प्रधान संपादक की कलम से
कंसल्टेंसी फर्म प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स का अनुमान कहता है कि भारत में एल्डर इकोनॉमी 10-15 अरब डॉलर का बाजार बन चुकी है

- अरुण पुरी
भारत में अब वही पुराने ढंग से बूढ़ा होना जरूरी नहीं. अपनी लिविंग स्पेस बड़े हो चुके बच्चों के साथ साझा करने की कोई बाध्यता नहीं रह गई है. न ही आपको सारा भौतिक सुख त्यागकर कठोर अनुशासन से चलाए जा रहे धार्मिक कम्यून में अकेले रहने की जरूरत है. सीनियर लिविंग स्पेस में कायापलट होता दिख रहा है. हम 'ओल्ड एज होम' की धारणा के अभ्यस्त हैं, जो उपेक्षा और अनदेखी के पुराने विचार का ही विस्तार है. बाहर के नजारे देखने के लिए न कोई कमरा, न सुनहरा सूर्यास्त.
वे नीरस और निराशाजनक जगहें हैं, उन लोगों के लिए जिन्हें उनके बच्चों ने अपने हाल पर छोड़ दिया है. हम निश्चित ही 17 करोड़ रुपए के पेंटहाउस और 5-6 करोड़ रुपए की 4 बीएचके विला के बारे में नहीं सोचते. विकल्पों की फेहरिस्त में नीचे जाएं तो करीब 40 लाख रुपए में 1 बीएचके इकाई भी मिल सकती है. तमाम महंगी सुख-सुविधाओं से लैस आलीशान परिसरों से लेकर कहीं ज्यादा सस्ते आवास, जिनमें हर जरूरत का ख्याल रखा गया है—ऐसी जगहें जो आप सीधे खरीद सकते या किराये पर ले सकते हैं. जी हां, यहां सभी जरूरी चीजें मौजूद हैं—24&7 नर्सिंग, इंटरकॉम पर कॉल जितनी दूर डॉक्टर, आप चाहें तो हर कमरे में पैनिक बटन भी.
मगर यह असिस्टेड लिविंग या सहायता सुलभ जीवनयापन से कहीं आगे जाता है. जीवन प्रत्याशा बढ़ने और खर्च योग्य आमदनी ज्यादा होने के साथ बुजुर्गों को बोझ की तरह नहीं देखा जाता. न ही वे खुद को उस पुरानी घिसी-पिटी छवि में देखते हैं. बल्कि तृप्ति और संतोष के सक्रिय साधक के तौर पर वे अपने ही बदलाव के वाहक बन गए हैं.
हालांकि अभी बाजार केवल उन्हीं से मुखातिब है जो इसका खर्च उठा सकते हैं, पर यह तथाकथित नन्हा-सा टुकड़ा अपने आप में काफी बड़ा है. बीते 5-10 साल में एल्डर मार्केट के विकास के बारे में बताते हुए पीडब्ल्यूसी इंडिया के पार्टनर और हेल्थकेयर लीडर डॉ. राणा मेहता कहते हैं, ''1990 के दशक के उदारीकरण के बाद की अवधि में दौलत इकट्ठा करने वाले बुजुर्गों की पहली पीढ़ी इस जनसांख्यिकी में दाखिल हो गई है.''
आम तौर पर युवाओं के साथ हर कोई फैशन और फैशनेबल चीजों को जोड़ता है. बुजुर्गवार सामाजिक उपेक्षा की धुंध के पीछे जिंदगी जीते हैं. हम उस बंधी-बंधाई तस्वीर को तोड़ रहे हैं और इसकी वजह है एक धड़कती हुई परिघटना—बूढ़े होने के इर्द-गिर्द पनपता एक बड़ा बाजार. उन्हें 'द गोल्डीज' और उनके इर्द-गिर्द विकसित होती अर्थव्यवस्था को 'गोल्ड रश फॉर द ओल्ड' कहिए. यह महज बुलबुला नहीं. यह हमारी सामाजिक और आर्थिक जिंदगी का टिकाऊ और मजबूत हिस्सा होगा.
कंसल्टेंसी फर्म प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स का अनुमान कहता है कि भारत में एल्डर इकोनॉमी 10-15 अरब डॉलर का बाजार बन चुकी है. इसका सालाना 13-15 फीसद की दर से बढ़ना भी तय दिखता है. उत्सुक खरीदारों और विक्रेताओं से भरे इस गुलजार बाजार में न केवल वह है जिसकी आपने किसी और जमाने में उम्मीद की होगी—हेल्थकेयर और असिस्टेड लिविंग से जुड़ी चीजें. बल्कि हमारे सामने जो है, वह लंबे-चौड़े क्षेत्र के उत्पादों का धमाका है, जिसमें रोजमर्रा की सुविधाओं की अनगिनत चीजों के अलावा अलबेले आवासों से आलीशान लाइफस्टाइल उत्पादों तक, यात्रा के रोमांचक विकल्पों से वित्तीय और टेक्नोलॉजी सेवा सहायता तक हर चीज शामिल है. सब तेजी से बुजुर्गों की ओर अग्रसर हैं.
इस परिघटना की वजहें हैं संयुक्त परिवार के पुराने ढांचों का टूटना, एकल परिवारों का दबी-सिकुड़ी शहरी जगहों पर बसना, और नौकरी की खातिर प्रवास. समाज के बुनियादी ढांचे में बदलाव के साथ यह उछाल आना तय था. कहे-सुने आधार पर तो हम सब इस रुझान से वाकिफ थे, बस सटीक आंकड़े नहीं थे.
भारत के आधिकारिक लांगीट्यूडनल आयु वृद्धि अध्ययन का 2021 का डेटा कहता है कि हमारे 26 फीसद बुजुर्ग अपने बच्चों से दूर अकेले या जीवनसाथी के साथ रहते हैं. मगर पारंपरिक ओल्ड-एज होम या वृद्धाश्रम में जाकर रहने का विचार इससे जुड़े कलंक के कारण हमेशा तीव्र प्रतिरोध पैदा करता है. न्यू एज स्पेस के आविष्कार से वह मानसिकता टूटी है. ये इच्छा और अभिलाषा की चीजें हैं, खुली जेल नहीं जहां आप नियति के आगे बेमन से घुटने टेककर रहने जाते हैं.
एसोसिएट एडिटर सोनल खेत्रपाल इस हफ्ते हमारी आवरण कथा के लिए इस नए भूदृश्य का जायजा ले रही हैं. वे बुजुर्गों के हाथों बुजुर्गों के लिए खर्च में कुल बढ़ोतरी देख रही हैं. आश्चर्य नहीं कि उद्यमियों ने इस उभरते ग्राहक आधार को नोटिस किया है. भारत का जनसांख्यिकी पैटर्न अंतत: बदलना ही है.
ज्यादा लंबे जीवनकाल की बदौलत आज के युवा उम्र बढ़ने के साथ सफेद बाल वालों की आबादी में अच्छा-खासा इजाफा करेंगे, जबकि प्रजनन दर घटने का मतलब होगा युवाओं की कम तादाद. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक, 2050 तक करीब 34.7 करोड़ या हमारी आबादी के 20 फीसद लोग 60 साल से ऊपर होंगे. इस सदी के अंत तक बुजुर्ग 0-14 आयु वर्ग की जनसांख्यिकी को पीछे छोड़ देंगे. यह बढ़ता रेडीमेड बाजार है.
हमने सुख-सुविधाओं से लैस कुछ सीनियर लिविंग जगहों का दौरा किया, ताकि टटोला जा सके कि यहां रहने वाले नागरिकों को कैसा लग रहा है. मसलन देहरादून के अंतरा सीनियर लिविंग में हमें ऐसे धनी-मानी लोग मिले जिन्होंने जरूरत के चलते नहीं बल्कि सुविधाओं के कारण यहां आकर रहना चुना. अस्सी से ऊपर के अनिल और सीमा सूद की तरह, जो गुरुग्राम में अपने विशाल पांच कमरों के घर से दो साल पहले यहां आए. ईएमआइ/एचएमवी के पूर्व एमडी अनिल का कहना है कि अपनी तमाम चिंताएं दूसरों को सौंप महज एक बटन दबाकर हर चीज हासिल कर लेना कहीं ज्यादा आसान है.
रहने की जगह के अलावा छुट्टियों से लेकर रुपए-पैसे की प्लानिंग और टेक्नोलॉजी तक तमाम तरह की दूसरी सेवाएं भी यहां मिलती हैं. बुजुर्गों की जरूरत के हिसाब से मौजूं गैजेट भी हैं. मसलन, जीपीएस ट्रैकर और एसओएस बटन से लैस पहनी जा सकने वाली पर्सनल सिक्योरिटी डिवाइस, स्मार्ट पिल डिस्पेंसर, जेब के आकार की चिकित्सा डिवाइस जो आपके जीवनदायी संकेतों को मापती हैं और दूर-दराज से रोग की पहचान के लिए रिपोर्ट आपस में जुड़े नेटवर्क पर डाल देती हैं, परिजनों के हाथों दूर-दराज से कनफिगर किए जा सकने वाले 'ईजीफोन', एआइ की ताकत से चलने वाले स्मार्ट लैंप जो बुजुर्ग के गिरने और उठ न पाने की स्थिति में आपातकालीन प्रतिक्रिया शुरू कर देते हैं.
बुढ़ापा ऐसा स्टेशन है जहां अंतत: सभी खुशकिस्मत को आना है. और सफर के बीच फंसे हर शख्स के पास कुढ़ने और झल्लाने के लिए बूढ़े माता-पिता तो हैं ही. मगर सबसे ज्यादा यह भारत के बुजुर्गों के उस पैटर्न को तोड़ने के बारे में है जिसमें उन्हें अपने बच्चों की देखभाल की जरूरत होती है. हम सोने में गढ़े बुजुर्गों का आगमन देख रहे हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी की कमान अपने हाथों में ले ली है और निराले अंदाज में इसका आनंद ले रहे हैं.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)