प्रधान संपादक की कलम से

पिछली बार हमने 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में कप जीता था. इसको कुछ वक्त हो चला है. सूखे के ये दर्जन भर साल जीवनकाल की तरह लगते हैं, लेकिन उससे पहले तो फासला तीन गुना लंबा था

हम फिर बनेंगे विश्व विजेता?
हम फिर बनेंगे विश्व विजेता?

- अरुण पुरी

दक्षिण अफ्रीकी स्टैंडअप कॉमेडियन ट्रेवर नोआ दुनिया की नादानियों और मजेदार लहजों पर इस तरह चुटकी लेते हैं कि अगले को निहत्था कर देते हैं. उनके विषय एकदम गंभीर हो सकते हैं, लेकिन उनकी चीर-फाड़ वे ऐसे करते हैं कि सुनते हुए हंसते-हंसते आपके पेट में बल पड़ जाते हैं. पिछले हफ्ते भारत आए, तो नोआ ने औपनिवेशिक मूल की हर चीज का नाम बदलने या हटाने के मौजूदा दौर के बारे में यह कहकर लोगों को गुदगुदाया: ''हम अपने शहरों के और शायद अपने देश का भी नाम बदलना चाहते हैं, लेकिन हम क्रिकेट से निजात पाना नहीं चाहते.

अरे नहीं, नहीं, नहीं, क्रिकेट नहीं. अंग्रेजों का किया-धरा सब कुछ आखिर उतना बुरा भी नहीं था.’’ मजेदार ढंग से ही सही, पर ट्रेवर सही थे. तमाम विदेशी चीजों के साथ हमारे रिश्ते भले ही तनावपूर्ण हों, पर क्रिकेट अपनी जड़ें जमाकर एकदम देसी हो गया है. जब हम 5 अक्तूबर से शुरू जुनून-भरे छह हफ्तों के दौरान क्रिकेट विश्व कप के 2023 संस्करण की मेजबानी करेंगे, तो ऐसा बर्ताव करेंगे मानो यह घरवापसी हो.

उम्मीद की जा रही है कि 45 दिनों के दौरान 10 आयोजन स्थलों पर घूमते इस सर्कस के 48 मैचों को 2 अरब से ज्यादा दर्शक देखेंगे. इनाम के तौर पर करीब 1 करोड़ डॉलर की धनराशि दांव पर है—अकेला विजेता ही 40 लाख डॉलर घर ले जाएगा. क्या वे भारत के रणबांकुरे होंगे?

पिछली बार हमने 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में कप जीता था. इसको कुछ वक्त हो चला है. सूखे के ये दर्जन भर साल जीवनकाल की तरह लगते हैं, लेकिन उससे पहले तो फासला तीन गुना लंबा था. 1983 में कपिल देव की टीम के हाथों मिली युगांतरकारी जीत अब क्रिकेट के इतिहास की इस कदर स्थापित सच्चाई मालूम देती है कि हम भूल जाते हैं कि यह जब घटित हुई थी तब यह निपट अप्रत्याशित थी.

इंडिया टुडे का क्रिकेट विश्व कप से एक किस्म का नाभिनाल का रिश्ता है. इस मैगजीन के अंग्रेजी संस्करण और चैंपियनशिप दोनों का पहला संस्करण 1975 में आया. आठ साल बाद भी भारत इतना दीन-हीन और खाकसार था—और वनडे फॉर्मेट अब भी अपनी शैशवास्था से बाहर नहीं आया था—कि हमारे लिए इसे छुट्टी मना रहे एक संवाददाता ने कवर किया था. उस जीत ने सब कुछ बदल डाला.

खेल का गुरुत्वाकर्षण केंद्र आहिस्ता-आहिस्ता लेकिन पक्के तौर पर इस उपमहाद्वीप की तरफ खिसक आया, जहां धन और धूम-धड़ाके की बहुत कुछ कमान भारत के हाथ में है. वन-डे इंटरनेशनल (ओडीआइ) ने एक किस्म की केंद्रीयता अख्तियार कर ली, जो अब भी उसे हासिल है. टेस्ट क्रिकेट किसी पूर्व-औद्योगिक अतीत की प्राचीन वस्तु सा लगने लगा और इसके शुद्धतावादियों तक सिमट गया.

दूसरी तरफ टी20 ने क्रिकेट को ही एक ट्वीट के आकार में समेट दिया. 50 ओवरों के फॉर्मेट में क्लासिकल और पॉप, कला और मनोरंजन दोनों का संतुलन था. इसीलिए क्रिकेट विश्व कप, जैसा कि इसे सारगर्भित ढंग से कहा जाता है, इस खेल का सबसे शानदार नजारा है—मानो क्रिकेट का जी20.

भारत की ’23 के कप की तलाश टीम की बनावट के लिहाज से एक रोमांचक बाजी पर टिकी है. स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी 1983 में हमारे सामने थी. कपिल के डेविल दुनिया की सबसे बड़ी लूट के लिए साथ आ गए अप्रत्याशित ओशंस इलेवन की तरह थे. खुद कप्तान ने मैच के बाद दिए इंटरव्यू में शैंपेन की चुस्की लेते हुए इंडिया टुडे से कहा था, ''यह फील्डिंग ही थी जिसने हमें प्रुडेंशियल विश्व कप दिलाया.’’

अट्ठाइस साल बाद फील्डिंग महज इत्तफाक से बुनियादी खूबी में बदल गई थी और फिटनेस पेशेवर मामला बन गई थी. मगर धोनी की टीम ऐसी थी जिसमें दुनिया को हराने का स्वैग था. उसमें सचिन तेंडुलकर और वीरेंद्र सहवाग सरीखे दिग्गजों, युवराज सिंह सरीखे जांबाजों, फौलादी गौतम गंभीर के अलावा मुट्ठी भर युवा खून भी था. वे एक-दूसरे में गुंथे थे और इस जिताऊ जोड़ पर धोनी के फौलादी संकल्प की छाप थी. उस कामयाबी को दोहराने की जिम्मेदारी अब नौसिखुआ मेल के साथ रोहित शर्मा पर आ गई है.

पंद्रह के मौजूदा दस्ते में करीब दो हिस्से ओस की तरह तरोताजा तरुणाई है, तो एक हिस्सा तपे-तपाए अनुभवी. विराट कोहली और रविचंद्रन अश्विन दो अकेले खिलाड़ी हैं जो 2011 की टीम में भी थे, और उसमें भी अश्विन का होना अभी पूरी तरह तय नहीं है. अतीत के दूसरे अकेले ए-लिस्टर, कप्तान खुद हैं.

संक्षेप में यह टीम मोटे तौर पर आइपीएल के साथ बड़ी हुई पीढ़ी के इर्द-गिर्द बनी है—15 में से 12 ने 100 से कम ओडीआइ खेले हैं, छह ने 50 से कम खेले हैं, और बैकअप विकेटकीपर ईशान किशन (जो सौरभ गांगुली की राय में पहली पसंद होने चाहिए) ने कुल 18 मैच खेले हैं. मगर शुभमन गिल (35 मैच), मोहम्मद सिराज (29), श्रेयस अय्यर (46), सूर्यकुमार यादव (29) और शार्दूल ठाकुर (44) ने गंभीर खिलाड़ियों के तौर पर दुनिया को प्रभावित किया है. वे टीम के लिए उतने ही अहम हैं जितने रविंद्र जडेजा, मोहम्मद शमी, जसप्रीत बुमराह, के.एल. राहुल और हार्दिक पांड्या सरीखे शूरवीर और दिग्गज.

उनके पास जिस एक अहम चीज की कमी है, वह है बड़े मैचों का अनुभव. यह देखना दिलचस्प होगा कि वे वर्ल्ड कप में उन्हीं टीमों—जैसे, ऑस्ट्रेलिया या श्रीलंका— के खिलाफ कैसे निखरकर आते हैं जिनके खिलाफ उन्होंने आमने-सामने की सीरीज में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है. भारत के बाहर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड, दो टीमें हैं जिनसे सावधान रहना होगा.

इंग्लैंड ने हर जगह अपने टेस्ट कोच ब्रेंडन 'बैज’ मैकुलम के असर में 'बैजबॉल’ कहा जाने वाला क्रिकेट का एक दिलेर संस्करण अपनाया है, जिसमें मैच की स्थिति की परवाह किए बिना सकारात्मक और आक्रामक क्रिकेट खेला जाता है. न्यूजीलैंड छुपा रुस्तम है. पाकिस्तान के पास अब भी हैरतअंगेज और अप्रत्याशित ढंग से अच्छी से अच्छी टीम को भी धूल-धूसरित कर देने की क्षमता है. कप्तान के तौर पर उनके पास दुनिया के सबसे अच्छे बल्लेबाजों में से एक बाबर आजम है. हम जानते हैं कि भारत-पाकिस्तान के मैच अपने आप में फाइनल मैच से रोमांचकारी बन जाते हैं.

हमने आपके लिए एक दावत संजोई है. भारत की टीम का विस्तृत स्वॉट विश्लेषण खेल में देर से आने वालों की मदद करेगा. सुनील गावस्कर और राजदीप सरदेसाई अपने-अपने नजरिए पेश कर रहे हैं, तो मुख्य निबंध निखिल नाज, कंसल्टिंग एडिटर, स्पोर्ट्स, इंडिया टुडे टीवी, ने लिखा है. हाल में जब देशों का दूसरा जी20 दिल्ली में हुआ, तो उसका आदर्श वाक्य था 'वसुधैव कुटुंबकम्’.

लड़के भले मैदान के बीचोबीच आखिरी गेंद तक जी-जान से लड़ते हों, मगर स्टेडियम और हर सार्वजनिक जगहों पर हमें एक बार फिर गरिमामय मेजबान की भूमिका अदा करनी होगी. हमें 'अतिथि देवो भव’ पर खरा उतरना होगा. हम फिर भी अपना समर्थन यह कहकर भारतीय टीम को दे सकते हैं: सर्वश्रेष्ठ टीम जीते, पर अगर हमारे रणबांकुरे कप घर लाते हैं तो यह राइजिंग इंडिया को एक और भेंट होगी.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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