लोकसभा चुनाव से पहले 'रेवड़ी कल्चर' पर क्या है देश का मिज़ाज ?

चाहे वह 'एक राष्ट्र एक चुनाव' हो या विधायिका में महिला आरक्षण, नई सियासी पहलकदमियों को व्यापक स्वीकृति मिल रही है, भले ही सामाजिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे बदल रहे हों

महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में संसद में पारित होने के बाद महिला सांसदों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में संसद में पारित होने के बाद महिला सांसदों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

राजनैतिक और राजकाज के सुधारों की कहीं ज्यादा व्यापक अपील होती है क्योंकि वे आर्थिक दक्षता लाने की संभावनाओं से भरे होते हैं. वहीं, सामाजिक ढांचों और परंपराओं को तोडने के मकसद से लाए गए सुधारों को स्वीकृति पाने में वक्त लगता है. यह फरवरी, 2024 के इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण का दो-टूक निष्कर्ष है.

मसलन, 'एक राष्ट्र एक चुनाव' (ओएनओपी) के विचार को ज्यादा स्वीकृति मिल रही है. बार-बार चुनाव महंगे होने के अलावा, नीति बनाने की प्रक्रिया में खलल भी डाल सकते हैं और खासकर कारोबारियों तथा निवेशकों के बीच अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं. ताजातरीन देश का मिज़ाज सर्वे दिखाता है कि बहुमत—65.9 फीसद—एक राष्ट्र एक चुनाव के पक्ष में है, यह देखते हुए कि संसद और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने से खर्च कम हो सकते हैं और व्यवधान भी कम हो सकते हैं.

वैसे जवाब देने वालों के एक हिस्से को अब भी लगता है कि ऐसा कदम संघवाद को नकारता है. 21.3 फीसद लोगों के इसके पक्ष में न होने और 12.8 फीसद के अनिर्णय की स्थिति में होने से यह स्पष्ट है.

इसके अलावा जिस एक और पहल को स्वीकृति मिल रही है, वह है जाति जनगणना. 59.2 फीसद इसके पक्ष में और 27.8 फीसद खिलाफ हैं. केंद्र सरकार जब दस साल में एक बार होने वाली जनगणना को बार-बार टाल रही है—आखिरी राष्ट्रीय जनगणना 2011 में हुई थी—कई राज्य जाति जनगणना को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करने और आरक्षण को नए सिरे से तय करने का आधार बनाने को तैयार हैं. मगर स्पष्ट बहुमत—59 फीसद—मानता है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि पूरी तरह व्यक्ति की आर्थिक हैसियत के आधार पर होना चाहिए.

वन नेशन, वन इलेक्शन और जाति जनगणना के पक्ष में है बहुमत

साल भर पहले ऐसा मानने वाले 57.3 फीसद थे. दोनों ही कसौटियों पर विचार करने के पक्षधर लोगों के प्रतिशत में साफ गिरावट दिखती है—32.3 से 27.9 फीसद ही. चुनाव-पूर्व वादों की भरमार के बीच उन लोगों की तादाद बढ़ रही है जो मानते हैं कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को और ज्यादा 'मुफ्त रेवड़ियां' देनी चाहिए. महज एक साल में ऐसे जवाब देने वालों की संख्या 49 फीसद से बढ़कर 52.6 फीसद हो गई है.

चुनावों की बात करें तो नवंबर, 2023 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों का एक प्रमुख नतीजा यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए ढर्रे से हटकर चयन कर रही हैं. इसीलिए भाजपा ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में दिग्गजों के दावों को अनदेखा करके नए चेहरों को चुना, तो कांग्रेस ने भी तेलंगाना में ऐसे नेता को कमान सौंपी जो पहले कभी कार्यपालिका के किसी पद पर नहीं रहा. लोगों का विशाल बहुमत—61.3 फीसद—राज्य नेतृत्व में इस पीढ़ीगत बदलाव के समर्थन में है, तो 22 फीसद इससे सहमत नहीं.

राज्य विधानसभाओं से संसद की तरफ आएं तो महिला आरक्षण कानून के पारित होने को परिवर्तनकारी मौका माना जा रहा है. सर्वे के 40 फीसद उत्तरदाता मानते हैं कि इससे महिला सशक्तीकरण के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता की झलक मिलती है. हालांकि खासी तादाद में 27.3 फीसद उत्तरदाता इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में चुनावी फायदा हासिल करने की गरज से मौजूं समय पर उठाए गए कदम के तौर पर देखते हैं.

जजों की नियुक्ति जज ही करें, बहुमत इस ओर इशारा करती है

अन्य 13 फीसद का कहना है कि यह बहुत जरूरी सुधार है और यह मायने नहीं रखता कि किस वक्त यह कदम उठाया गया है. छोटे-से हिस्से—3 फीसद—को लगता है कि जनगणना से जोड़कर इसे बेअसर बना दिया गया है. वहीं, बहुमत—56.9 फीसद—का कहना है कि संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण 2024 के आम चुनाव से ही लागू कर दिया जाना चाहिए था.

एक और संभावित कानून समान नागरिक संहिता (यूसीसी) चर्चा में है. जनवरी, 2021 से ही यह छमाही देश का मिजाज सर्वे बताता रहा है कि भारत का बहुमत इसे लागू करने के पक्ष में है, वैसे ऐसा मानने वालों का आंकड़ा जनवरी 2022 के अपने शिखर 72.7 फीसद से गिरकर फरवरी, 2024 में 62.8 फीसद पर आ गया है. इसी अवधि में इसका विरोध करने वालों का फीसद 13.7 फीसद से बढ़कर 21.7 फीसद हो गया.

अब जब उत्तराखंड यूसीसी पर जोर देने में सबसे आगे है, अगले साल इस पर जनमत का और ज्यादा ध्रुवीकरण हो सकता है. 6 फरवरी को इस पहाड़ी राज्य की विधानसभा के पटल पर रखे गए यूसीसी विधेयक का मसौदा बनाने वाली समिति की प्रमुख सिफारिशों में बहुविवाह और बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध, सभी धर्मों की लड़कियों के लिए विवाह योग्य होने की समान उम्र और तलाक या संबंध विच्छेद के लिए समान आधार और प्रक्रियाएं लागू करना शामिल है.

महिला आरक्षण विधेयक को महिलाओं के प्रति पीएम मोदी की प्रतिबद्धता के तौर पर लोग देखते हैं

जजों की नियुक्ति एक और विवादास्पद मुद्दा है, जिस पर कोई स्पष्ट बहुमत नहीं. वैसे 37.5 फीसद उत्तरदाता सोचते हैं कि जजों को ही अपनी नियुक्तियां करनी चाहिए, 18.7 फीसद मानते हैं कि यह कार्यपालिका का विशेषाधिकार होना चाहिए. बीच का रास्ता चुनते हुए खासे 29 फीसद उत्तरदाता मानते हैं कि कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों को बराबर रूप से इस कवायद में शामिल होना चाहिए. इसके बावजूद इस बात को लेकर धारणाओं में बदलाव आया है कि लोकतंत्र के प्रतिमानों को उसके 'चार स्तंभों' में से किसने सबसे अच्छी तरह कायम रखा.

16.1 फीसद ने सभी को धिक्कारा, जो जनवरी, 2022 के 10.2 फीसद से कहीं ज्यादा है. न्यापालिका का समर्थन करने वाले 34 फीसद से घटकर 28.7 फीसद पर आ गए, तो कार्यपालिका के समर्थक 10.4 फीसद से घटकर 7.2 फीसद पर आ गए हैं. सबसे तेज गिरावट—20.3 फीसद से 10.8 फीसद—मीडिया के मामले में है. इसी दौरान, लोकतांत्रिक मानदंडों को बनाए रखने में विधायिका की भूमिका के बारे में धारणा 13.4 फीसद से बढ़कर 18.4 फीसद पर पहुंच गई.

सल में, लोकतंत्र की दशा-दिशा पर और गहराई में जाएं तो 46.2 फीसद उत्तरदाता मानते हैं कि यह खतरे में है. यह जनवरी 2021 के 42 फीसद से ज्यादा है. इस अवधि के दौरान इस मुद्दे पर जनमत का ठोस रूप ग्रहण करना इस बात से जाहिर है कि लोकतंत्र को खतरे में नहीं मानने वालों की तादाद में अच्छी-खासी गिरावट आई है. 47 फीसद से घटकर 38.8 फीसद. फिर भी उत्तरदाताओं की बड़ी तादाद—46.7 फीसद—राजनीति और धर्म पर अपनी राय जाहिर करने में खुद को स्वतंत्र महसूस करती है, हालांकि अगस्त, 2022 के 49.8 फीसद के मुकाबले उनकी तादाद कम हुई है.

सर्वे में शामिल लोगों में से तकरीबन आधे का मानना है कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है

अन्य 21.8 फीसद उत्तरदाता राजनीति पर तो अपनी राय जाहिर करने में खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं, लेकिन धर्म के बारे में नहीं. वहीं, 8.3 फीसद उत्तरदाता धर्म पर राय जाहिर करने को लेकर स्वतंत्र महसूस करते हैं, लेकिन राजनीति पर नहीं. दोनों में से किसी पर भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करने वालों का प्रतिशत 9.4 से बढ़कर 11.4 हो गया है.

सांप्रदायिक सद्भाव के मामले में भी यही रुझान दिखते हैं. मौजूदा हुकूमत के मातहत क्या इसमें सुधार आया है? केवल 43.6 फीसद को ऐसा लगता है, जो जनवरी, 2021 के 55 फीसद से कम है, जबकि 8.1 फीसद का कहना है यह जस का तस है, जो तब 18 फीसद थे. जिन्हें लगता है कि हालात और बिगड़े हैं, उनका प्रतिशत इसी दौरान 22 फीसद से बढ़कर 32.7 फीसद हो गया. जहां तक इसकी जिम्मेदारी तय करने का सवाल है, करीब एक-तिहाई या 31 फीसद भाजपा और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को दोषी ठहराते हैं, और महज 5 फीसद विपक्षी दलों पर उंगली उठाते हैं. अन्य 3.2 फीसद मानते हैं कि धार्मिक कट्टरपंथी समूहों ने इसमें अहम भूमिका निभाई और 2.9 फीसद इसका दोष मीडिया और सोशल मीडिया के मत्थे मढ़ते हैं.

बहुमत आबादी का कहना है कि लव जिहाद भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की साजिश का हिस्सा है

भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में धारणाएं भी बदल रही हैं. कम ही लोगों का मानना है कि मुस्लिम पुरुष लव जिहाद में लिप्त हैं और देश को इस्लामिक स्टेट में बदलने की बड़ी साजिश के तहत हिंदू महिलाओं से शादी कर रहे हैं. हालिया सर्वे में 42.2 फीसद इसे सच मानते हैं जो एक साल पहले के 53.1 फीसद से कम है. इसी दौरान ऐसी साजिश पर यकीन न करने वाले 33.3 फीसद से बढ़कर 40.2 फीसद हो गए हैं.

मगर क्या महिलाएं भारत में सुरक्षित हैं? कम से कम सर्वे के उत्तरदाताओं की राय में इन वर्षों में देश महिलाओं के लिए कम सुरक्षित होता गया है—जनवरी 2021 के 32 फीसद के मुकाबले 42.6 फीसद ऐसा ही मानते हैं. मगर फिर भी 45 फीसद से घटकर अब 43.1 फीसद उत्तरदाताओं को लगता है कि देश महिलाओं के लिए सुरक्षित है, और 21 फीसद से काफी घटकर अब महज 10.5 फीसद, मानते हैं कि स्थिति जस की तस है.

आधे से ज्यादा लोग ये मानते हैं कि आरक्षण आर्थिक आधार पर हो, ना कि जातिगत

बहरहाल भारत में सामाजिक आचार-विचार बदल रहे हैं, भले उनकी रफ्तार धीमी है. बिना किसी किंतु-परंतु के अंतरजातीय विवाह का समर्थन करने वाले उत्तरदाता 37.6 फीसद हैं, जो एक साल पहले के 37.2 फीसद से बढ़ गए हैं. दोनों पक्षों को जाति का पता होने पर जिन्हें यह मंजूर है, उनका फीसद इसी अवधि में 39 फीसद से घटकर 34.3 फीसद पर आ गया है. अंतरधार्मिक विवाह के मामले में यही स्थिति है. इसका अनुमोदन करने वाले बीते साल के दौरान 28.2 फीसद से बढ़कर 29.2 फीसद हो गए, जबकि 41.1 फीसद से घटकर सिर्फ 34.3 फीसद को लगता है कि धार्मिक पहचान पहले से पता होनी चाहिए. वैसे 25.5 फीसद उत्तरदाता अब भी इसके खिलाफ हैं, जो पहले के 23.8 फीसद से बढ़ गए हैं.

कई मामलों में विकल्पों की हिफाजत से लेकर पर्यावरण की सुरक्षा तक बदलाव की बयार यहां भी बहने लगी है. क्या हम पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कोशिशें कर रहे हैं? 22.5 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि जो कोशिशें की जा रही हैं, वे पूरी तरह नाकाफी हैं. वैसे 60.2 फीसद को लगता है कि और ज्यादा करने की जरूरत है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भी आगाह किया है कि नवीकरणीय और दूसरी कम उत्सर्जन वाली टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में तेजी लाने की अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद उम्मीद यही है कि भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को ताकत देने के लिए कोयले पर भरोसा करता रहेगा. फिर से सोचने का यही समय है.

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