किल हो गया कि कितनी तेजी से उसकी बहाली हो सकती है. आखिरकार, महामारी से लाखों नौकरियों पर असर पड़ा, हजारों छोटे, मंझोले और लघु उद्योग (एमएसएमई) बर्बाद हो गए और सप्लाई चेन थम गईं.

केंद्र ने महामारी के दौरान उद्योगों और कारोबार की मदद के लिए कई तरह के उपायों का ऐलान किया, जो 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत पैकेज का हिस्सा थे. उसमें एमएसएमई और उत्पादन इकाइयों को बिना गिरवी रखे कर्ज की पेशकश और दूसरी प्रोत्साहन योजनाएं शामिल थीं.

इन उपायों के अलावा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एकाधिक बार ब्याज दरों में कटौती का ऐलान किया, जिससे कर्ज सस्ता हो गया, और कर्ज के भुगतान पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी गई. जैसे-जैसे कोविड-19 का असर कम हुआ और हालात सामान्य हुए, मांग तेजी से बढ़ी, जिससे बिक्री और उत्पादन ने रफ्तार पकड़ी. सरकार ने निजी क्षेत्र के निवेश में कमी की भरपाई के लिए देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर अपने खर्च को काफी बढ़ा दिया.

कोविड की वजह से वित्त वर्ष 2021 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 5.8 फीसद सिकुड़ जाने के बाद अगले दो वर्षों में क्रमश: 9 फीसद और 7.2 फीसद की वृद्धि अर्थव्यवस्था में दमखम का प्रमाण है. वित्त वर्ष 2024 में केंद्र को उम्मीद है कि विकास दर 7.3 फीसद रहेगी, जिससे भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा. अलबत्ता, इसे कई बड़े देशों में इकाई अंक की वृद्धि के आईने में देखा जाना चाहिए. जानकारों का कहना है कि देश में हर साल लाखों नौकरियां पैदा करने के लिए अर्थव्यवस्था में और तेज बढ़ोतरी की दरकार है.

कोविड के दौरान सामाजिक क्षेत्र के उपायों और एमएसएमई कर्ज पहले तो सराही गई पर आर्थिक प्रबंधन को लेकर नाराजगी कायम

फिर भी, ताजा देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण गवाह है कि अर्थव्यवस्था की सार-संभाल के मामले में लोगों में उम्मीद बनी हुई है. अर्थव्यवस्था को संभालने के मामले में एनडीए सरकार के कामकाज को कैसे आंकते हैं? इस सवाल के जवाब में 49.7 फीसद लोगों ने बेहतरीन या अच्छा बताया.

लोगों ने कोविड के दौरान उठाए गए सामाजिक क्षेत्र के बड़े उपायों और एमएसएमई के लिए कर्ज योजना को तो सही माना, लेकिन जैसे-जैसे केंद्र में मोदी सरकार के साल बीतते जा रहे हैं , अर्थव्यवस्था के मामले में उसकी सराहना घटती जा रही है. अर्थव्यवस्था पर मोदी सरकार के कामकाज को खराब या बेहद खराब कहने वाले 27.6 फीसद थे, जबकि 2016 के इसी सर्वेक्षण में ऐसा कहने वाले सिर्फ 9 फीसद थे.

अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार के प्रति लोगों की सकारात्मक राय में यह कमी एक और सवाल के जवाब में जाहिर होती है. मोदी या उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह में किसने अर्थव्यवस्था को बेहतर संभाला? सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों (46.6 फीसद) का मानना है कि मोदी ने अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से संभाला, लेकिन यह एक साल पहले की तुलना में 4 फीसद कम है, जब 50.9 फीसद लोगों ने कहा था कि मोदी ने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में बेहतर काम किया है.

काफी बड़ी संख्या में लोगों का मानना है कि मोदी राज में उनकी माली हालत बदतर हुई

मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी खुलकर बोलती रही हैं कि भारत 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. प्रधानमंत्री ने पिछले साल अगस्त में स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा, ''यह 'मोदी की गारंटी’ है कि भारत अगले पांच वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बन जाएगा.’’

सरकार यह भी दावा कर रही है कि भारत 2030 तक 7 ट्रिलियन (70 खरब) डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा. लोग शायद सरकार की उम्मीदों के साथ हैं. देश का मिजाज सर्वेक्षण में 68.6 फीसद लोगों ने कहा कि भारत आने वाले वर्षों में दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा

 43.2 फीसद लोगों का यह भी मानना है कि तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना अहम है क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होंगी, जबकि 32.6 फीसद को लगता है कि इससे दुनिया में भारत का कद बढ़ेगा. हालांकि, सिर्फ 9.5 फीसद को ही उम्मीद है कि इससे उनकी कमाई या आमदनी बढ़ेगी.

बहुतों को उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में हालात सुधरेंगे

आर्थिक बदहाली की चिंताएं
लोगों की व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति चिंता का सबसे बड़ा सबब है. बहुत-से लोगों को नहीं लगता कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार हुआ है. सर्वेक्षण में शामिल 34.7 फीसद लोगों का कहना है कि मौजूदा सरकार के तहत उनकी आर्थिक स्थिति बदतर हुई है, जबकि अन्य 28.9 फीसद उसे जस का तस बताते हैं.

सिर्फ 32.6 फीसद का मानना है कि उनकी माली हालत सुधरी है. सर्वेक्षण में इस सवाल के जवाब में जनवरी 2016 के बाद से काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जब माली हालत में सुधार बताने वाले लोग 43 फीसद थे, और यह आंकड़ा जनवरी 2020 में 49 फीसद तक पहुंच गया था. लेकिन अगस्त 2021 में यह गिर गया, जब कोविड की सबसे भयानक लहर में केंद्र बुरी तरह फंसा हुआ था.

सरकार के लिए राहत की बात यह है कि चीजों में सुधार होने की धारणा अगस्त के सर्वेक्षण में 29.5 फीसद के मुकाबले इस बार थोड़ी बढ़ी है. कई लोगों (34 फीसद) की राय में अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार होगा, लेकिन 29 फीसद को लगता है कि उस अवधि में हालात और बिगड़ेंगे तथा आर्थिक बदहाली बढ़ेगी. इसमें कोई संदेह नहीं कि यूक्रेन और गाजा पट्टी में चल रहे युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहे हैं, और उसका व्यापार और निवेश पर दूरगामी नकारात्मक असर पड़ चुका है और उसकी आशंका अभी बनी हुई है.

आमदनी को लेकर भी निराशा का माहौल है. 36.4 फीसद लोगों का मानना है कि उनकी घरेलू आय बढ़ने की कोई संभावना नजर नहीं आती, और बाकी 29.5 फीसद को डर है कि आमदनी और घट जाएगी. इससे जाहिर होता है कि देश के विकास की कथित रफ्तार बहुत-से लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी नहीं ला सकती है. लगता है कि आमदनी न बढ़ने और रोजमर्रा के खर्चों के बढ़ने से परिवार संकट में हैं.

61.7 फीसद लोगों ने कहा कि मौजूदा खर्चों को बरदाश्त कर पाना मुश्किल हो गया है. हालांकि आरबीआइ ने महंगाई पर काबू रखने के लिए कामयाब कदम उठाए हैं, लेकिन यह अभी भी 6 फीसद की ऊपरी सीमा (पिछले साल दिसंबर में खुदरा महंगाई 5.69 फीसद थी) को छू रही है.

वैसे, 33.2 फीसद लोग कहते हैं कि उनके खर्च बढ़ गए हैं, लेकिन वे बरदाश्त कर लेने की स्थिति में हैं. सो, आश्चर्य नहीं कि टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों और खाद्य पदार्थों तथा किराने के सामान जैसी जरूरी वस्तुओं की मांग में कमी आ गई है, जिससे कमतर बढ़ोतरी या गिरावट का संकेत मिलता है.

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2024 के नवंबर तक टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं वाले उद्योगों के उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले सिर्फ 0.6 फीसद और गैर-टिकाऊ वस्तुओं (खाद्य पदार्थ और कपड़े वगैरह) वाले उद्योगों के उत्पादन में 5.6 फीसद की ही बढ़ोतरी हुई है.

बर्दाश्त के बाहर घरेलू खर्च कइयों के लिए दुखती रग बन चुका है

नौकरियों पर लाल बत्ती

सर्वेक्षण में 71.1 फीसद लोगों का मानना है कि नौकरियों के मोर्चे पर स्थिति या तो 'बेहद गंभीर’ या 'कुछ हद तक गंभीर’ है. यह आंकड़ा अगस्त 2023 के सर्वेक्षण के मुकाबले मामूली-सा कम है, लेकिन यह अगस्त 2021 के 83 फीसद के मुकाबले 12 फीसद अंक कम है.

हालांकि मोदी सरकार को अधिक रोजगार पैदा करने में सक्षम मानने वालों की तादाद अगस्त 2023 में 30.3 फीसद से बढ़कर 32.2 फीसद हो गई है. वैसे, यह जनवरी 2023 के सर्वेक्षण में 34.4 फीसद के मुकाबले कम है. सरकार रोजगार पैदा करने के काबिल 'बिल्कुल नहीं’ मानने वालों की संख्या नए सर्वेक्षण में अगस्त 2023 में 34.3 फीसद से घटकर 31 फीसद हो गई है.

सरकार के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि बेरोजगारी दर 2017-18 में 6 फीसद से घटकर 2022-23 में छह साल के निचले स्तर 3.2 फीसद पर आ गई. समस्या नौकरियों की गुणवत्ता में है, जो जानकारों के मुताबिक खराब होती चली गई है. स्व-रोजगार वाले मजदूरों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जिनमें बिना मेहनताने वाले घरेलू मजदूर और शहरी क्षेत्रों में सब्जी विक्रेता या पान-ठेला लगाने वाले या ग्रामीण क्षेत्रों में बुनकर और दर्जी जैसे लोग शामिल हैं.

ये स्व-रोजगार श्रमिक 2020-21 में 55.6 फीसद से बढ़कर 2022-23 में 57.3 फीसद हो गए. फिर, सामाजिक सुरक्षा लाभों के साथ अच्छी मानी जाने वाली वेतनभोगी नौकरियों में इस अवधि में कामगारों की संख्या 21.1 फीसद से घटकर 20.9 फीसद हो गई.

क्या आगे चलकर नौकरियों की स्थिति में सुधार होगा? 1 फरवरी को पेश अंतरिम केंद्रीय बजट में सीतारमण ने पूंजीगत खर्च में 11 फीसद की अतिरिक्त वृद्धि की, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्माण क्षेत्रों में अधिक रोजगार या नौकरियां पैदा होनी चाहिए. लेकिन इतना नाकाफी होगा. युवाओं के लिए नौकरी के अधिक अवसर पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र के निवेश की आवश्यकता है.

पारिवारिक आमदनी बढ़ने की लोगों को बहुत उम्मीद नहीं

ताजा देश का मिजाज सर्वेक्षण का एक और दिलचस्प पहलू बड़े कॉर्पोरेट घरानों और मौजूदा सरकार के रिश्तों को लेकर लोगों की धारणा है. जनवरी में अदाणी समूह को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली, जिसने समूह की फर्मों के शेयर मूल्य में हेराफेरी के अमेरिका-आधारित शॉर्ट-सेलर हिंडेनबर्ग के आरोपों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) या विशेष जांच दल से जांच कराने की अपील खारिज कर दी.

हालांकि, इस मामले में सेबी की जांच अभी चल रही है. बड़ी संख्या में यानी पूरे 52 फीसद लोगों का कहना है कि एनडीए सरकार की नीतियों से बड़े कॉर्पोरेट घरानों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जबकि सिर्फ 10.5 फीसद ने कहा कि छोटे कारोबार को फायदा हुआ है. सरकार की नीतियों का किसानों, वेतनभोगी वर्ग और दैनिक मजदूरों को मामूली लाभ ही हुआ. इसका एक स्वाभाविक नतीजा यह आरोप है कि केंद्र की आर्थिक नीतियों से अमीर और गरीब के बीच गैर-बराबरी की खाई चौड़ी हो गई है.

तकरीबन 45 फीसद लोगों का मानना है कि गैर-बराबरी बेतहाशा बढ़ी है, जबकि 37.3 फीसद लोग इसके उलट मानते हैं कि सचाई यह नहीं है. वित्त वर्ष 22 और वित्त वर्ष 23 के इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के विश्लेषण से पता चलता है कि ग्रामीण कृषि मजदूरों और अकुशल मजदूरों सहित निम्न-आय वर्गों के मेहनताने या वेतन में गिरावट हुई है कहने भर को बढ़ोतरी देखी गई है. इसके विपरीत, कॉर्पोरेट की कमाई में पिछले दो वर्षों में 10 फीसद से अधिक का इजाफा हुआ है, जो आय वर्ग के ऊपरी 50 फीसद वाले हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं.

बहरहाल, लगता है कि सरकार ने महामारी के बाद अर्थव्यवस्था की बहाली में मदद के मामले में अच्छा कामकाज दिखाया है. हालांकि, अर्थव्यवस्था को विकसित दुनिया में मंदी के माहौल और दो युद्धों की बाहरी मार झेलनी पड़ी है और घरेलू मोर्चे पर नौकरियों-रोजगार और आमदनी की स्थिति बदतर बनी हुई है. सरकार तो कीमतों पर अंकुश में ढील कतई नहीं दे सकती है.

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