भाजपा के लिए कमजोर कड़ी बना मिजोरम

मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश की दिलचस्प चुनावी हलचलें

इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे
इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 अक्टूबर को मिजोरम के मामित जाने का कार्यक्रम रद्द क्यों कर दिया? इसे लेकर सियासी अटकलों का बाजार गर्म है और चुनावी मौसम में ऐसा होना स्वाभाविक भी है. इस पर कांग्रेस के जयराम रमेश यह कहने में कहां चूकने वाले थे कि प्रधानमंत्री को मिजोरम में चुनाव प्रचार करने में शर्मिंदगी महसूस हुई होगी क्योंकि उन्हें मई से जातीय हिंसा की आग में जल रहे पड़ोसी राज्य मणिपुर का दौरा करने का समय नहीं मिला है.

वहीं, कुछ अन्य ने और बारीकी से विश्लेषण करके पाया कि इसकी असल वजह यह है कि मुख्यमंत्री जोरामथांग ने पीएम के साथ मंच साझा करने से इनकार कर दिया था. जोरामथांगा ने एक इंटरव्यू के दौरान भाजपा शासित मणिपुर में जारी संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा था कि उनकी पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट के लिए 'भाजपा के साथ नजदीकी दिखाना' ठीक नहीं होगा.

असल में मिजोरम की ज्यादातर आबादी ईसाई है और मणिपुर हिंसा के दौरान कई चर्च जलाए जाने से खासी आहत है. मुख्यमंत्री ने कहा, "बेहतर यही होगा कि पीएम यहां खुद अपना मंच संभालें और मैं अलग मंच पर नजर आऊं." विडंबना यह है कि जोरामथांगा का एमएनएफ भाजपा-नीत पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) का हिस्सा है और केंद्र में भी एनडीए सहयोगी है. लेकिन मिजोरम में भाजपा के साथ उसके रिश्ते पटरी पर नहीं हैं. चाहे-अनचाहे मणिपुर हिंसा मिजोरम में चुनावी मुद्दा बन चुकी है. और जोरामथांगा ने दोस्ती और दुश्मनी एक साथ निभाने के मामले में तो जॉर्ज 'दुब्या' बुश को भी पीछे छोड़ दिया है.

यह है असली चुनावी दंगल

इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे

चुनावी मौसम आते ही मोर्चे से लेकर दंगल तक तमाम ऐसे शब्द फिजा में तैरने लगते हैं, मानो कहीं पर असली युद्ध छिड़ गया हो. खैर, हम चाहे विशुद्ध देसी अंदाज में उपमा दें या फिर शाही शूरवीरता का बखान करें, होता यह सब अलंकारिक ही है, है कि नहीं? असल जिंदगी में तो किसी की भी कार्टून जैसी काली आंखें या टूटी नाक नहीं दिखतीं. थोड़ा आगे सोचकर देखिए, हमारे पास क्या-क्या है. टीवी चैनल की बहस को ही ले लीजिए तो यह अमेरिका के पुराने असभ्य इलाके के बाररूम की बराबरी करती नजर आती है, जहां बात-बात पर लात-घूंसे चलना आम बात थी. खैर, कुछ ऐसा ही उस रात हुआ. और वह भी लाइव. और मोर्चे पर एक तरफ थे सियासत के माहिर खिलाड़ी कुना श्रीशैलम गौड़ा. वे संयुक्त आंध्र के समय में 2009 से 2014 तक कुतुबुल्लापुर से विधायक रहे और 2021 तक 12 साल कांग्रेस के तेलंगाना प्रमुख रहे.

अब उन्हें भाजपा के छह प्रमुख महारथियों में शुमार किया जाता है. दूसरी तरफ थे के.पी. विवेकानंद गौड़ा, जिन्होंने 2016 से टीआरएस/बीआरएस की तरफ से मोर्चा संभाल रखा है और 2014 से कुतुबुल्लापुर में काबिज हैं. बतौर विधायक करीब एक दशक का कार्यकाल विरोधियों को 'अधूरे वादों' को लेकर लंबे-चौड़े आरोप मढ़ने के लिए काफी होता है. 57 वर्षीय कुना भी के.पी. के साथ यही तरकीब आजमा रहे हैं.

वैसे कुना की कद-काठी और घनी दाढ़ी देखकर यही कहा जा सकता है कि वे कभी भी दंगल में दो-दो हाथ करने को तैयार रहते होंगे. लेकिन इस प्रतिद्वंद्वी पर हमले की शुरुआत इंजीनियरिंग की डिग्री रखने वाले 46 साल के के.पी. ने की और कैमरा चालू होने के बावजूद उनसे दुर्व्यवहार किया. एंकर और अन्य लोगों ने तुरंत दखल दिया, अन्यथा भारतीय लोकतंत्र में टेलीविजन पर यह लाइव ढिशुम-ढिशुम को खूनखराबे में बदलते देर नहीं लगती. वैसे बाद में उन्होंने कहा, "हमारा उपनाम एक ही है लेकिन हम करीबी रिश्तेदार नहीं हैं. वे मेरे खिलाफ मानहानि का मामला दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं, मैं भी बाकायदा साक्ष्यों के साथ आरोप साबित करने को तैयार हूं." भाजपा मांग कर रही है कि के.पी. को 30 नवंबर को प्रस्तावित चुनाव लड़ने से वंचित किया जाए.

साकी पर कड़ी नजर

चुनावी मौसम में जैसा आम तौर पर होता ही है, हमारी पुलिस भी एकदम मुतावा यानी सऊदी अरब की नैतिक पुलिस वाली भूमिका में आ गई है. और उसने हर उस जगह सख्त नाकाबंदी कर रखी है, जहां से शराब की आपूर्ति हो सकती है. इसके अलावा पुलिसकर्मियों की कड़ी नजरें नकदी, हथियारों और ऐसे अन्य सामान की आवाजाही पर भी टिकी हैं, जिनके जरिए मतदाताओं को लुभाया या डराया-धमकाया जा सकता है.

लेकिन मध्य प्रदेश में तो नागौद पुलिस ने वाहनों की जांच के दौरान जौहरियों के करोड़ों रुपए के सोने के गहने ही जब्त कर लिए, जिस पर राज्य ज्वेलर्स एसोसिएशन ने 'उत्पीड़न' का आरोप लगाया. एक तरफ राजस्थान में 23 नवंबर को होने वाली 50,000 शादियों की वजह से मतदान तारीख आगे खिसकाकर 25 नवंबर कर दी गई. वहीं, मध्य प्रदेश में 17 नवंबर का मतदान दक्षिण भारत के हजारों बारातियों का मजा किरकिरा कर रहा है.

दरअसल, हाल में धार पुलिस ने एक ट्रक से 1.5 करोड़ रुपए कीमत की 501 पेटी सिंगल माल्ट व्हिस्की जब्त कर ली थी. शराब की यह खेप दक्षिण भारतीय राज्य भेजी जा रही थी. फिर, एमपी-यूपी सीमा पर 3.5 करोड़ रुपए की प्रीमियम शराब जब्त की गई. दोनों मामलों में शराब की आपूर्ति का स्रोत गुडगांव था और इसका चुनावों से कोई संबंध नहीं था. वैसे भी नेता चाहे जितने भी अमीर क्यों न हों, मतदाताओं को सिंगल माल्ट बांटने वाली दरियादिली नहीं दिखाते! असल बात यह है कि टॉप-एंड ब्रांड सबसे सस्ती दर पर संभवत: गुडगांव में ही उपलब्ध हैं. यही वजह है कि यहां से शराब की आपूर्ति देशभर में होती है. बहरहाल, एमपी की चुनावी शुचिता और 'गुड़गांव रूट' बाधित होने से हजारों बारातियों के लिए समारोह 'सूखा-सूखा' हो रहा है.

शाह के हवाले बागी!

मध्य प्रदेश में टिकट नहीं मिलने से असंतुष्ट भाजपा नेताओं के समर्थकों द्वारा जबलपुर में पार्टी के चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव के साथ धक्का-मुक्की के बाद असंतुष्टों को मनाने का जिम्मा केंद्रीय गृह मंत्री और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खुद ही संभाल लिया. जबलपुर उत्तर से पार्टी ने अपने उम्मीदवार के तौर पर अभिलाष पांडे को उम्मीदवार बनाने की घोषणा की. इसके बाद इस सीट पर टिकट मिलने की उम्मीद लगाए बैठे धीरज पटेरिया और पिछले चुनाव में पार्टी उम्मीदवार शरद जैन के समर्थकों ने भूपेंद्र यादव को निशाने पर ले लिया. इसके कुछ ही दिनों बाद अमित शाह ने दोनों असंतुष्टों से मुलाकात की और इसके बाद दोनों के सुर बदल गए. दोनों अब पार्टी हित में काम करने की बातें कह रहे हैं.

पूरे मध्य प्रदेश में तकरीबन डेढ़ दर्जन सीटों पर भाजपा के बागी मैदान में उतर गए हैं. इनमें से जहां संभव हो रहा है, वहां अमित शाह बागियों से मिलकर उन्हें मनाने का काम खुद कर रहे हैं. भले ही अमित शाह ने सार्वजनिक तौर पर ग्वालियर में यह कहा हो कि नाराज फूफाओं को मनाने की जरूरत नहीं है लेकिन मध्य प्रदेश भाजपा के एक नेता ने यह बताया कि जहां अमित शाह खुद नहीं पहुंच पा रहे हैं, वहां के बागियों को वे फोन पर बात करके या उनके यहां किसी वरिष्ठ नेता को भेजकर मनाने का काम कर रहे हैं. नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख निकलने के बाद ही पता चल पाएगा कि शाह अपनी इन कोशिशों में कितना कामयाब रहे.

दोहरी मुसीबत

इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे

भाजपा का हाल इधर कुआं तो उधर खाई वाला हो गया है. प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करने के साथ ही पार्टी को असंतोष झेलना पड़ा तो उसने दूसरी सूची के जरिए सुधार की भरपूर कोशिश की. लेकिन नतीजा जस का तस ही रहा. दिग्गज नेता भैरों सिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी लगातार तीन बार से विद्याधर नगर से जीत हासिल कर रहे थे लेकिन भाजपा ने उनका टिकट काट दिया. उन्हें प्रदेश अध्यक्ष सी.पी. जोशी के गृह नगर चित्तौड़गढ़ से टिकट दिया गया. यहां भाजपा की जीत तय मानी जा रही थी लेकिन राजवी को टिकट मिलते ही बगावत एक नई मुसीबत बन गई है. हाल यह है कि टिकट मिलने के बाद एक सप्ताह बाद राजवी प्रचार के लिए पहुंचे हैं.

- रोहित परिहार, अमरनाथ के. मेनन, राहुल नरोन्हा और हिमांशु शेखर

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