प्रधान संपादक की कलम से

यह हमारे वैज्ञानिकों की दुनिया जीतने की काबिलियत का जश्न भी है. खासकर उस नजरिए का, जिसे 1971 में विक्रम साराभाई के निधन के बाद इसरो के अध्यक्ष बने महान वैज्ञानिक सतीश धवन 1970 के दशक में लेकर आए थे.

चंद्रविजय के नायक
चंद्रविजय के नायक

यकीनन चंद्रमा हर किसी का है, लेकिन भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इसे हमें अपना कहने का एहसास दिला दिया है. मेरा मन भी एक निजी अनुभव को याद करने लगा. चंद्रमा हाइस्कूल के एक प्रोजेक्ट का विषय था, जिस पर मैंने बड़ी मेहनत की थी. नील आर्मस्ट्रांग के चांद पर उतरने की बहुर्चित घटना कुछ वर्षों बाद हुई, लेकिन सोवियत संघ का अग्रणी लूना-2 मिशन इतिहास रचने वाला था. हर किसी की कल्पना में अंतरिक्ष में हो रही खोज छाई हुई थी. मैं चंद्रमा के 'समुद्रों’—लूनर मारिया के नाम रट गया था. ये ज्यादातर उस हिस्से में बताए गए, जो हमें दिखता है.

मगर दिलचस्प यह है कि चंद्रयान-1 के मून इंपैक्ट प्रोब ने पहली बार 2008 में उस अंधियारे हिस्से में पानी की खोज की, जो हमें नहीं दिखता. वह हिस्सा भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट है, जहां आखिरकार 23 अगस्त को भारत ने चंद्रयान-3 के जरिए अपने पदचिह्न छोड़े. आज जब धरती पर चांद से बेहद दिलचस्प डेटा आ रहा है, हम अपने वैज्ञानिकों के प्रति गहरे आदर भाव के साथ अपनी पत्रकारीय भूमिका निभा रहे हैं. इस हफ्ते हमारी आवरण कथा उस अंदरूनी कहानी को बयान करती है जो बताती है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कैसे चंद्रयान-2 की त्रासदी से उबरकर इस मुकाम को अंतरिक्ष संबंधी मानव इतिहास में दर्ज किया.

किसी दूसरे खगोलीय पिंड के संपर्क में आने वाली पहली मानव निर्मित वस्तु के तौर पर 1959 में लूना-2 के चंद्रमा की सतह पर पहुंचने के बाद से वस्तुत: दर्जनों चंद्रमा मिशनों के बावजूद इसरो की उपलब्धि उल्लेखनीय है. उसने बेहद नाजुक सॉफ्ट लैंडिंग को संभव बनाया, जिसमें हाल ही में जापान और इज्राएल भी नाकाम रहे. और भले ही चीन का चांग-ई 4 दूसरी ओर उतरने वाला पहला यान था, चंद्रयान-3 वास्तविक दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का पहला विजेता है. यह रहस्यमय इलाका है.

इसमें गड्ढे ही गड्ढे हैं, जिनकी गहराई में तकरीबन दो अरब वर्षों से सूर्य की रोशनी नहीं पंहुची है, जिससे यह इलाका और दुर्गम बन जाता है. इसके अलावा, लगातार धूप वाले चंद्रमा के इक्वेटर के विपरीत यहां तापमान में भारी उतार-चढ़ाव रहता है. इसरो ने आश्चर्यजनक रूप से अधिकतम तापमान 70 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया, जो उसकी अपेक्षा से 30-40 डिग्री अधिक था, और न्यूनतम तापमान -10 डिग्री तक चला गया. हमें कई और नई अंतर्दृष्टि और बारीकियों का इंतजार है जो अंतरिक्ष अन्वेषण में आगे महत्वपूर्ण साबित होंगी.

इस मिशन की दूसरी खासियत यह है कि इसे बेहद कम बजट में पूरा किया गया, जो हॉलीवुड की किसी अंतरिक्ष फंतासी फिल्म की लागत से भी कम था. जो लोग सरकारी संगठनों की लालफीताशाही से वाकिफ हैं, वे इसरो के प्रबंधन की सराहना करेंगे. यही नहीं, चार साल पहले ही त्रासद निराशा के बाद कामयाबी हासिल करने का संकल्प भी दिखा. यह हमारे वैज्ञानिकों की दुनिया जीतने की काबिलियत का जश्न भी है. खासकर उस नजरिए का, जिसे 1971 में विक्रम साराभाई के निधन के बाद इसरो के अध्यक्ष बने महान वैज्ञानिक सतीश धवन 1970 के दशक में लेकर आए थे.

इसी नजरिए ने अंतरिक्ष के लिए साराभाई के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया और परिभाषित उद्देश्यों को निर्धारित किया, उसे विस्तार दिया और कामयाब बनाया. उस पर अमल के लिए नए केंद्र बनाए गए, समय-सीमा तय की गई और कठोर, पारदर्शी समीक्षा प्रणाली स्थापित की गई, जिसमें इसरो के बाहर के संस्थानों को भी शामिल किया गया. इस प्रकार दूसरे सरकारी विभागों की लालफीताशाही से मुक्त होकर ही इसरो ने अंतरिक्ष अन्वेषण के मोर्चे पर सफलता का स्वाद चखा. वह भी तब, जब चंद्रमा को न सिर्फ गंतव्य के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि अधिक दूर के अनुसंधानों के लिए प्रस्थान बिंदु भी माना जा रहा है. 

मेरे स्कूल प्रोजेक्ट के मुकाबले कहीं अधिक गहराई से ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा अपने पहले प्यार की ओर लौट आए. इंडिया टुडे के लिए अंतरिक्ष पर उनकी पहली आवरण कथा 1984 में पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की अद्भुत उपलब्धि पर थी. तब से उन्होंने हमारे लिए अंतरिक्ष पर सात आवरण कथाएं लिखी हैं. इस बार, उन्होंने बेंगलूरू की यात्रा की, और उन्हें मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स आइएसटीआरएसी में जाने की विशेषाधिकार हासिल हुआ, जहां से वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए निर्देशित किया था. वे यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर भी गए, जहां चंद्रयान-3 को असेंबल किया गया था. इससे भी बढ़कर यह है कि उन्होंने चंद्रमा परियोजना के प्रमुख लोगों से मुलाकात की, जिसमें इसके 46 वर्षीय परियोजना निदेशक पी. वीरमुतुवेल और उनकी 49 वर्षीया डिप्टी कल्पना कलाहस्ती भी हैं. उनके बारे में सबसे खास बात? वे और उनकी टीम ज्यादातर छोटे शहर के लोग हैं.

मुतुवेल तमिलनाडु के विल्लुपुरम से हैं और उन्होंने त्रिच्चि से एम.टेक किया है. फिर इसरो में करियर के बीच पीएच.डी. के लिए उन्हें आइआइटी मद्रास जाने का मौका मिला. कल्पना की पैतृक जड़ें आंध्र प्रदेश में हैं. उन्होंने इसरो में पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा में लॉन्चपैड पर बतौर राडार इंजीनियर जुड़ने से पहले चेन्नै के एक कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. चेंगप्पा कहते हैं, ''उन सभी का जुनून और समर्पण एक जैसा है. सभी सबसे जटिल विज्ञान में रमने वाले सीधे-सरल लोग हैं. उनमें कोई दिखावा नहीं है, बड़बोलापन और पद की हेकड़ी दूर-दूर तक नहीं है.’’ उनके रवैए की खासियत अनुकरणीय टीम वर्क और तालमेल है. तीन प्रमुख प्रणालियों—प्रणोदन, नेविगेशन और मार्गदर्शन नियंत्रण में अत्यधिक गुणवत्ता नियंत्रण करने में लगभग 20-30 विभाग सक्रिय हैं. हर कोई पिछली नाकामी को ध्यान में रखकर गहरे विश्लेषण में जुटा था. हर आवाज सुनी गई और इस तरह नाकामी को ही कामयाबी की नींव बना लिया गया.

मैं कबूल करता हूं कि 20 साल पहले जब पहले चंद्रमा मिशन का ऐलान हुआ था, मैं संसाधनों की कमी, बाल कुपोषण और बुनियादी सुविधाओं की किल्लत वाले इस देश में इसकी उपयोगिता को लेकर शंकालु था. भारत आज बहुत बेहतर स्थिति में है और मैंने अब अपना मन बदल लिया है. इस पर खर्च वाजिब लागत है. इसके अलावा, यह देश भर के वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और हाइ-टेक उद्योग को बढ़ावा देता है, खासकर जब अंतरिक्ष को निजी उद्यम के लिए खोल दिया गया है. भविष्य के मिशनों के लिए उन्हें और ताकत मिलेगी. मैं अपने वैज्ञानिकों की बहु-विषयक प्रतिभा को सलाम करता हूं जो हमारे अंतरिक्ष अन्वेषण को संभव बनाते हैं. वे हमें गौरवान्वित करते हैं.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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