भारत@100 : चुटकियों में हाजिर सरकारी सेवाएं

डेटा से जुड़ी तमाम पहलकदमियां न केवल सरकार बल्कि नागरिकों के लिए भी सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने और आसान पहुंच पक्की करने में कारगर साबित होंगी

एआइ सॉल्यूशन
एआइ सॉल्यूशन

महत्वपूर्ण कागजात कहीं चोरी न हो जाएं? या आग-पानी के हवाले न हो जाएं! ऐसे अंदेशे जल्द ही अतीत की बात बन जाएंगे. बड़ी तादाद में डेटा आर्काइव करने और उसके विश्लेषण की क्षमता के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दस्तावेजों को 'डीमटीरियलाइज’ करके नीति निर्धारण और सेवा वितरण में क्रांतिकारी बदलाव ला देगा. चाहे आपकी जमीन का लेखा-जोखा हो या सेहत का हालचाल, आधार पहचान हो या ड्राइविंग लाइसेंस, जल्द ही सब कुछ पूरी तरह डिजिटल हो जाएगा और इसके गुम या नष्ट होने की आशंका भी न रहेगी. डेटा गोपनीयता/सुरक्षा जरूर एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर ध्यान देना जरूरी है. इसके लिए ऐसे इंतजाम करने होंगे कि उन्नत प्रौद्योगिकी की मदद से किसी तरह के भ्रष्टाचार या चोरी की आशंका को और कम या पूरी तरह खत्म किया जा सके.

यह गेम चेंजर क्यों है?

देश के हर राज्य को अपने नागरिकों को 56 डिजिटल सेवाएं जरूरी तौर पर मुहैया करनी होती हैं. हालांकि, इस पर अमल का स्तर 67 फीसद रहा है. लेकिन इन और अन्य ऑफलाइन सेवाओं की सफलता शिकायत निवारण तंत्र पर निर्भर है. अधिकांश सरकारों के पास ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हैं जो पीड़ित नागरिकों को शिकायतें दर्ज करने की सुविधा देते हैं. लेकिन 1.4 अरब आबादी वाले देश में बड़ी संख्या में आने वाली शिकायतों को स्कैनिंग और फिर उन पर ठोस कार्रवाई, इस काम में लगने वाले समय और मैनपावर की कमी को देखते हुए एक निरर्थक कवायद साबित होती है.

हालांकि, एआइ का इस्तेमाल न केवल शिकायत निवारण प्रणाली को तेज और अधिक जवाबदेह बना रहा है बल्कि सिस्टम की खामियां को पता लगाने और विभिन्न भौगोलिक स्थानों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को समझने में सरकारी एजेंसियों के लिए मददगार भी साबित हो रहा है. इसकी सबसे उम्दा मिसाल है प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी) की तरफ से विकसित एकीकृत शिकायत प्रबंधन प्रणाली (आइजीएमएस), जिस पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर रहती है.

एआइ का इस्तेमाल शिकायतों के त्वरित वर्गीकरण में तो सहायक है ही, यह शिकायत का सार सामने रखने और उसे संबंधित विभाग के पास ट्रांसफर करने में भी सक्षम है. कीवर्ड और उनके निहितार्थ समझकर यह पलक झपकते ही यह बता सकता है कि इस पर किस तरह की कार्रवाई की जरूरत है. आइजीएमएस चैटजीपीटी वाली ही तकनीक पर आधारित है. डीएआरपीजी सचिव वी. श्रीनिवास कहते हैं, ''अगर बार-बार एक ही जैसी शिकायतें आती हैं तो हमें इसमें जरूरी नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत को समझने और उनके विश्लेषण में मदद मिलती है. हम यह भी जान सकते हैं कि कहीं यह किसी विभाग या अधिकारी की अक्षमता की वजह से तो नहीं हो रहा.’’

महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे

फरवरी 2023 से केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों में एआइ-संचालित आइजीएमएस का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस तरह की पहल का दायरा बढ़कर अब सभी राज्यों तक पहुंचना चाहिए. डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और सेवाएं भारत के सभी राज्यों में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं. मसलन, केरल में 886 ई-सेवाएं मुहैया की जा रही हैं तो राजस्थान में यह आंकड़ा 248, बिहार में 234 और गुजरात में 228 है. मणिपुर, नगालैंड और सिक्किम जैसे छोटे राज्य ऐसी 50 सेवाएं भी नहीं दे पा रहे. आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्य जहां भूमि का लेखा-जोखा रखने को ब्लॉकचेन इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कई राज्य अनिवार्य 56 डिजिटल सेवाएं तक पूरी तरह शुरू नहीं कर पाए हैं.

पूरे देश में समान और कौशलपूर्ण सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए सरकार को सबसे पहले तो डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना होगा. इसी 6 अगस्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ग्रामीण इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने के मकसद से अपने प्रमुख प्रोजेक्ट भारतनेट के लिए 1.39 लाख करोड़ रुपए की मंजूरी दी. अगला अहम कदम यह पक्का करना है कि सभी सामान्य सेवा केंद्र (सीएससी) पूरे वर्ष सक्रियता से काम करें. दूरदराज के अधिकांश इलाकों में तमाम लोग मैनपावर की कमी और खराब इन्फ्रास्ट्रक्चर की वजह से इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते.

ई-सरकारी सेवाओं के कुशल प्रबंधन के लिए सबसे जरूरी एक अन्य पहलू है, प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता. कई राज्यों में सरकारी अधिकारियों को या तो इन डिजिटल नवाचारों के प्रभावी ढंग से इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षित नहीं किया गया है या फिर तकनीकी विकास की गति के हिसाब से समय-समय पर ट्रेनिंग की व्यवस्था नहीं है. इससे ये सेवाएं प्रभावित हो रही हैं. इसी बात को ध्यान में रखकर सरकार ने डिजिटल सेवाओं को हरेक व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन निर्माण की पहल की है. केंद्र ने यह अनिवार्य कर दिया है कि हर अधिकारी को नई प्रौद्योगिकियों पर 50 घंटे का प्रशिक्षण लेना होगा. राज्यों को भी इस पर अमल करना चाहिए.

बदलाव के अगुआ: 

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत महकमा

सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देखरेख में चलने वाला यह महकमा सरकारी एजेंसियों की तरफ से इस्तेमाल की जाने वाली ई-गवर्नेंस ऐप्लिकेशन में नवीनतम टेक्नोलॉजीज के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है.

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