क्या ममता और नीतीश के अलग होने के बाद बढ़ी इंडिया गठबंधन की उलझन

गाहे-बगाहे विपक्षी गठबंधन में सब कुछ ठीक न होने की खबरें आने से मतदाताओं में संशय बढ़ा है

एकता की खातिर सांसदों के सामूहिक निलंबन के खिलाफ 22 दिसंबर को प्रदर्शन करते राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता
एकता की खातिर सांसदों के सामूहिक निलंबन के खिलाफ 22 दिसंबर को प्रदर्शन करते राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता

राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की रूपरेखा और नैरेटिव तय करने पर चर्चा के लिए दो दर्जन से अधिक विपक्षी दलों के नेता पिछले साल 17-18 जुलाई को बेंगलूरू में मिले थे. तब खासकर दो नेताओं के बीच सौहार्द्र ने ध्यान खींचा था.

कांग्रेस ने जहां स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण दर्शाने वाला संक्षिप्त नाम इंडिया यानी आईएनडीआईए (भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन) सुझाया, वहीं पार्टी नेता राहुल गांधी ने जोर दिया कि बैठक में नाम का प्रस्ताव पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी रखें. जवाब में ममता ने भी राहुल को 'सबका पसंदीदा' करार दिया. यह पूर्व में राहुल के नेतृत्व की आलोचना करने वाले उनके रुख से एकदम अलग था.

अब फरवरी 2024 की बात करें तो 'पसंदीदा' नेता सबसे निशाने पर है. ममता बनर्जी ने तृणमूल के कांग्रेस और वामदलों के साथ सीट बंटवारे के लिए किसी समझौते के बिना अपने दम पर लोकसभा चुनाव का ऐलान करने के बाद राहुल पर खुलकर हमला बोलना भी शुरू कर दिया है.

उन्होंने कांग्रेस को हिंदी पट्टी के राज्यों में भाजपा से मुकाबला करने की चुनौती दी, और यहां तक कह डाला कि उन्हें तो पार्टी के '40 सीटें' जीत पाने पर भी संदेह है. फिर उन्होंने बंगाल के छह जिलों से होकर गुजरी राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर भी निशाना साधा और इसे 'बाहरी लोगों' के लिए 'फोटो खिंचवाने का अवसर' बताया.

उन्होंने यह हमला ऐसे समय पर किया जब पांच दिन पहले ही पड़ोसी राज्य बिहार में इंडिया ब्लॉक के एक और सहयोगी और जदयू नेता नीतीश कुमार पाला बदलकर भाजपा की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए और उन्होंने नौवीं बार सीएम के तौर पर शपथ ली. सबसे बड़ी बात यह कि विपक्षी दलों को एकजुट करने में नीतीश की भूमिका सबसे अहम रही थी.

उन्होंने न केवल कांग्रेस के साथ पर ना-नुकुर करने वाले दूसरे दलों को हाथ मिलाने पर राजी किया बल्कि पिछले वर्ष 23 जून को पटना में सर्कुलर रोड स्थित आवास पर विपक्षी गुट की पहली बैठक भी बुलाई. उनका गठबंधन से निकलना विपक्षी गुट के लिए बड़ा झटका है, जिसका पूरा नैरेटिव ही केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कथित कुशासन के इर्द-गिर्द केंद्रित था.

ममता की तरह, नीतीश ने भी इंडिया ब्लॉक में परस्पर विश्वास की कमी के लिए कांग्रेस, खासकर राहुल को जिम्मेदार ठहराया. उम्मीद थी कि राष्ट्रीय पार्टी गठबंधन में निर्णायक भूमिका निभाएगी लेकिन यह खुद ही परेशानी का सबब बनती जा रही है. इसकी वजह यह है कि कांग्रेस की तरफ से सीट-बंटवारे पर बात करने को लेकर कथित तौर पर कोई तत्परता नहीं दिखाई गई. उसने सहयोगियों के समक्ष उनकी अपेक्षा से कहीं ज्यादा सीटों की मांग रखी.

इसमें हैरानी नहीं कि 15 दिसंबर, 2023 से 25 जनवरी, 2024 के बीच आयोजित इंडिया टुडे देश का मिजाज सर्वे में अधिकांश उत्तरदाताओं ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इंडिया ब्लॉक को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया. केवल 31 फीसद उत्तरदाताओं का मानना है कि यह गठबंधन चुनाव में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को हरा सकता है और यह आंकड़ा सात महीने पहले के सर्वे (33 फीसद) के मुकाबले कम है.

वहीं 46 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि नीतीश के एनडीए में शामिल होने से विपक्षी गठबंधन की हार पक्की हो गई है. चुनावी रणनीतिकार से राजनीतिक कार्यकर्ता बने प्रशांत किशोर ने बिहार में एनडीए की एकतरफा जीत की भविष्यवाणी की है. उनके मुताबिक, नीतीश और ममता के बाहर होने से 82 लोकसभा सीटों पर एनडीए के खिलाफ एकजुट लड़ाई की संभावना भी कम होगी.

दरअसल, विपक्षी गठबंधन की पूरी रणनीति इस पर केंद्रित रही है कि भाजपा-विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जितनी ज्यादा सीटों पर संभव हो, साझे उम्मीदवार उतारे जाएं. एक तिहाई से ज्यादा उत्तरदाता केंद्र में सरकार गठन के लक्ष्य के साथ क्षेत्रीय दलों के साथ आने के विचार से सहमत थे, 37 फीसद की राय में क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन यह समर्थन अब घट गया है.

खैर, अच्छी खबर यह है कि राहुल गांधी को अब भी मोदी के खिलाफ विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व के लिए सबसे बेहतर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है और 21 फीसद उत्तरदाताओं ने उनका समर्थन किया है. हालांकि यह आंकड़ा अगस्त, 2023 के पिछले देश का मिज़ाज सर्वे के मुकाबले थोड़ा कम है.

कांग्रेस नेता ने पिछले साल राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक तौर पर नजर आने के लिहाज से अपनी छवि काफी सुधारी है. कई मौकों पर वे संसद में पीएम मोदी के खिलाफ पार्टी के हमले का मोर्चा संभाले नजर आए. दरअसल, उन्होंने दक्षिणपंथी सोशल मीडिया आर्मी की गढ़ी 'पप्पू' वाली छवि से बाहर आकर खुद को लोगों की फिक्र करने वाले एक संवेदनशील और सुलभ जननेता के तौर पर स्थापित करने पर भी खासा ध्यान दिया है. उन्होंने किसानों, दिहाड़ी मजदूरों और ट्रक ड्राइवरों जैसे समाज में हाशिये पर रहने वाले तबकों के साथ अपनी बातचीत को सोशल मीडिया पर डालकर जनता के साथ जुड़ने के नए तरीके भी खोजे. 

उन्होंने सितंबर, 2022 से जनवरी, 2023 के बीच कन्याकुमारी से कश्मीर तक की 4,000 किलोमीटर लंबी भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी और अब ऐसी एक अन्य यात्रा निकाल रहे हैं. उनकी भारत जोड़ो न्याय यात्रा मणिपुर से मुंबई तक की बस यात्रा है, जिसमें बीच-बीच में वे पदयात्रा और जनसभाएं करते हैं. भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य एकता का संदेश फैलाना था, तो भारत जोड़ो न्याय यात्रा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने के संकल्प के साथ निकाली जा रही है.

लेकिन मतदाता के बीच पैठ बढ़ाने का कांग्रेस और राहुल का यह प्रयोग कुछ खास सफलता हासिल करता नहीं दिख रहा. देश का मिजाज सर्वे में 48 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा कोई फैक्टर नहीं होगी.

एक-तिहाई से अधिक उत्तरदाताओं का यह भी मानना है कि यात्रा से आगामी चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. 11 फीसद इसे सिर्फ राहुल की छवि सुधारने की कवायद के तौर पर देखते हैं. यह पूछे जाने पर कि क्या भारत जोड़ो न्याय यात्रा से राहुल की राजनीति और नेतृत्व क्षमता को लेकर उनके विचारों में कोई बदलाव आया है तो 42 फीसद का जवाब नकारात्मक था.

सर्वे में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि राहुल जनता का मूड भांपने में नाकाम रहे हैं. केवल 39 फीसद उत्तरदाताओं ने विपक्षी नेता के तौर पर उनके प्रदर्शन को अच्छा या उत्कृष्ट माना, जो छह माह पूर्व 52 फीसद की तुलना में कम है. भले ही कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए पार्टी ने पूरी तरह उन पर दांव लगा रखा है, लेकिन इस पर लोगों की धारणा सुधरने के बजाय घटी ही है.

अगस्त, 2023 में 32 फीसद की तुलना में अब 31 फीसद लोग ही इससे सहमत हैं. इसी तरह, कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन को लेकर भी लोगों की सकारात्मक धारणा में कमी आई है. 41 फीसद उत्तरदाताओं ने विपक्षी दल के तौर पर इसके प्रदर्शन को उत्कृष्ट या अच्छा बताया है, जो आंकड़ा पिछले देश का मिजाज सर्वे में 43 फीसद था. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को होता दिख रहा है.

अगस्त, 2023 में 47 फीसद लोगों की राय थी कि पार्टी प्रमुख के नाते उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट या अच्छा है; अब सिर्फ 36 फीसद ही यह राय रखते हैं. कांग्रेस के लिए एकमात्र राहत की बात शायद यही है कि अधिकांश उत्तरदाता (44 फीसद) नीतीश के पाला बदलने के खुद नीतीश को दोषी मानते हैं जबकि 21 फीसद ने पार्टी को जिम्मेदार माना.

सर्वे ने एक और मिथक भी तोड़ा. व्यापक तौर पर यही माना जा रहा था कि नीतीश के एनडीए में जाने से भाजपा के खिलाफ विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार यानी जाति जनगणना का मुद्दा भी उससे छिन जाएगा. वजह: नीतीश ही थे जिन्होंने सामाजिक न्याय के नाम पर जाति गणना के मुद्दे को विपक्ष का कारगर हथियार बनाने का खाका तैयार किया था.

जबसे नीतीश ने बिहार में जाति गणना और निष्कर्ष जारी करने के साथ सामाजिक न्याय पर ध्यान केंद्रित किया है, तबसे राहुल जनसंख्या के अनुपात में अधिकारों की आवाज बुलंद कर इसे राष्ट्रीय एजेंडा बनाने में जुटे हैं. नीतीश कुमार ने भले ही अपना पाला बदल लिया है लेकिन मतदाताओं के बीच जाति जनगणना के मुद्दे की धमक बदस्तूर कायम है. लगभग 50 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि नीतीश के इंडिया ब्लॉक से बाहर होने के बावजूद जाति जनगणना का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है.

अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी किसी कवायद के पक्ष में नहीं रही बात भाजपा भी स्वीकार रही है कि जनमत इसके पक्ष में है. इसीलिए इस बात पर जोर देने का कोई मौका नहीं चूकती कि पार्टी ने बिहार विधानसभा में जाति गणना के फैसले का समर्थन किया था.

वैसे, नीतीश की एनडीए में वापसी से कुछ ही दिन पहले बिहार के पूर्व सीएम और ओबीसी नेता कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से नवाजने के पीछे केंद्र का असल इरादा इंडिया ब्लॉक के जाति जनगणना मुद्दे की काट निकालना ही था. 5 फरवरी को विपक्षी दलों पर तीखे हमले के दौरान भी पीएम मोदी ने एक बार फिर अपनी ओबीसी पहचान का सहारा लिया और कहा कि आलोचक यह देखने में विफल रहे कि भाजपा शासन में ओबीसी कितना ऊंचा उठ गया.

अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्षी दल जल्द ही दर्शक दीर्घा तक सीमित हो जाएंगे क्योंकि इस लोकसभा चुनाव में जनता उन्हें संसद से बाहर कर देगी. हालांकि, विपक्ष रहेगा या नहीं रहेगा, इसका फैसला तो आगामी चुनाव में मतदाता ही करेंगे. लेकिन एक बात तय है कि उनका एक वर्ग विपक्षी नेताओं को उस तरह संसद से बाहर किए जाते देखने के पक्ष में नहीं है, जैसा शीतकालीन सत्र के दौरान हुआ था.

जब दोनों सदनों के 146 सदस्यों को निलंबित कर दिया गया था. सरकार ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए दलील दी कि नेताओं ने तख्तियां लेकर सदन में हंगामा करके संसदीय परंपराओं को तोड़ा जबकि विपक्ष का कहना है कि वे 13 दिसंबर की सुरक्षा चूक पर प्रधानमंत्री या गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे.

देश का मिजाज सर्वे में 38 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि विपक्षी सदस्यों का सामूहिक निलंबन लोकतांत्रिक मानदंडों के खिलाफ था. हालांकि, 34 फीसद ने कार्रवाई का समर्थन किया और कहा कि विपक्ष ने संसदीय नियमों का उल्लंघन किया था.

ऐसे में यही कहा जा सकता है कि जनता की राय काफी बंटी हुई है, वे विपक्ष की बात सुनने को तैयार हैं लेकिन सीधे तौर पर जनता से जुड़े एक मजबूत नैरेटिव का अभाव उन्हें अखरता है. 

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